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ज्ञान की बात: 33 साल तक ट्रेनों के कोच में नहीं थी लाइट, जानिए कब और क्यों हुई व्यवस्था
Tue, 08 Jun 2021 08:14 PM IST
vivek shukla
राजन राय, गोरखपुर।
राजन राय, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Tue, 08 Jun 2021 08:14 PM IST
सार
20 के दशक की शुरुआत तक एनईआर पर प्रकाश व्यवस्था पिंट्स गैस प्रणाली थी।
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- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
देश में ट्रेनों के कोच में 33 साल तक लाइट नहीं थी। सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कोचों में पहली बार 1986- 87 में लाइटिंग की गई थी। पिंट्स गैस प्रणाली के तहत लाइट लगाए गए।
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पूर्वोत्तर रेलवे के दस्तावेज त्रिवेणी ऑफ रेलवे में इस बात का जिक्र है कि वैगनों की रोशनी के लिए लैंप कैरिज विभाग के कर्मचारियों के प्रभारी होते थे। प्रत्येक जिले में स्टेशनों को आवंटित किए जाने वाले लैंपों की संख्या जिला लोको और यातायात अधिकारियों द्वारा निर्धारित की जानी थी।
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जब यात्रियों को ले जाने के लिए माल वैगनों का उपयोग करना आवश्यक होता था, तो उन्हें मेला अवधि के दौरान मिश्रित और मालगाड़ियों से जोड़ा जाता था और रात में चलती थी।
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रेलवे गाड़ियों की रोशनी 1886- 87 के लिए रेलवे प्रशासन की रिपोर्ट में कहा गया है कि पिंट्स गैस प्रणाली विद्युत प्रकाश व्यवस्था से कहीं बेहतर थी क्योंकि बाद में तेल के लैंप द्वारा प्रकाश व्यवस्था की तुलना में 50 फीसदी अधिक महंगा था।
भारत में चल रहे अन्य रेलवे में गैस लाइटिंग लोकप्रिय थी। 20 के दशक की शुरुआत तक एनईआर पर प्रकाश व्यवस्था पिंट्स गैस प्रणाली थी। हालांकि इलेक्ट्रिक लाइट आई और पूरी तरह से गैस सिस्टम को बदल दिया।
भारत में ट्रेन का इतिहास 168 साल से भी ज्यादा पुराना है। भारत में पहली ट्रेन 16 अप्रैल को मुंबई से ठाणे के बीच 1853 में चली थी। यह ट्रेन केवल 34 किलोमीटर चली थी।