Gorakhpur: सरकारी जमीन के वरासत मामले की जांच पूरी, तहसीलदार पाए गए दोषी
डीएम कृष्णा करूणेश ने कहा कि जांच में प्रथम दृष्टया पूर्व सदर तहसीलदार विरेंद्र गुप्ता ही दोषी पाए गए हैं। कार्रवाई के लिए की गई संस्तुति पर उन्हें राजस्व परिषद से संबद्ध कर दिया गया है। जमीन, उद्यान विभाग के नाम दर्ज है। इसे और सुरक्षित किया जा रहा है। साथ ही बाकी सरकारी जमीनों का भी सत्यापन कराया जा रहा है।
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गोरखपुर जिले के जंगल डुमरी में 26 एकड़ सरकारी जमीन का वरासत किए जाने के मामले की जांच पूरी हो गई है। जांच अधिकारी एडीएम सिटी विनीत कुमार सिंह और मुख्य राजस्व अधिकारी एसके गोंड ने अपनी रिपोर्ट डीएम कृष्णा करूणेश को सौंप दी है। पूरे खेल में पूर्व तहसीलदार विरेंद्र गुप्ता प्रथम दृष्टया दोषी पाए गए हैं।
जिसपर डीएम की संस्तुति पर उन्हें राजस्व परिषद से संबद्ध कर दिया गया है। वही मामले में पूर्व कानूनगो घनश्याम शुक्ला और लेखपाल शैलेष चंद सिंह संलिप्तता नहीं पाए जाने पर उन्हें राहत मिली है।
कोलकाता निवासी अतुल कृष्ण बनर्जी, केदारनाथ मुखर्जी, शैलेंद्रनाथ मुखर्जी, लक्खी देवी के नाम सदर तहसील के भटहट ब्लॉक स्थित जंगल डुमरी नंबर दो में करीब 26 एकड़ से अधिक जमीन दर्ज थी। लंबे समय से इन मूल खातेदारों के गोरखपुर से गायब रहने और कोलकाता में बताए पते पर भी नहीं पाए जाने पर वर्ष 2019 में इस जमीन को लावारिस घोषित कर दिया गया। राजस्व अभिलेखों में जमीन ग्राम सभा के नाम दर्ज कर दी गई।
इसके बाद जमीन एक साल के लिए नगर निगम को आवंटित कर दी गई। मगर आठ महीने बाद ही नगर निगम को किया गया आवंटन निरस्त करते हुए इसे वेटरिनरी कॉलेज के नाम दर्ज कर दिया गया। मई 2022 में पूर्व तहसीलदार विरेंद्र गुप्ता के आदेश पर अचानक इस जमीन की वरासत कर दी गई । राजस्व अभिलेखों में जमीन दो मूल खातेदारों के पुत्रों के नाम कर दी गई।
जुलाई 2022 में डीएम ने इस जमीन को उद्यान विभाग को आवंटित कर दिया। जमीन के वरासत हो जाने की शिकायत डीएम कृष्णा करूणेश को मिली तो उन्होंने दो सदस्यीय कमेटी गठित कर मामले की जांच कर रिपोर्ट उपलब्ध कराने को कहा था। जांच शुरू होते ही तहसीलदार सदर का चौरीचौरा जबकि तहसीलदार न्यायालय के पेशकार गिरिजेश का गोला तबादला कर दिया गया।
जांच के दौरान पूर्व तहसीलदार सदर विरेंद्र ने कानूनगो घनश्याम और हलका लेखपाल शैलेष चंद सिंह पर पूरा ठिकरा फोड़ते हुए आरोप लगाया था कि उन्होंने गलत रिपोर्ट लगाई थी जिससे गुमराह होकर उन्होंने जमीन की वरासत कर दी। हालांकि, जांच रिपोर्ट के मुताबिक कानूनगो और लेखपाल की संलिप्तता नहीं पाई गई। जिस तारीख में रिपोर्ट लगाई गई थी दोनों उस हलके में तैनात ही नहीं थी। रिपोर्ट पर दर्ज दस्तखत भी उनके नहीं मिले।
पावर ऑफ अटार्नी से बैनामा होने से प्रकाश में आई जमीन
तीन-चार दशक पहले डुमरी नंबर दो की 26 एकड़ जमीन से जुड़े मूल खातेदारों के परिवार के एक सदस्य की हत्या हो जाने के बाद सभी खातेदार यहां अपनी संपत्ति छोड़ कोलकाता चले गए थे। तीन साल पहले जमीन के कुछ कारोबारियों ने कोलकाता में एक मूल खातेदार को तलाश लिया और पॉवर ऑफ अटार्नी के जरिए बैनामा शुरू कर दिया। इसकी सूचना जब तत्कालीन एसडीएम गौरव सिंह सोगरवाल को मिली तो उन्होंने मूल खातेदारों की तलाश शुरू कराई। लेखपालों की एक टीम कोलकाता के पते पर भेजी गई, मगर वहां कोई मिला ही नहीं। इसके बाद एसडीएम ने जरूरी जांच प्रक्रिया पूरी करते हुए जमीन लावारिस घोषित कर दी और इसे ग्राम सभा के नाम दर्ज कर दिया।
मामला गरमाया तो वरासत निरस्त कर दी
जमीन का मामला खुलने के बाद आनन-फानन सदर तहसीलदार विरेंद्र गुप्ता ने वरासत निरस्त कर दी। बताया जा रहा है कि यह कार्रवाई पूर्व की तारीख में की गई। फिलहाल राजस्व अभिलेखों में जमीन उद्यान विभाग के नाम ही दर्ज है। प्रशासन अब इसकी पैमाइश कराकर और सुरक्षित करने जा रहा है।
डीएम कृष्णा करूणेश ने कहा कि जांच में प्रथम दृष्टया पूर्व सदर तहसीलदार विरेंद्र गुप्ता ही दोषी पाए गए हैं। कार्रवाई के लिए की गई संस्तुति पर उन्हें राजस्व परिषद से संबद्ध कर दिया गया है। जमीन, उद्यान विभाग के नाम दर्ज है। इसे और सुरक्षित किया जा रहा है। साथ ही बाकी सरकारी जमीनों का भी सत्यापन कराया जा रहा है।