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नवरात्रि 2020: यहां रूदल ने की थी मां दुर्गा की स्थापना, श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है ये मंदिर
Fri, 23 Oct 2020 03:22 PM IST
vivek shukla
संवाद न्यूज एजेंसी, महराजगंज।
संवाद न्यूज एजेंसी, महराजगंज।
Published by: vivek shukla
Updated Fri, 23 Oct 2020 03:22 PM IST
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फरेंदा में मां दुर्गा मंदिर।
- फोटो : अमर उजाला।
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उत्तर प्रदेश के महराजगंज में स्थित मां दुर्गा का प्राचीन मंदिर शारदीय व वासंतिक नवरात्रि में आस्था का सैलाब उमड़ता है। काले पत्थर से निर्मित प्रतिमा की स्थापना आल्हा के भाई रूदल ने की थी। श्रद्धालुओं का मानना है कि यहां आने वाले भक्तों की मनौती पूरी होती है।
जनश्रुतियों के अनुसार, महोबा के राजा आल्हा के छोटे भाई रूदल महोबा से वनवसिया में स्थित बनारस स्टेट के राजा सैयद से मिलने जा रहे थे। रात होने के चलते उन्होंने अपने सैनिकों के साथ आनंदनगर में ही पड़ाव डाल दिया। सोते समय मां जगदंबा ने रूदल को यहां पर अपने होने का स्वप्न दिखाया। सुबह होने पर रूदल ने मां की अराधना की। फिर मां दुर्गा की प्रतिमा की स्थापना की। रूदल के नाम से ही राजस्व अभिलेखों में यहां का नाम रूदलापुर सेखुई हो गया।
यहां का एक टोला भी रूदलापुर के नाम से आज भी जाना जाता है। कालातंर में प्राकृतिक प्रकोप के कारण मंदिर ध्वस्त हो गया था। सेठ आनंदराम जयपुरिया ने 1932 में कस्बे में गणेश शुगर मिल की स्थापना कराते समय खुदाई के समय एक प्रतिमा मिली, जिस पर जयपुरिया ने मंदिर का निर्माण करवाया।
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इस मंदिर की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैली हुई है। हर वर्ष नवरात्रि के दिनों काफी संख्या में लोग मां का दर्शन करने आते हैं। मंदिर के पुजारी रवि नंदन पाठक ने बताया कि सच्चे मन से मांगी गई मनौती जरूर पूरी होती है। कस्बे के अधिकांश लोग प्रतिदिन मंदिर में पहुंच कर मां की आराधना कर आशीर्वाद लेते है।
लोगों को भाती है पोखरे की सुंदरता
मंदिर के बगल में स्थित पोखरे पर छठ पूजा का आयोजन होता है, जहां पर काफी संख्या में महिलाएं पहुंच कर वेदी बना कर पूजा करती हैं। पोखरे की सुंदरता लोगों का मन मोह लेती है। मंदिर पर अनेक वैवाहिक सहित धार्मिक कार्यक्रम होते हैं।
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जनश्रुतियों के अनुसार, महोबा के राजा आल्हा के छोटे भाई रूदल महोबा से वनवसिया में स्थित बनारस स्टेट के राजा सैयद से मिलने जा रहे थे। रात होने के चलते उन्होंने अपने सैनिकों के साथ आनंदनगर में ही पड़ाव डाल दिया। सोते समय मां जगदंबा ने रूदल को यहां पर अपने होने का स्वप्न दिखाया। सुबह होने पर रूदल ने मां की अराधना की। फिर मां दुर्गा की प्रतिमा की स्थापना की। रूदल के नाम से ही राजस्व अभिलेखों में यहां का नाम रूदलापुर सेखुई हो गया।
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यहां का एक टोला भी रूदलापुर के नाम से आज भी जाना जाता है। कालातंर में प्राकृतिक प्रकोप के कारण मंदिर ध्वस्त हो गया था। सेठ आनंदराम जयपुरिया ने 1932 में कस्बे में गणेश शुगर मिल की स्थापना कराते समय खुदाई के समय एक प्रतिमा मिली, जिस पर जयपुरिया ने मंदिर का निर्माण करवाया।
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इस मंदिर की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैली हुई है। हर वर्ष नवरात्रि के दिनों काफी संख्या में लोग मां का दर्शन करने आते हैं। मंदिर के पुजारी रवि नंदन पाठक ने बताया कि सच्चे मन से मांगी गई मनौती जरूर पूरी होती है। कस्बे के अधिकांश लोग प्रतिदिन मंदिर में पहुंच कर मां की आराधना कर आशीर्वाद लेते है।
लोगों को भाती है पोखरे की सुंदरता
मंदिर के बगल में स्थित पोखरे पर छठ पूजा का आयोजन होता है, जहां पर काफी संख्या में महिलाएं पहुंच कर वेदी बना कर पूजा करती हैं। पोखरे की सुंदरता लोगों का मन मोह लेती है। मंदिर पर अनेक वैवाहिक सहित धार्मिक कार्यक्रम होते हैं।