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गोरखपुर नगर निगम का दावा: 'रीड साहब धर्मशाला और बसंत सराय हमारी संपत्ति...' जानिए क्या है इनका इतिहास

Wed, 16 Apr 2025 12:46 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर Published by: गोरखपुर ब्यूरो Updated Wed, 16 Apr 2025 12:46 AM IST
सार

सतासीराज के राजा बसंत सिंह ने वर्ष 1456 में बसंतपुर किले का निर्माण कराया। सन 1688 में औरंगजेब ने काजी खलीलुर्रहमान, गोरखपुर को चकलेदार नियुक्त किया। उसने सतासी के राजा को बेदखल कर दिया। वहीं, बेतियाहाता चौराहा के पास स्थित रीड साहब की धर्मशाला एक दुर्ग के रूप में बनी थी। इसका निर्माण गोरखपुर के चकलेदार काजी खलीलुर्रहमान ने सिपहसालारों के रहने के लिए वर्ष 1680 में कराया था। वर्ष 1839 में गोरखपुर के तत्कालीन कलेक्टर ई ए रीड साहब ने तत्कालीन रईसों एवं व्यापारियों से 5880 रुपये एक आना चंदा वसूल कर इस दुर्ग को धर्मशाला का रूप दे दिया।

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Gorakhpur Municipal Corporation claims Reed Saheb Dharamshala and Basant Sarai are our property
बसंतपुर स्थित बसंत सराय और बेतियाहाता स्थित रीड साहब धर्मशाला - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

गोरखपुर रीड साहब धर्मशाला और बसंत सराय को संरक्षित स्मारक घोषित करने पर नगर निगम ने आपत्ति दर्ज कराई है। निगम का कहना है कि ये संपत्ति उसकी है और इसका मालिकाना हक उनके पास ही रहना चाहिए। हालांकि पुरातत्व विभाग इसे संरक्षित करना चाहता है। अब इस चक्कर में दोनों स्थलों के सुंदरीकरण का मामला अटक गया है।

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प्रदेश सरकार के संस्कृति अनुभाग ने राज्यपाल की स्वीकृति के बाद इसकी प्रथम अधिसूचना जारी कर दी थी। 17 जनवरी की जारी अधिसूचना को कमिश्नर अनिल ढींगरा की सहमति के बाद पांच फरवरी को दोनों ही ऐतिहासिक स्मारकों पर चस्पा किया गया था। इसके बाद से नगर निगम ने इस पर आपत्ति दाखिल की है, जिस पर पुरातत्व विभाग विचार कर रहा है।
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तहसील सदर में मौजा बसंतपुर खास, परगना हवेली स्थित बसंत सराय (रैन बसेरा) राजस्व गाटा संख्या 435, 436 और 438 में क्रमश: 0.110, 0.262 और 0.118 हेक्टेयर में स्थित है। इसके अलावा तहसील सदर मौजा अलहदादपुर परगना हवेली में रीड साहब धर्मशाला राजस्व गाटा संख्या 42 और 43 में क्रमश: 0.224 और 0.395 हेक्टेयर रकबा में स्थित है।
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569 साल पुराना बसंतपुर सराय
सतासीराज के राजा बसंत सिंह ने वर्ष 1456 में बसंतपुर किले का निर्माण कराया। सन 1688 में औरंगजेब ने काजी खलीलुर्रहमान, गोरखपुर को चकलेदार नियुक्त किया। उसने सतासी के राजा को बेदखल कर दिया। बसंतपुर किले में मुगल चौकी बना पल्टन रहने लगी।

इस किले का कुछ हिस्सा खलीलुर्रहमान ने कैदियों के लिए कारागार के रूप में काम में लाया। वर्ष 1801 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस कैदखाने का नाम मोती महल रखा। वर्तमान में यह किला पुराना होने के बावजूद मजबूती से खड़ा है। इसका परकोटा सुरक्षित एवं दर्शनीय है। पांच फरवरी 20003 को इसे नगर निगम को रैन बसेरा के नाम पर फ्री होल्ड किया गया।

