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अंतरराष्ट्रीय नशा निषेध दिवस: नशे की लत को भुना रहा ऑनलाइन बाजार...युवा खरीद रहे ड्रग्स, हो रहे बीमार
Thu, 26 Jun 2025 11:59 AM IST
रोहित सिंह
रजनी ओझा, गोरखपुर
रजनी ओझा, गोरखपुर
Published by: रोहित सिंह
Updated Thu, 26 Jun 2025 11:59 AM IST
सार
दवा के एक व्यापारी ने बताया कि पेंटविन इंजेक्शन, कोरेक्स सीरप और स्पास्मो प्राॅक्सीवान कैप्सूल का उपयोग नशे के लिए किया जा रहा है। नशे के ये सामान मेडिकल स्टोर में दो से लेकर 15 रुपये में आसानी से मिल जाते हैं। स्पास्मो कैप्सूल पेट दर्द से राहत की दवा है। इसकी कीमत दो रुपये है। युवा एक साथ चार-पांच कैप्सूल खाकर इसका उपयोग नशे के लिए कर रहे हैं।
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Drugs, ड्रग्स
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
सोशल मीडिया के खतरे हजार हैं। इस प्लेटफॉर्म पर कई ऐसे वेबसाइट उपलब्ध हैं, जहां से युवाओं को आसानी से ड्रग्स मिल जा रहे हैं। यही नहीं, इलाज के लिए मिलने वाली दवाओं का नशे के लिए धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है। इसकी लत युवाओं को बीमार बना रही है। दो-चार रुपये में मिलने वाली इन दवाओं को मानक से ज्यादा इस्तेमाल कर युवा पीढ़ी नशे की आगोश में डूब जा रही है।
अब जब दवा की दुकानों पर सख्ती बढ़ी है तो ऑनलाइन बाजार से सिंथेटिक दवाओं की खरीदारी कर युवा अपनी लत पूरा करने में लगे हैं। इससे जहां उन्हें संक्रमण और बीमारी घेर रही है, वहीं विभाग भी तमाम कोशिशों के बाद भी इस पर लगाम लगाने में नाकाम है।
नारकोटिक्स विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, इन दिनों कुछ युवाओं ने नशे के ट्रेंड को बदल दिया है। पुराने परंपरागत नशे के मादक पदार्थों के दाम बढ़ने और इनकी सीधी निगरानी होने से लती युवा अब ऑनलाइन वेबसाइट और एप के जरिये सिंथेटिक ड्रग्स की बुकिंग करवा रहे हैं।
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इससे नशीला पदार्थ (सिंथेटिक ड्रग्स) इन तक आसानी से पहुंच जा रहा है। जो दवा बीमारी से निजात दिलाने के लिए बनाई गई है, उसका उपयोग अब युवाओं अपने नशे के लिए कर रहे है। इसके लिए अब पान, बीड़ी, सिगरेट और शराब के अलावा कम खर्च में नशीली दवा सिरप और इंजेक्शन का उपयोग अधिक हो रहा है। दर्द और एलर्जी से राहत दिलाने के लिए बनाई गईं दवाओं का इस्तेमाल युवा नशे के लिए करने लगे हैं।
दवा के एक व्यापारी ने बताया कि पेंटविन इंजेक्शन, कोरेक्स सीरप और स्पास्मो प्राॅक्सीवान कैप्सूल का उपयोग नशे के लिए किया जा रहा है। नशे के ये सामान मेडिकल स्टोर में दो से लेकर 15 रुपये में आसानी से मिल जाते हैं। स्पास्मो कैप्सूल पेट दर्द से राहत की दवा है।
इसकी कीमत दो रुपये है। युवा एक साथ चार-पांच कैप्सूल खाकर इसका उपयोग नशे के लिए कर रहे हैं। इसके अलावा पेंटविन इंजेक्शन लगाकर भी युवा वर्ग नशा कर रहा है। दुकान से बिना पर्चे के इन दवाओं के न मिलने पर सिंथेटिक ड्रग्स को नशे के शौकीन ऑनलाइन बुक कर मंगवा ले रहे हैं।
एचआईवी और टीबी का भी खतरा
बीआडी मेडिकल काॅलेज के श्वास व चेस्ट रोग के विभागाध्यक्षा डॉ. अश्वनी मिश्रा ने बताया कि आजकल के नशा करने वाले युवाओं में कई तरह के संक्रमण हो रहे हैं। सिगरेट, गांजा के नशे से फेफड़े में एलर्जी, अस्थमा हो रहा है। वहीं आईवी के माध्यम से नशे से निमोनिया, संक्रमण और एचआईवी के साथ कुपोषण जैसी दिक्कतों का सामना करते हैं। कुपोषण की वजह से टीबी हाेने का खतरा ज्यादा रहता है।
नशे के लिए इन दवाओं का इस्तेमाल
