Gorakhpur: पद्मश्री प्रो. राजेश्वर आचार्य ने जलतरंग वादन करके बनाया विश्व रिकॉर्ड, DDU में दे चुके हैं सेवाएं
प्रो. आचार्य ने 1972 में लगातार साढ़े बारह घंटे और 1973 में 13 घंटे लगातार गायन का दोहरा विश्व रिकॉर्ड बनाया। उन्हें बीते वर्ष तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पद्मश्री से नवाजा। प्रो. राजेश्वर आचार्य का जन्म वाराणसी में जरूर हुआ, लेकिन उनकी कर्मभूमि गोरखपुर रही है।
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गोरखपुर विश्वविद्यालय में ललित कला एवं संगीत के विभागाध्यक्ष रहे पद्मश्री प्रो. राजेश्वर आचार्य ने संगीत के क्षेत्र में बड़ा नाम कमाया है। उन्होंने ध्रुपद गायकी में महारत हासिल करने के बाद जलतरंग वादन किया और विश्व रिकॉर्ड बनाने में कामयाब रहे।
प्रो. आचार्य ने 1972 में लगातार साढ़े बारह घंटे और 1973 में 13 घंटे लगातार गायन का दोहरा विश्व रिकॉर्ड बनाया। उन्हें बीते वर्ष तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पद्मश्री से नवाजा। प्रो. राजेश्वर आचार्य का जन्म वाराणसी में जरूर हुआ, लेकिन उनकी कर्मभूमि गोरखपुर रही है। बीएचयू से संगीत की शिक्षा लेने के बाद वह पंडित बलवंत भट्ट के संपर्क में आए। उन्हें गुरु मानकर संगीत की दीक्षा ली।
इसी बीच वह गोरखपुर विश्वविद्यालय के ललित कला एवं संगीत विभाग में गायन विधा के प्रवक्ता नियुक्त हो गए। लंबे समय तक विभागाध्यक्ष रहे और संगीत साधना की नई पौध तैयार की। गायन के साथ वाद्ययंत्र बजाने में उन्हें महारत हासिल है। वह 2003 में सेवानिवृत्त हुए, फिर वाराणसी में रहने लगे।
बीएचयू में हिंदी विभागाध्यक्ष रहे पं. पद्मनारायण आचार्य के पुत्र डॉ. राजेश्वर आचार्य पहले भी संगीत नाटक अकादमी के कई बार सदस्य भी रहे हैं। गोस्वामी तुलसीदास की साधना स्थली तुलसीघाट पर अखिल भारतीय ध्रुपद मेला के साथ ही उन्होंने संगीत संस्कृति संगम, नाट्यानुशीलन, सार्वभौम ध्रुपद विद्यापीठ, अभिवादन समेत देशभर में कई सांगीतिक संस्थाओं की स्थापना की है। उन्हें पं. ओंकारनाथ ठाकुर व बैजू बावरा अवार्ड समेत विभिन्न 26 सम्मानों से नवाजा जा चुका है।
ग्रीक व हिंदुत्व संस्कार पर शोध कर प्रो. दयानाथ ने पाई थी प्रशंसा
दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के आचार्य प्रो. दयानाथ त्रिपाठी भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनका नाम देश के प्रसिद्ध इतिहासकारों में शुमार है। विश्वविद्यालय में तमाम यादें अब भी ताजा हैं, जिसे शिक्षक दिवस पर याद किया जाता है। वह अनुशासन बनाकर रखते थे।
प्रो. त्रिपाठी के नाम कई उपलब्धियां हैं। ग्रीक एवं हिंदुत्व संस्कार पर कई शोध कर चुके प्रो. त्रिपाठी को तत्कालीन राष्ट्रपति के अनुमोदन पर इलाहाबाद संग्रहालय व राष्ट्रीय संग्रहालय के संचालन समिति में सदस्य नामित किया गया था।
प्रो. त्रिपाठी के पुत्र प्रो. उमेश नाथ त्रिपाठी भी गोरखपुर विश्वविद्यालय के रसायन विभाग में आचार्य हैं। वे बताते हैं कि प्रो. दयानाथ त्रिपाठी ने प्राचीन इतिहास एवं पुरातत्व से स्नातक व परास्नातक की पढ़ाई इलाहाबाद विश्विद्यालय से 1956 में की थी, फिर पीएचडी के लिए विदेश चले गए। इसके लिए भारत सरकार से छात्रवृत्ति भी मिली। पीएचडी की डिग्री साउथेम्प्टन विश्वविद्यालय, इंग्लैंड से हासिल की थी। गोरखपुर विश्वविद्यालय में 1958 से अध्यापन कार्य शुरू किया।
नियंता के रूप में उनका कार्यकाल विश्वविद्यालय के अनुशासन के लिए याद किया जाता है। इसके अतिरिक्त इतिहास विभाग के अध्यक्ष और हॉस्टल के वार्डेन भी रहे। शोध पर आधारित पांच पुस्तकें लिखी थीं। गोरखपुर विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष भी रहे। शिक्षकों की समस्या को उठाते थे। प्रो. त्रिपाठी का जन्म 17 जून 1938 में हुआ था। सात जनवरी 2022 को प्रो. त्रिपाठी का निधन हो गया।