365 साल पुराना है रीड साहब धर्मशाला
बेतियाहाता चौराहा के पास स्थित रीड साहब की धर्मशाला एक दुर्ग के रूप में बनी थी। इसका निर्माण गोरखपुर के चकलेदार काजी खलीलुर्रहमान ने सिपहसालारों के रहने के लिए वर्ष 1680 में कराया था। वर्ष 1839 में गोरखपुर के तत्कालीन कलेक्टर ई ए रीड साहब ने तत्कालीन रईसों एवं व्यापारियों से 5880 रुपये एक आना चंदा वसूल कर इस दुर्ग को धर्मशाला का रूप दे दिया।

यह मुगल कालीन वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। हालांकि, अब यहां मुगलकालीन शिल्प के नाम पर कुछ दीवारें और चौखटों से उखड़ते कुछ दरवाजे ही बचे हैं।

नगर निगम के मुताबिक, 1836 में तत्कालीन डीएम मिस्टर रीड ने लीज डीड के माध्यम से दिलदार खान से भूमि प्राप्त कर उसका ट्रस्ट बना धर्मशाला का निर्माण कराया। ट्रस्ट को सरकार ने 17 अगस्त 1844 को अपने पत्र संख्या 3633 से मान्यता प्रदान की। ट्रस्ट की व्यवस्था का संचालन करने के लिए स्थानीय निकाय को सुपुर्द कर दिया।

दोनों इमारतों में रह लोग लोग
नगर निगम बसंतपुर सराय और रीड साहब धर्मशाला को खाली कराने के लिए पिछले कई वर्षों से प्रयास कर रहा है। इसी कड़ी में बसंतपुर सराय और रीड साहब धर्मशाला के रहवासियों से बीते कई वर्षों से किराया भी नहीं वसूल रहा है। यहां के लोग पुनर्वास की मांग कर रहे हैं। बसंतपुर सराय में 67 कोठरिया हैं, जिनमें 10 खाली और 57 में परिवार रह रहे हैं।

इसके अलावा परिसर में भी 30 से अधिक परिवार निवास कर रहे हैं। नगर निगम के बजट से कुछ माह पहले ही 16 लाख रुपये से बसंतपुर सराय में सीसी सड़क बनी है। रीड साहब धर्मशाला में 61 आवासों में तीन पीढ़ियों से परिवार आबाद हैं। नगर निगम यहां सीवर, पेयजल, सीसी सड़क, बिजली, पार्क, ट्यूबवेल सरीखी सुविधाएं दे रहा है। 2017 से किराया लेना बंद कर दिया।

पर्यटक स्थल बनाने की है योजना
नगर निगम दोनों स्थलों को विरासत के रूप में संरक्षित करना चाहता है। इसके लिए पुरातत्व विभाग से सुझाव मांगे थे। पुरातत्व विभाग इसे अपने कब्जे में लेकर संरक्षित करना चाहता है। इसपर निगम ने आपत्ति दर्ज कराई है।

निगम के अफसरों का कहना है कि जमीन का मालिकाना हक निगम के पास है, पुरातत्व विभाग बस हमें सुझाव दे। निगम उसे पयर्टक स्थल के रूप में विकसित करेगा, ताकि उससे कुछ आय भी अर्जित हो सके।


नगर निगम के स्वामित्व की पुरातात्विक महत्व की अंग्रेजों की जमाने की इन इमारतों के अनुरक्षण के लिए पुरातत्व विभाग को छह माह पहले पत्र लिखा गया था। इन इमारतों के संरक्षण एवं अनुरक्षण के लिए विभाग की टीम सर्वेक्षण कर सुझाव दे, ताकि उसके अनुरूप कार्रवाई की जा सके। निगम इसका संरक्षण कर पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करेगा: निरंकार सिंह, अपर नगर आयुक्त

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