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श्रम कानून पर रोक कहीं बन न जाए शोषण का हथियार
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सूबे में आर्थिक गतिविधियों को तेजी देने और कंपनियों को लुभाने के मकसद से उत्तर प्रदेश सरकार अध्यादेश के जरिए तीन वर्षों के लिए प्रदेश में सभी लेबर ल़ॉ यानी श्रमिक कानूनों को निलंबित करने का फैसला लिया है। सरकार का ऐसा मानना है कि इसके जरिए कोरोना के संकट के चलते सूबे में आर्थिक गतिविधियों पर जो विपरीत प्रभाव पड़ा है, उससे निपटने में मदद मिलेगी। ‘उत्तर प्रदेश में कुछ श्रम कानूनों से अस्थायी छूट का अध्यादेश, 2020’ को पारित किया गया। दी गई है। अब इस अध्यादेश को मंजूरी के लिए राज्यपाल आनंदीबेन पटेल के समक्ष भेजा गया है। इसके पास हो जाने के बाद यह कानून बन जाएगा। प्रदेश सरकार के इस फैसले का श्रम संगठनों ने इसे मजदूरों और कामगारों के शोषण का जरिया करार दिया है। उनका कहना है कि इस कानून के बन जाने के बाद कामगार फैक्ट्री मालिकों के हाथों की कठपुतली बन जाएंगे। वही फैक्ट्री मालिकों का कहना है कि इस कानून से कोरोला संकट के दौरान आर्थिक रूप से कमजोर हो चुके फैक्ट्री मालिकों को अपनी फैक्ट्री को फिर से खड़ा करने में काफी मदद मिलेगी। जो भी असंगठित क्षेत्र हैं वहां पहले से ही कर्मचारियों का शोषण होता रहा है। इस कानून के बन जाने के बाद फैक्ट्री मालिकों के लिए शोषण करना कानूनी हथियार बन जाएगा। जहां फैक्ट्रियों में तीन शिफ्ट में काम होता है वहां दो शिफ्ट में ही काम कराया जाएगा। इसका असर यह होगा की कामगारों और कर्मचारियों को 8 घंटे की बजाए 12 घंटे की ड्यूटी करनी पड़ेगी। और इसका विरोध करने पर कर्मचारियों को बाहर निकाल दिया जा सकता है जिसकी कहीं सुनवाई भी नहीं होगी। राजू कुमार प्रभारी बिगुल मजदूर दस्ता इस कानून के होने की वजह से फैक्ट्री संचालकों के मन में किसी भी उत्पीड़न पर श्रम कानून के उल्लंघन का डर रहता है। कोई भी पीड़ित श्रम कार्यालय में जाकर अपनी शिकायत दर्ज करा सकता था। उसके आधार पर श्रम निरीक्षक श्रम प्रवर्तन अधिकारी फैक्ट्री में जाकर जांच कर सकते थे। और मजदूरों कामगारों को उनका हक दिला सकते थे लेकिन इस अध्यादेश की कानून बन जाने के बाद यह सारी चीजें खत्म हो जाएंगी। किसी भी कर्मचारी को बिना किसी वजह के फैक्ट्री से निकाला भी जा सकता है जिसकी कहीं भी सुनवाई नहीं हो सकेगी। अगर यह अध्यादेश कानून बन जाता है तो कामगारों का शोषण होना है। अरुण चौबे सचिव टेक्सटाइल वर्कर्स यूनियन उद्योगपति बोले लॉकडाउन की वजह से उद्योगों के सामने बहुत विकट स्थिति हो गई है। लॉकडाउन के सर्कुलर के अनुसार वर्तमान समय में केवल 50% कर्मचारियों के साथ ही फैक्ट्री संचालित करनी है। ऐसे में 50% कर्मचारियों को बैठाकर वेतन देना किसी भी फैक्ट्री संचालक के लिए संभव नहीं हो पा रहा है। ऐसे में फैक्ट्री संचालक। \"नो वर्क नो पे\" की नीति अपना सकते हैं। इसके अलावा अगर कंपनी को प्रॉफिट नहीं होता है तो कंपनी बोनस देने के लिए भी बाध्य नहीं रहेगी। इस कानून के बन जाने से फैक्ट्री संचालकों को काफी राहत मिलेगी। एसके अग्रवाल पूर्व अध्यक्ष चेंबर ऑफ इंडस्ट्रीज श्रम कानून पर रोक लगाने की बजाय इसके सरलीकरण की आवश्यकता थी। अगर देखा जाए तो इस कानून के आड़ में फैक्ट्री संचालक अपने कर्मचारियों का शोषण करने से बाज नहीं आएंगे। निश्चित तौर पर कोरोना संकट की वजह से फैक्ट्री संचालकों के सामने विकट स्थिति आई है। जब भी कोई जहाज डूबता है तो उसके भार को हल्का करना पड़ता है। ऐसे में कोरोला संकट की मार झेल रहे उद्योग अपने कर्मचारियों को निकालेंगे ही। लेकिन फैक्ट्री संचालक होने की हैसियत से हमें अपने कर्मचारियों के प्रति एक अभिभावक के तौर पर पेश आना होगा। कोई भी फैसला लेने के पहले हमें यह सोचना चाहिए की कर्मचारियों को भी अपने परिवार को चलाने की जिम्मेदारी होती है। सुमित कक्कड़ उद्योगपति
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