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मिट्टी को गढ़ कर गुलाब ने 'सोना' बना दिया, इंग्लैंड की महारानी भी रह चुकी हैं इनकी हुनर की मुरीद

Sun, 11 Oct 2020 06:15 PM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Sun, 11 Oct 2020 06:15 PM IST
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Special story of successful man Gulab hardworking and expert in Terracotta craft
देश-विदेश में पुरस्कृत हो चुके हैं गुलाब। - फोटो : अमर उजाला।
अगर हुनर है तो मिट्टी को भी सोना बनाया जा सकता है। यह बात गुलाब चंद्र प्रजापति पर पूरी तरह से चरितार्थ होती है। गोरखपुर के औरंगाबाद गांव के गुलाब प्रजापति ने टेराकोटा शिल्प को न सिर्फ वैश्विक पहचान दी, बल्कि उनके हुनर की वजह से उनका गांव औरंगाबाद 'टेराकोटा गांव' के नाम से विख्यात हो गया। उनकी कलाकृतियां देश-विदेश में पहचान बना चुकी हैं। इंग्लैंड की महारानी भी गुलाब की कलाकृति की मुरीद रह चुकी हैं।
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गुलाब चंद प्रजापति बताते हैं कि उनके बाबा (स्वर्गीय) विजई प्रजापति साठ के दशक में खजनी के रिक्सानारा से आए थे। उन्हें यहां की मिट्टी टेराकोटा के लिए काफी मुफीद लगी तो यहीं बस गए। तब से टेराकोटा शिल्प का काम चलता रहा। वर्ष 2001 में लक्ष्मी स्वयं सहायता समूह का गठन कर एक परिवार के दो दर्जन से ज्यादा लोगों ने इसे नया स्वरूप दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि कोरी मिट्टी ने न सिर्फ इनकी किस्मत संवारी बल्कि आसपास के लोगों को भी प्रेरित किया और उन्हें आर्थिक संबल प्रदान किया।
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औद्योगिक सोच के साथ आधुनिकता के मिश्रण से मिली वैश्विक पहचान
गुलाब प्रजापति ने बताया कि टेराकोटा शिल्प की शुरुआत परंपरागत कला के रूप में हुई थी। कला में हुनर और औद्योगिक सोच के साथ आधुनिकता का मिश्रण किया गया तो रोजगार का साधन बन गई। स्वयं सहायता समूह का गठन कर सांगठनिक रूप देने से बड़े व्यापारियों से संपर्क बढ़ गया। अब उत्पाद विक्रय को लेकर तनाव नहीं रहता। हम माल तैयार करते हैं, लोग खुद-ब-खुद खरीद लेते हैं। करीब पांच-छह साल पहले यहां तैनात डीएम संजय कुमार ने टेराकोटा शिल्प के उत्थान के लिए काफी मदद की। वहीं, प्रदेश सरकार की ‘एक जिला, एक उत्पाद’ योजना से इस शिल्प को नया मुकाम मिला है। साथ ही कई तरह की सुविधाएं भी मिल रही हैं।
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ओडीओपी मार्ट पोर्टल का मिलेगा फायदा

गुलाब ने बताया कि बदलते जमाने के साथ बाजार का स्वरूप भी बदला है। ऑनलाइन मार्केट का चलन बढ़ा है। प्रदेश सरकार द्वारा ई-कामर्स प्लेटफार्म ओडीओपी मार्ट का भी टेराकोटा शिल्पकारों को फायदा मिलेगा।
 
विदेश तक मिली है शिल्प को पहचान
शिल्पकारों की उंगलियां जब चाक पर चढ़ी मिट्टी से खेलती हैं तो कई प्रकार की अद्भुत कलाकृतियां जन्म लेती हैं। इनके हुनर का जादू लखनऊ के आंबेडकर पार्क से लेकर राष्ट्रपति भवन के मुगल गार्डेन तक छाया हुआ है। टेराकोटा की मूर्तियां देश के अनेक संग्रहालयों में धरोहर के रूप में संरक्षित हैं। जापान, अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, फ्रांस, तुर्की सहित कई देशों के संग्रहालयों में भी रखी गईं हैं।
 
देश-विदेश में हुनर दिखाने के साथ कई पुरस्कार पा चुके हैं गुलाब
  • गुलाब चंद्र प्रजापति 1982 में बोरे में मिट्टी ले जाकर ब्रिटेन के बर्किंघम पैलेस में हुनर दिखा चुके हैं।
  • साल 1985 में आस्ट्रेलिया और साल 1987 में हालैंड में अपनी कला का लोहा मनवा चुके हैं।
  • साल 1994 में गणतंत्र दिवस की परेड में औरंगाबाद की टेराकोटा प्रदर्शनी को शामिल किया गया था।
  • साल 1986 में लक्ष्मी प्रजापति ढाका में आयोजित एशियन रीजनल आर्टीजियन वर्कशाप में कलाकृतियों का प्रदर्शन कर चुके हैं।
  • पूर्व राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के हाथों गुलाब चंद्र प्रजापति को पुरस्कार मिल चुका है।
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