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गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट में अभिनेता अखिलेंद्र बोले - धर्मनिरपेक्ष शब्द से समाज में फैली है दुर्गंध
Sun, 02 Feb 2020 08:31 PM IST
विजय जैन
डिजिटल न्यूज डेस्क, गोरखपुर
डिजिटल न्यूज डेस्क, गोरखपुर
Published by: विजय जैन
Updated Sun, 02 Feb 2020 08:31 PM IST
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गोरखपुर लिटरी फेस्ट के दूसरे दिन आयोजित शब्द संवाद में बोलते अखिलेन्द्र मिश्र व उपस्थित लोग।
- फोटो : अमर उजाला
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समाज में धर्मनिरपेक्ष शब्द बहुत मशहूर है। 1976 में पहली बार राजनीतिक दलों ने इसका ईजाद किया। इस शब्द को लेकर तबसे भ्रम फैलाया जा रहा है। लोग आपस में लड़ रहे हैं। इसका अर्थ कोई नहीं जानता। जबसे यह शब्द आया समाज में दुर्गंध बढ़ती गई। दरअसल, जो धारण करने योग्य है, वही धर्म है। धर्म के दस लक्षण होते हैं। जिसे कोई अंगीकार नहीं कर रहा है। अब तो धैर्य, बुद्धि, संयम, ईमानदारी जैसे मूल्यवान शब्द गायब हो गए हैं।
यह विचार हैं धारावाहिक चंद्रकांता के क्रूर सिंह, लगान के अर्जन और सरफरोश के मिर्ची सेठ जैसी बहुरंगी किरदारों को निभाने वाले अखिलेंद्र मिश्र के। रविवार को गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट के दूसरे दिन पहले सत्र में वे पूरी तरह आध्यात्मिक थे। बोले, कबीर पूछत हैं, कौन करत है शब्द-संवाद। हम, आप और तुम।
हमने मिमियाना सीख लिया है बिना शब्द को जाने, फैला दिया विष समाज में शब्द का अर्थ जाने। उनके शब्दों में भाव और चिंतन था। शब्द की व्याख्या जब उन्होंने शुरू की तो काफी देर तक तालियों की गड़गड़ाहट सन्नाटे को चीरती रही। अखिलेंद्र ने कहा कि शब्द ही सृजन है, विध्वंस है। शब्द ही लय है, राग है। शब्द ही पिंड है। शब्द के सहस्त्रों स्वरूप हैं। इन्हें खोजने, पहचानने, समझने के लिए मैं कबीर की धरती पर शब्दों की आध्यात्मिक यात्रा कर रहा हूं।
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यह विचार हैं धारावाहिक चंद्रकांता के क्रूर सिंह, लगान के अर्जन और सरफरोश के मिर्ची सेठ जैसी बहुरंगी किरदारों को निभाने वाले अखिलेंद्र मिश्र के। रविवार को गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट के दूसरे दिन पहले सत्र में वे पूरी तरह आध्यात्मिक थे। बोले, कबीर पूछत हैं, कौन करत है शब्द-संवाद। हम, आप और तुम।
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हमने मिमियाना सीख लिया है बिना शब्द को जाने, फैला दिया विष समाज में शब्द का अर्थ जाने। उनके शब्दों में भाव और चिंतन था। शब्द की व्याख्या जब उन्होंने शुरू की तो काफी देर तक तालियों की गड़गड़ाहट सन्नाटे को चीरती रही। अखिलेंद्र ने कहा कि शब्द ही सृजन है, विध्वंस है। शब्द ही लय है, राग है। शब्द ही पिंड है। शब्द के सहस्त्रों स्वरूप हैं। इन्हें खोजने, पहचानने, समझने के लिए मैं कबीर की धरती पर शब्दों की आध्यात्मिक यात्रा कर रहा हूं।
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