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‘मैं जानउ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहुं पर कोह न काऊ’

Wed, 12 Feb 2020 08:36 PM IST
हरीशचंद सिंह डिजिटल न्यूज डेस्क, गोरखपुर
डिजिटल न्यूज डेस्क, गोरखपुर Published by: हरीशचंद सिंह Updated Wed, 12 Feb 2020 08:36 PM IST
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Navdha Bhakti and Bharat Charitra Katha second day in Geeta Vatika gorakhpur
गीता वाटिका में आयोजित कथा में शामिल लोग। - फोटो : अमर उजाला
भगवान का स्वभाव वही जान सकता है जो भगवान से प्रेम करता है। बिना प्रेम किए स्वभाव समझ नहीं आता। भरत जी कहते हैं...‘मैं जानउ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहुं पर कोह न काऊ’ भगवान का स्वभाव है कि वे अपराधियों पर भी क्रोध नहीं करते, बल्कि कृपा करना चाहते हैं। कृपा किए बिना उनको चैन नहीं आता। ये बातें गीता वाटिका में आयोजित ‘नवधा भक्ति एवं भरत चरित्र कथा’ के दूसरे दिन फाजिल्का (पंजाब) से आए कथा व्यास नरेश शर्मा ने कही।
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उन्होंने कहा कि भरत, प्रभु राम के मूर्तिमान प्रेम हैं। वे अयोध्या में रहकर वनवासी का जीवन व्यतीत कर रहे हैं । उधर, वनवासी राम माता-पिता, परिजनों के साथ भरत जी के स्नेहशील और सेवा भाव को याद करके दुखी होते हैं। संसार में भागने से नहीं, जागने से काम बनता है। जागने का अर्थ है  विषय-विलास से वैराग्य ... केवल विषय से वैराग्य नहीं हो सकता। वैराग्य होता है विषय-विलास से। देखना, सुनना, बोलना क्रमश: आंख, कान, वाणी का विषय है । किंतु जो देखने, सुनने और बोलने योग्य नहीं है। उसे देखना, सुनना और बोलना आदि संबंधित इंद्रियों का विषय-विलास है
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