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Gorakhpur News: राजस्थान से लाए रद्दी स्टांप को बनाते थे नकली- इस खास तकनीकी से गलाते, बनाते और बेच देते
Sun, 07 Apr 2024 11:44 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो,गोरखपुर
अमर उजाला ब्यूरो,गोरखपुर
Published by: गोरखपुर ब्यूरो
Updated Sun, 07 Apr 2024 11:44 AM IST
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फर्जी स्टांप।
- फोटो : अमर उजाला
फर्जी स्टांप में इस्तेमाल होने वाला सिल्वर राजस्थान से सस्ते दाम के स्टांप पेपर से निकाला जाता था। पुलिस की जांच में पता चला है कि यह गिरोह रद्दी के कम कीमत वाले स्टांप खरीदकर लाते थे और उसे पानी में कुछ देर तक डाल देते थे। गलने के बाद उसमें से सिल्वर निकाल लेते थे। फिर इसका ही इस्तेमाल करके नया नकली स्टांप पेपर तैयार करके बेचते थे।
इन सबके पीछे एक और बात भी सामने आई है कि इनका नेटवर्क वहां भी है। वहां आम आदमी को एक निर्धारित संख्या में ही स्टांप पेपर मिलता है, और ये बहुतायत में लेकर आते थे। अब पुलिस इस धंधेबाजी में सभी बिंदुओं पर काम कर रही है।
40 साल से धंधे करने वाला कमरुद्दीन पहले भी स्टांप बनाता था, लेकिन उसकी करतूत आसानी से पकड़ में आ जाती थी। यही वजह है कि धंधा शुरू करने के कुछ साल बाद ही वह 1986 में दबोच भी लिया गया था। वह अपने समय में कम संख्या में ही स्टांप बनाता था, लेकिन जब उसका नाती साहेबजादे रसायन विज्ञान, कंप्यूटर और एप का माहिर हो गया, तो उसने इस नई तकनीक का इस्तेमाल करके स्टांप बाजार में उतार दिया।
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इन सबके पीछे एक और बात भी सामने आई है कि इनका नेटवर्क वहां भी है। वहां आम आदमी को एक निर्धारित संख्या में ही स्टांप पेपर मिलता है, और ये बहुतायत में लेकर आते थे। अब पुलिस इस धंधेबाजी में सभी बिंदुओं पर काम कर रही है।
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40 साल से धंधे करने वाला कमरुद्दीन पहले भी स्टांप बनाता था, लेकिन उसकी करतूत आसानी से पकड़ में आ जाती थी। यही वजह है कि धंधा शुरू करने के कुछ साल बाद ही वह 1986 में दबोच भी लिया गया था। वह अपने समय में कम संख्या में ही स्टांप बनाता था, लेकिन जब उसका नाती साहेबजादे रसायन विज्ञान, कंप्यूटर और एप का माहिर हो गया, तो उसने इस नई तकनीक का इस्तेमाल करके स्टांप बाजार में उतार दिया।
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गिरफ्तारी के बाद एसएसपी गौवर ग्रोवर, एसपी सिटी केके विश्नोई और एएसपी व सीओ कैंट अंशिका वर्मा
- फोटो : अमर उजाला
उसने इस तरह का स्टांप तैयार कर दिया, जिसे पकड़ पाना आसान नहीं था। इसी का फायदा उठाते हुए कई साल तक धंधा करता रहा और मुनाफा कमाता रहा। पुलिस की जांच में एक बात और सामने आई कि फर्जी स्टांप बनाने और बेचने वाला कमरुद्दीन और उसका परिवार उतना मुनाफा नहीं कमा सका है, जितना बेचने वाले वेंडर कमा चुके हैं।