नारकोटिक्स के एक जानकार ने बताया कि नशे के लिए युवा स्पास्मो प्राक्सीवान, एंटी एलर्जिक टेबलेट एविल, नारफिन एंपुल, नाइट्रोसीन टेबलेट, आयोडेक्स और कोरेक्स सिरप का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। इनमें से नारफिन व नाइट्रोसीन को तो प्रतिबंधित कर दिया गया है, फिर भी ये मेडिकल स्टोर्स से चोरी-छिपे बेचे जा रहे हैं।
यह होता है सिंथेटिक ड्रग
सिंथेटिक ड्रग्स वे नशीले पदार्थ होते हैं जो प्राकृतिक स्रोतों से नहीं बल्कि रासायनिक रूप से लैब में बनाए जाते हैं। इन्हें कृत्रिम ड्रग्स भी कहा जाता है। ये प्राकृतिक ड्रग्स (जैसे अफीम, गांजा, अफीम से बनी हेरोइन) के असर की नकल करते हैं या कभी-कभी उनसे भी अधिक तीव्र असर डालते हैं। उदाहरण एमडीएमए (एक्स्टसी), मेथैम्फेटामाइन (आइस, क्रिस्टल मेथ), एलएसडी, फेंटेनल।
बर्बाद हो गया घर-बार
सहजनवां इलाके की एक छात्रा ने वकील बनने का सपना लेकर शहर के एक कॉलेज में प्रवेश लिया। यहां आने के बाद उसकी पढ़ाई अच्छी चल रही थी। हॉस्टल की दोस्तों ने उसे भरोसे में लेकर शराब, सिगरेट और हुक्का की लत लगा दी। पिता दूसरे प्रदेश में नौकरी करते थे।
वह शराब भी पीने लगी, जिससे उसकी किडनी खराब हो गई। इसके बाद उसे घर जाना पड़ा। बेटी की तबीयत खराब होने की खबर सुनकर पिता घर आए। उसके इलाज की वजह से उनकी नौकरी भी चली गई। छात्रा की हालत इतनी खराब हो गई कि अब उसकी डायलिसिस चल रही है। अब वह जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रही है। इलाज के लिए खेत भी बेचना पड़ा है।
हुक्का और शराब की लत, हो गई फेल
पिपराइच क्षेत्र की रहने वाली छात्रा ने डीडीयू में प्रवेश लिया। वह शहर में ही किराए का कमरा लेकर रहने लगी। शहर में आने के बाद वह दोस्तों के चक्कर में नशा करने लगी। दोस्तों ने पहले उसे हुक्का पिलाया। फिर कई बार हुक्का बार ले गए। इसके बाद सिगरेट, शराब भी पिलाने लगे। नशे की लत के कारण उसका स्वास्थ्य खराब हो गया, जिससे पढ़ाई भी प्रभावित हुई। वह एक सेमेस्टर में फेल हो गई।
सिंथेटिक ड्रग्स को लेकर एजेंसियां अलग-अलग इनपुट पर कार्रवाई करती आ रही हैं। डिजिटल प्लेटफाॅर्म को एजेंसी एक तरह से चुनौती की तरह ले रही है। उम्मीद है कि जल्द ही इसपर भी बड़ी कार्रवाई की जा सकती है। नशे से रोकथाम की दवा नहीं है, सिर्फ जागरूकता ही एकमात्र इसका सबसे मुफीद रास्ता है। हमारी टीम गोरखपुर के अलावा महराजगंज, सिद्धार्थनगर और आसपास के जिलों में लगातार इनपर कार्रवाई कर रही है: अनिल कुमार विश्वकर्मा, सहायक नारकोटिक्स आयुक्त, लखनऊ
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अब जब दवा की दुकानों पर सख्ती बढ़ी है तो ऑनलाइन बाजार से सिंथेटिक दवाओं की खरीदारी कर युवा अपनी लत पूरा करने में लगे हैं। इससे जहां उन्हें संक्रमण और बीमारी घेर रही है, वहीं विभाग भी तमाम कोशिशों के बाद भी इस पर लगाम लगाने में नाकाम है।
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नारकोटिक्स विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, इन दिनों कुछ युवाओं ने नशे के ट्रेंड को बदल दिया है। पुराने परंपरागत नशे के मादक पदार्थों के दाम बढ़ने और इनकी सीधी निगरानी होने से लती युवा अब ऑनलाइन वेबसाइट और एप के जरिये सिंथेटिक ड्रग्स की बुकिंग करवा रहे हैं।
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इससे नशीला पदार्थ (सिंथेटिक ड्रग्स) इन तक आसानी से पहुंच जा रहा है। जो दवा बीमारी से निजात दिलाने के लिए बनाई गई है, उसका उपयोग अब युवाओं अपने नशे के लिए कर रहे है। इसके लिए अब पान, बीड़ी, सिगरेट और शराब के अलावा कम खर्च में नशीली दवा सिरप और इंजेक्शन का उपयोग अधिक हो रहा है। दर्द और एलर्जी से राहत दिलाने के लिए बनाई गईं दवाओं का इस्तेमाल युवा नशे के लिए करने लगे हैं।
