फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Gorakhpur News ›   Treatment can be done if the deformities are identified in time.

Gorakhpur News: विकृतियों की समय से हो पहचाान तो किया जा सकता है उपचार

Sun, 14 Apr 2024 03:50 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Sun, 14 Apr 2024 03:50 AM IST
विज्ञापन
Treatment can be done if the deformities are identified in time.
- एम्स में फीटल मेडिसिन पर आयोजित कार्यशाला में विशेषज्ञों ने दी जानकारी
विज्ञापन

- एम्स में जल्द ही मातृ शिशु चिकित्सा यूनिट की होगी स्थापना

अमर उजाला ब्यूरो
गोरखपुर। एम्स के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में शनिवार को फीटल मेडिसिन पर कार्यशाला आयोजित हुई। इसमें आए विशेषज्ञों ने बताया कि गर्भवती का 11 से 13 माह के बीच पहला और 20 से 22 माह के बीच दूसरा अल्ट्रासाउंड जरूरी है। इससे गर्भ में पल रहे शिशु के स्वास्थ्य एवं विकारों के बारे में जानकारी मिल सकती है। अगर विकारों का पता जल्द चल जाए, तो उसका उपचार किया जा सकता है।
कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए एम्स निदेशक डॉ. जीके पॉल ने कहा कि मां के गर्भ में पल रहे शिशु को हो रही बीमारी या विकृतियों को जानने और उसके उपचार की विधा को फीटल मेडिसिन कहते हैं। इसमें एक साथ दो जिंदगियों को सुधारने और बचाने का मौका मिलता है, जो किसी और विधा में नहीं मिलता। एम्स का स्त्री व प्रसूति रोग विभाग शीघ्र ही मातृ शिशु चिकित्सा यूनिट की स्थापना करने की तैयारी में है, ये कार्यशाला इसका एक भाग है।
विज्ञापन

सोसाइटी ऑफ फीटल मेडिसिन (एसएफएम) दिल्ली के मेंटर एमेरिटस डॉ. अशोक खुराना ने पहली और दूसरी तिमाही के अल्ट्रासाउंड स्कैन और जन्मजात विकृतियों के पहचान की गाइड लाइन पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि प्रत्येक गर्भवती का 11 से 13 सप्ताह में पहला अल्ट्रासाउंड होना चाहिए, जिसमें विकृति संबंधित लक्षणों को चिह्नित किया जाता है। जन्मजात विकृतियों को समय से पहचाने जाने पर उनका समय पर उपचार किया जा सकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन

दूसरी तिमाही में 20-22 वे सप्ताह में बनावटी विकृतियों की पहचान के लिए अल्ट्रासाउंड होना चाहिए।
डाॅ. मंदाकिनी प्रधान ने आनुवंशिक बीमारियों के निदान के लिए उपलब्ध रक्त की जांचों के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि वर्तमान में मां के खून में शिशु के डीएनए की जांच कर डाउन सिंड्रोम और आनुवंशिक विकारों का पता किया जा सकता है।
एसजीपीआई लखनऊ में मेडिकल जेनेटिक्स विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. दीप्ति सक्सेना ने गर्भावस्था में आनुवंशिक परीक्षण के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कुछ जेनेटिक बीमारियों जैसे थैलेसीमिया का पता सिर्फ महिला से बात करके, उसके परिवार की पिछली पीढ़ियों के बारे में जानकर पता किया जा सकता है।
कार्यशाला में डाॅ. राधा जीना, डाॅ. नीला राय शर्मा, डाॅ. रूमा सरकार, डाॅ. साधना गुप्ता, डाॅ. अमृता जयपुरियार, डाॅ. बबिता शुक्ला, डाॅ. आकाश बंसल आदि भी अनुभव साझा किए। इसके अलावा डॉ. चारू शर्मा (एम्स जोधपुर), डाॅ. मनीषा कुमार (लेडी हार्डिंग दिल्ली), डाॅ. श्वेता पटेल (एम्स भोपाल), डाॅ. स्नेहलता (एम्स रायबरेली) आदि ने ऑनलाइन जुड़कर ज्ञान साझा किया।

कार्यशाला का संचालन स्त्री और प्रसूति रोग विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. शिखा सेठ की अध्यक्षता में डाॅ. आराधना सिंह, डाॅ. प्रीति बाला सिंह, डाॅ. प्रीति प्रियदर्शिनी, डाॅ. प्रियंका सिंह ने किया।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed