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Gorakhpur News: राणी सती दादी का फाल्गुन उत्सव आज, भजनों में लीन होंगे श्रद्धालु

Sun, 01 Mar 2026 02:39 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर Updated Sun, 01 Mar 2026 02:39 AM IST
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Today is the Falgun festival of Rani Sati Dadi, devotees will be immersed in hymns.
- बैंक रोड स्थित निजी स्थल पर होगा कार्यक्रम, तैयारियां जोरों पर
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गोरखपुर। राणी सती दादी के फाल्गुन (होली) महोत्सव रविवार को बैंक रोड स्थित निजी स्थल पर धूमधाम से मनाया जाएगा। इसको लेकर उत्सव को विशेष रूप से भव्य और आकर्षक स्वरूप दिया जा रहा है। इसमें बड़ी संख्या में दादी भक्तों के शामिल होंगे। यहां दादी की ज्योति जलाने व ज्योति लेने के साथ-साथ बाहर से आए कलाकारों की ओर से दादी के भजन किए जाएंगे।

यह जानकारी राणी सती दादी सेवा मंडल की ओर से भरत जालान व पवन सिंहानियां ने शनिवार को बैंक रोड स्थित निजी स्थल पर आयोजित प्रेस वार्ता में कही। उन्होंने बताया कि रविवार को सुबह सात बजे से लक्ष्मी नारायण मंदिर, साहबगंज से भव्य शोभायात्रा एवं 151 निशान यात्रा का शुभारंभ होगा। शोभायात्रा चौरहिया गोला, बक्शीपुर, जुबली चौक, बैंक रोड होते हुए परिणय स्थल तक पहुंचेगी, जहां इसका समापन होगा। यात्रा के दौरान गोरखपुर के भजन गायक राज पांडे की ओर से दादी के भजनों का संगीतमय गुणगान किया जाएगा। उसी दिन सायं छह बजे बैंक रोड स्थित निजी स्थल पर भव्य भजनोत्सव का आयोजन किया जाएगा। कोलकाता से आमंत्रित भजन गायिका ज्योति खन्ना व हर्षिता डिडवानिया फाल्गुन भक्ति गीतों की प्रस्तुति देंगी। महोत्सव के अंतर्गत दादी का भव्य दरबार एवं विशेष शृंगार सजाया जाएगा। भक्तों के लिए चुनरी, गजरा, मेहंदी, सवामणी, छप्पन भोग एवं फूलों की होली जैसे धार्मिक आयोजन भी आकर्षण का केंद्र रहेंगे। रात्रि नौ बजे महाप्रसाद का वितरण किया जाएगा। प्रेस वार्ता में नारायण खेमका, अमित सिंघानिया, मनीष रूंगटा, संजय सिंघानिया, प्रदीप केडिया, अतुल जालान सहित अन्य सेवादार उपस्थित रहे।
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आस्था, त्याग और शक्ति का प्रतीक है राणी सती दादी मां की कथा
गोरखपुर। राणी सती दादी मां की पावन कथा का संबंध महाभारत काल से माना जाता है। मान्यता है कि महाभारत काल में वे वीर अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के रूप में अवतरित हुई थीं। अभिमन्यु के वीरगति प्राप्त करने के बाद उत्तरा ने पति संग सती होने की इच्छा प्रकट की, लेकिन गर्भवती होने के कारण भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें ऐसा करने से रोका और वरदान दिया कि कलियुग में उनकी यह इच्छा पूर्ण होगी। उनके गर्भ से उत्पन्न पुत्र परीक्षित के रूप में प्रसिद्ध हुए।
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राणी सती दादी सेवा मंडल के सदस्य पवन सिंहानियां ने बताया कि कलियुग में दादी मां का जन्म नारायणी के रूप में हुआ। बचपन से ही उन्होंने अनेक दिव्य लीलाएं कीं। उनका विवाह तनधन के साथ हुआ, जिनके पास एक विलक्षण घोड़ी थी। हिसार के नवाब के पुत्र उस घोड़ी को पाने की इच्छा रखते थे। चोरी की कोशिश में संघर्ष हुआ और नवाब का पुत्र मारा गया। इसके बाद तनधन परिवार सहित झुंझुनू आकर बस गए। विवाह के एक वर्ष बाद गौना कर लौटते समय नवाब की सेना से युद्ध हुआ, जिसमें तनधन वीरगति को प्राप्त हुए। यह समाचार मिलते ही नारायणी ने चंडी रूप धारण कर शत्रु सेना का संहार किया और इसके बाद पति का शव गोद में लेकर सती हो गईं। वहीं राणी सती दादी सेवा मंडल के सदस्य अरुण बंका ने बताया कि सती होने से पूर्व उन्होंने निर्देश दिया कि उनकी चिता की भस्म जहां घोड़ी रुक जाए, वहीं उनका मंदिर स्थापित किया जाए। उनका प्रतीक त्रिशूल माना गया। उन्होंने बताया कि मारवाड़ी समाज में दादी को कुलदेवी और इष्ट के रूप में पूजा जाता है। मंगसिर बदी नवमी, मंगसिर सुदी नवमी, भाद्रपद अमावस्या, होली व दीपावली पर विशेष आयोजन होते हैं तथा शुभ अवसरों पर नारायणी चरित्र और मंगल पाठ किए जाते हैं।
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