विभाजन का दंश: 70 बरस पहले बसी पंजाबी कॉलोनी में छिपा है अपनों को खोने का दर्द, अब मेहनत से खड़ा किया कारोबार
कॉलोनी में रहने वाले दीपक कक्कड़ बताते हैं, वर्ष 1952 में पाकिस्तान के लाहौर से उनके पिता दीवान चंद कक्कड़ गोरखपुर आए। वे रेलवे में नौकरी करते थे। उम्र करीब 50 के आसपास थी। चार भाई व चार बहनें थीं। सरकार की ओर से जब कॉलोनी बसाई गई तो दो कमरे का फ्लैट मिला।
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देश के विभाजन के बाद पाकिस्तान के विभिन्न प्रांतों से शरणार्थी गोरखपुर आए थे। करीब 60 से 70 पंजाबी परिवारों को सरकार ने शरण दी और बसाया। कॉलोनी का नाम दिया गया पंजाबी रामनगर कॉलोनी। यहां रहने वाले परिवारों के लोगों को आज भी अपनों को खोने का दर्द सालता है।
अब तो बहुत सारे लोग इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन अपनी मेहनत और लगन से जो कारोबार खड़ा किया था, उसे बेटे और पौत्रों ने एक मुकाम तक पहुंचाया है। तभी तो इस कॉलोनी को शहर के सबसे रइसों की कॉलोनी भी कही जाती है।
सब कुछ छूट गया था, जान बचाने की जद्दोजहद थी
कॉलोनी में रहने वाले दीपक कक्कड़ बताते हैं, वर्ष 1952 में पाकिस्तान के लाहौर से उनके पिता दीवान चंद कक्कड़ गोरखपुर आए। वे रेलवे में नौकरी करते थे। उम्र करीब 50 के आसपास थी। चार भाई व चार बहनें थीं। सरकार की ओर से जब कॉलोनी बसाई गई तो दो कमरे का फ्लैट मिला।
त्रासदी को याद करके दीपक सहम जाते हैं। बताते हैं, जमीन-जायदाद छोड़कर सभी लोग आए थे। मां बताती थीं, कि जल्दबाजी में गहने व कुछ कपड़े ही ले पाई। रिश्तेदार वहीं रह गए, कुछ का कत्लेआम हो गया। सिर्फ जान बचाने की जद्दोजहद थी। धीरे-धीरे वक्त का मरहम लगा और कारोबार की ओर हम लोग बढ़े। शुरुआत में इंडियन ऑयल की डीलरशिप ली और खाद की दुकान थी। आज गीडा और बरगदवां में तीन लुब्रिकेंट की फैक्ट्रियां हैं।
रोजी-रोटी का संकट था, सबने खुद को मजबूत बनाया
दीपक बताते हैं, कॉलोनी में मक्खन लाल आनंद, नानक चंद, तीरथ राम कोहली, सरदार हरभजन सिंह, सरदार अमर सिंह आदि भी 1951 में आए थे। मक्खन लाल को छोड़कर अभी करीब सभी लोगों का निधन हो चुका है। जब कॉलोनी में सभी लोग बसे तो रोजी-रोटी का संकट था। किसी न किसी तरह से सभी ने खुद को संभाला। एक बात सभी के भीतर थी, वह थी खुद को फिर से खड़ा करने की छटपटाहट। जिसका नतीजा आज सामने है। मक्खन लाल के बेटे जगदीश लाल का आज कंस्ट्रक्शन में बड़ा नाम है। अमर सिंह व हरभजन सिंह ने सोने-चांदी का कारोबार किया, अब बेटे व पोते संभाल रहे हैं।