बखिरा पक्षी विहार के विकास से संवेरेगा संतकबीरनगर, यहां आते हैं 113 प्रजाति के प्रवासी पक्षी
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किसी जमाने में बखिरा झील को मोती झील के नाम से जाना जाता था। इसके किनारे बसे सैकड़ों गांवों के मछुवारा समुदाय की आजीविका भी इसी झील पर आश्रित है। साल के ठंडक के चार माह तक झील का विशाल जलाशय प्रवासी चिड़ियों के लिए एक पनाहगाह बन जाता है।
वर्ष 1990 में भारत सरकार ने अधिसूचना जारी करते हुए इसे पक्षी विहार का दर्जा दे दिया, किन्तु तीन दशक बीत जाने के बाद भी झील का विकास अभी तक नहीं हो सका। बखिरा पक्षी विहार के 29 वर्ग किमी के विशाल क्षेत्रफल में फैले हुए अथाह जलराशि को देकर किसी समुद्र का अहसास एक बार आने वाले सैलानियों को जरूर हो जाता है।
झील के भीतर गहराई में शांत जल की सुरम्यता देखते ही बनती है। झील के बीच-बीच मे नरकट की मौजूदगी इसे और भी अधिक रहस्यमय बनाती है। ठंडक के दिनो मे इस झील की सैर करने वाले सैलानी यहां की छटा को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते है। नवंबर से जनवरी तक हजारों किमी की दूरी से आने वाले प्रवासी पक्षियों की चहचहाहट देखते ही बनती है।
भौगोलिक विशेषता
संतकबीर नगर जनपद मुख्यालय खलीलाबाद से करीब 18 से 20 किमी दूर उत्तर दिशा में खलीलाबाद-मेहदावल मार्ग पर स्थित बखिरा कस्बे से तीन किमी पूर्वी भाग में स्थित है। इस पक्षी बिहार के विस्तृत भूभाग में विचरते पक्षियों को देखने के लिए सैलानी यहां आ सकें, इसके लिए बखिरा से 3 किमी दूर बखिरा सहजनवां मार्ग पर जसवल के पास उत्तर की ओर आधा किमी लंबी सड़क बनी है।
परिसर में वाच टावर के अलावा वन विभाग के अधिकारियों कर्मचारियों के लिए आवास बने हुए हैं। गोन, पटेरा, पोंटे, मोगटान, जेनीचेला, कटिया, लियोफाइटान, काई-शैवाल, फीताधारी, कुमुदनी, कमलिनी, सफेद कमल आदि तथा जलचरों मे विभिन्न प्रकार की मछलियां, कछुए, केंकड़े, भांकुर, पतासी, टेंगन, सर्प आदि की विविध प्रजातियां यहां पाई जाती हैं। झील का पानी जमीन की आर्द्रता बनाए रखने में फायदेमंद है।
क्षेत्रीय वनाधिकारी अनूप वर्मा के अनुसार यहां पर पूरे वर्ष पानी भरा रहता है जिसके चलते जलीय वनस्पतियां, छोटे-छोटे कीड़े, घोंघे व सीप आदि के चलते यूरोप, साइबेरिया, तिब्बत, चीन देशों से पक्षियां आती हैं। बखिरा पक्षी विहार में दीवाली से होली तक प्रवासी और अप्रवासी पक्षियों की किलकारियां पर्यटकों को खूब लुभाती हैं।
सर्दी का मौसम बिताने के बाद प्रवासी पक्षी अपने मूल प्रदेश को लौट जाते हैं। वन विभाग की मानें तो यहां 113 प्रजाति के प्रवासी पक्षी आते हैं। खास बात यह है कि इन प्रवासी पक्षियों में अधिकांश शाकाहारी हैं। ये पक्षी रोज भोर से स्वतंत्र विचरण करते हुए जल के किनारे उगे झाड़-झुरमुटों से अपना भोजन तलाशते हैं। इनके साथ ही वर्ष भर इस झील में स्थानीय पक्षी भी बहुतायत में पाए जाते हैं। यह पाए जाने वाले विदेशी पक्षियों में लालसर, हिवीसिल, पोचार्ड, सूरखाब, गोजू, सवल, पिण्टेल, मूरहेन, आदि जबकि स्थानीय पक्षी- कैमा, वाटरहेन, राईटर, कारमोरेन्ट, विभिन्न प्रजाति के बगूले, सारस आदि है।
पक्षी प्रेमी जसवल भरवलिया के रहने वाले रामनिधि तिवारी ने बताया कि इतिहास में यह मोती झील के नाम से जाना जाता था, किन्तु सरकार ने इसकी महत्ता को देखते हुए चिड़ियों को संरक्षण करने के लिए पक्षी विहार घोषित कर दिया। तभी से चिड़ियों व मछली मारने पर प्रतिबंध लगा दिया गया।