दवा के एक व्यापारी ने बताया कि पेंटविन इंजेक्शन, कोरेक्स सीरप और स्पास्मो प्राॅक्सीवान कैप्सूल का उपयोग नशे के लिए किया जा रहा है। नशे के ये सामान मेडिकल स्टोर में दो से लेकर 15 रुपये में आसानी से मिल जाते हैं। स्पास्मो कैप्सूल पेट दर्द से राहत की दवा है।
इसकी कीमत दो रुपये है। युवा एक साथ चार-पांच कैप्सूल खाकर इसका उपयोग नशे के लिए कर रहे हैं। इसके अलावा पेंटविन इंजेक्शन लगाकर भी युवा वर्ग नशा कर रहा है। दुकान से बिना पर्चे के इन दवाओं के न मिलने पर सिंथेटिक ड्रग्स को नशे के शौकीन ऑनलाइन बुक कर मंगवा ले रहे हैं।
एचआईवी और टीबी का भी खतरा
बीआडी मेडिकल काॅलेज के श्वास व चेस्ट रोग के विभागाध्यक्षा डॉ. अश्वनी मिश्रा ने बताया कि आजकल के नशा करने वाले युवाओं में कई तरह के संक्रमण हो रहे हैं। सिगरेट, गांजा के नशे से फेफड़े में एलर्जी, अस्थमा हो रहा है। वहीं आईवी के माध्यम से नशे से निमोनिया, संक्रमण और एचआईवी के साथ कुपोषण जैसी दिक्कतों का सामना करते हैं। कुपोषण की वजह से टीबी हाेने का खतरा ज्यादा रहता है।
नशे के लिए इन दवाओं का इस्तेमाल
नारकोटिक्स के एक जानकार ने बताया कि नशे के लिए युवा स्पास्मो प्राक्सीवान, एंटी एलर्जिक टेबलेट एविल, नारफिन एंपुल, नाइट्रोसीन टेबलेट, आयोडेक्स और कोरेक्स सिरप का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। इनमें से नारफिन व नाइट्रोसीन को तो प्रतिबंधित कर दिया गया है, फिर भी ये मेडिकल स्टोर्स से चोरी-छिपे बेचे जा रहे हैं।
यह होता है सिंथेटिक ड्रग
सिंथेटिक ड्रग्स वे नशीले पदार्थ होते हैं जो प्राकृतिक स्रोतों से नहीं बल्कि रासायनिक रूप से लैब में बनाए जाते हैं। इन्हें कृत्रिम ड्रग्स भी कहा जाता है। ये प्राकृतिक ड्रग्स (जैसे अफीम, गांजा, अफीम से बनी हेरोइन) के असर की नकल करते हैं या कभी-कभी उनसे भी अधिक तीव्र असर डालते हैं। उदाहरण एमडीएमए (एक्स्टसी), मेथैम्फेटामाइन (आइस, क्रिस्टल मेथ), एलएसडी, फेंटेनल।
बर्बाद हो गया घर-बार
सहजनवां इलाके की एक छात्रा ने वकील बनने का सपना लेकर शहर के एक कॉलेज में प्रवेश लिया। यहां आने के बाद उसकी पढ़ाई अच्छी चल रही थी। हॉस्टल की दोस्तों ने उसे भरोसे में लेकर शराब, सिगरेट और हुक्का की लत लगा दी। पिता दूसरे प्रदेश में नौकरी करते थे।
वह शराब भी पीने लगी, जिससे उसकी किडनी खराब हो गई। इसके बाद उसे घर जाना पड़ा। बेटी की तबीयत खराब होने की खबर सुनकर पिता घर आए। उसके इलाज की वजह से उनकी नौकरी भी चली गई। छात्रा की हालत इतनी खराब हो गई कि अब उसकी डायलिसिस चल रही है। अब वह जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रही है। इलाज के लिए खेत भी बेचना पड़ा है।
हुक्का और शराब की लत, हो गई फेल
पिपराइच क्षेत्र की रहने वाली छात्रा ने डीडीयू में प्रवेश लिया। वह शहर में ही किराए का कमरा लेकर रहने लगी। शहर में आने के बाद वह दोस्तों के चक्कर में नशा करने लगी। दोस्तों ने पहले उसे हुक्का पिलाया। फिर कई बार हुक्का बार ले गए। इसके बाद सिगरेट, शराब भी पिलाने लगे। नशे की लत के कारण उसका स्वास्थ्य खराब हो गया, जिससे पढ़ाई भी प्रभावित हुई। वह एक सेमेस्टर में फेल हो गई।
सिंथेटिक ड्रग्स को लेकर एजेंसियां अलग-अलग इनपुट पर कार्रवाई करती आ रही हैं। डिजिटल प्लेटफाॅर्म को एजेंसी एक तरह से चुनौती की तरह ले रही है। उम्मीद है कि जल्द ही इसपर भी बड़ी कार्रवाई की जा सकती है। नशे से रोकथाम की दवा नहीं है, सिर्फ जागरूकता ही एकमात्र इसका सबसे मुफीद रास्ता है। हमारी टीम गोरखपुर के अलावा महराजगंज, सिद्धार्थनगर और आसपास के जिलों में लगातार इनपर कार्रवाई कर रही है: अनिल कुमार विश्वकर्मा, सहायक नारकोटिक्स आयुक्त, लखनऊ