एक स्टांप तैयार करने में 50 रुपये खर्च आता था और 25 हजार रुपये कीमत के स्टांप को महज तीन सौ रुपये में ही बेच दिया करते थे। इससे छोटे दाम के स्टांप को और सस्ते में ही बेचता था। यही वजह है कि अवैध धंधा करने वाला मास्टरमाइंड कंगाल ही रह गया और वेंडर आलीशान इमारतों के मालिक बन बैठे।
एक स्टांप तैयार करने में 50 रुपये खर्च आता था और 25 हजार रुपये कीमत के स्टांप को महज तीन सौ रुपये में ही बेच दिया करते थे। इससे छोटे दाम के स्टांप को और सस्ते में ही बेचता था। यही वजह है कि अवैध धंधा करने वाला मास्टरमाइंड कंगाल ही रह गया और वेंडर आलीशान इमारतों के मालिक बन बैठे।
स्टांप के धंधेबाजों के पास से बरामद फर्जी स्टांप और छपाई मशीन।
- फोटो : अमर उजाला
वेंडरों को मालूम था कि बेचते हैं फर्जी स्टांप
खरीदने वाले को भले ही नहीं मालूम था, लेकिन वेंडरों को अच्छी तरह से मालूम है कि वह फर्जी स्टांप बेच रहे हैं। इसके पीछे वह मोटा मुनाफा कमाते थे। अगर वह असल स्टांप बेचते थे, चंद रुपये ही कमीशन के तौर पर पाते थे, जबकि नकली बेचने में पूरी आमदनी ही जेब में जा रही थी, और सरकार को आर्थिक चोट पहुंच रही थी।
नकली नोट की इंक कौन देता था, जांच शुरू
फर्जी स्टांप के बाद नकली नोट का मामला सामने आने के बाद पुलिस ने इसकी भी जांच शुरू कर दी है कि आखिर उसे इंक कहां से मिलती थी। पुलिस की अब तक की जांच में पता चला है कि वाटर प्रिंट करके वह अदृश्य से दिखने वाले सिक्योरिटी को बनाया करता था, लेकिन इंक आदि की जांच की जा रही है।
एसपी सिटी कृष्ण कुमार बिश्नोई ने बताया कि 25 हजार रुपये कीमत तक के फर्जी स्टांप तैयार किए जाते थे। अधिकतम तीन सौ रुपये में ही स्टांप को बेच देते थे। इसमें ज्यादा मुनाफा वेंडर कमाते थे। फर्जी स्टांप तैयार करने के लिए इस्तेमाल होने वाले सिल्वर को यह लोग राजस्थान से स्टांप पेपर लाकर उसे पानी में डालकर निकालते थे। पुलिस गहराई से जांच कर रही है। जांच व साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
खरीदने वाले को भले ही नहीं मालूम था, लेकिन वेंडरों को अच्छी तरह से मालूम है कि वह फर्जी स्टांप बेच रहे हैं। इसके पीछे वह मोटा मुनाफा कमाते थे। अगर वह असल स्टांप बेचते थे, चंद रुपये ही कमीशन के तौर पर पाते थे, जबकि नकली बेचने में पूरी आमदनी ही जेब में जा रही थी, और सरकार को आर्थिक चोट पहुंच रही थी।
नकली नोट की इंक कौन देता था, जांच शुरू
फर्जी स्टांप के बाद नकली नोट का मामला सामने आने के बाद पुलिस ने इसकी भी जांच शुरू कर दी है कि आखिर उसे इंक कहां से मिलती थी। पुलिस की अब तक की जांच में पता चला है कि वाटर प्रिंट करके वह अदृश्य से दिखने वाले सिक्योरिटी को बनाया करता था, लेकिन इंक आदि की जांच की जा रही है।
एसपी सिटी कृष्ण कुमार बिश्नोई ने बताया कि 25 हजार रुपये कीमत तक के फर्जी स्टांप तैयार किए जाते थे। अधिकतम तीन सौ रुपये में ही स्टांप को बेच देते थे। इसमें ज्यादा मुनाफा वेंडर कमाते थे। फर्जी स्टांप तैयार करने के लिए इस्तेमाल होने वाले सिल्वर को यह लोग राजस्थान से स्टांप पेपर लाकर उसे पानी में डालकर निकालते थे। पुलिस गहराई से जांच कर रही है। जांच व साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।