UP News: नवजात के आंख, नाक व कान की होगी जांच, इस वजह से बनाई गई रणनीति
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. भूपेंद्र शर्मा ने बताया कि अगर नवजात बच्चों के नाक, कान और आंख से जुड़ी बीमारियों का सही समय पर पता लग जाए तो इलाज संभव है। इसके लिए एक से तीन साल का वक्त बेहद अहम होता है।
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सरकारी अस्पतालों में जन्म के तत्काल बाद नवजात के आंख और कान की जांच की जाएगी। किसी तरह की दिक्कत होने पर ऐसे बच्चों को विशेषज्ञ डॉक्टरों के पास इलाज के लिए भेजा जाएगा। मूक बधिर और अंधापन की समस्या को रोकने के लिए यह रणनीति बनाई गई है। इस अभियान को राष्ट्रीय बाल सुरक्षा कार्यक्रम से जोड़ने की तैयारी चल रही है। इसके लिए एसजीपीजीआई को नोडल बनाया गया है।
जानकारी के मुताबिक, हर माह जिले में करीब 15 से 16 हजार बच्चे जन्म लेते हैं। इनमें एक से डेढ़ फीसदी बच्चे ऐसे होते हैं, जिनकी आंखों से लेकर कानों में परेशानी होती है, लेकिन समय पर इसकी जानकारी माताओं को नहीं हो पाती है। इसकी वजह से बच्चे दिव्यांग हो जाते हैं। इसे रोकने के लिए शासन ने नई रणनीति तैयार की है।
नवजात की मां को भी बच्चों के कान-आंख की स्थिति पता लगाने की तरकीब बताई जाएगी। इसके लिए जिला स्तर पर प्रशिक्षक तैयार किए जाएंगे। इनमें नाक, कान और गला रोग विशेषज्ञों को शामिल किया जाएगा। इसे लेकर स्वास्थ्य विभाग ने महिला अस्पतालों, सभी सीएचसी को निर्देश भी दिए हैं।
महिला अस्पताल के एसआईसी डॉ. एनके श्रीवास्तव ने बताया कि डॉक्टरों को निर्देश दिए गए हैं कि जन्म के तत्काल बाद बच्चों के आंख, नाक और कान की जांच की जाए। दिक्कत होने पर विशेषज्ञों के पास इलाज के लिए भेजा जाए।
बच्चों के लिए एक से तीन साल का वक्त बेहद अहम
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. भूपेंद्र शर्मा ने बताया कि अगर नवजात बच्चों के नाक, कान और आंख से जुड़ी बीमारियों का सही समय पर पता लग जाए तो इलाज संभव है। इसके लिए एक से तीन साल का वक्त बेहद अहम होता है। इलाज के बाद 70 से 80 फीसदी रिकवरी हो सकती है, लेकिन ऐसे मामलों में माता-पिता को जानकारी बाद में होती है।
इशारा करें, बच्चा न समझे तो डॉक्टर को दिखाएं
डॉ. भूपेंद्र शर्मा ने बताया कि बच्चे को इशारे से बुलाएं अगर इशारा करने पर कोई रिस्पांस न दें, तो डॉक्टर को दिखाएं। इसके अलावा हाथ उठाने पर यदि बच्चे की नजर इधर-उधर न हो, आवाज सुनकर वह सिर इधर-उधर न करें, मोबाइल और टीवी की आवाज पर भी कोई प्रतिक्रिया न हो तो बच्चे को डॉक्टर के पास ले जाए। क्योंकि, ऐसे बच्चों का सही समय पर इलाज होता है तो ठीक होने की संभावना 80 फीसदी रहती है।