Gorakhpur News: सोच बदलिए, सड़क पर ही खरीदारी की आदत छूटे...तब बदलेगी शहर की सूरत
डीडीयू समाजशास्त्र विभाग के प्रो. डॉ मनीष पांडेय ने कहा कि स्ट्रीट विक्रेता आधुनिक शहरी जीवन की अनौपचारिक आपूर्ति लाइनें हैं। यह भीड़-भाड़ वाली जगहों पर अपनी दुकानें लगाते हैं। स्ट्रीट शॉप का विकास शहरों के विकास के साथ ही होता है, इसलिए यह अनियोजित होते हैं।
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गोरखपुर शहर में विकास की रफ्तार के साथ सबकुछ व्यवस्थित करना अब बड़ी चुनौती बन गई है। रुस्तमपुर, ट्रांसपोर्टनगर समेत कई जगहों पर ठेले वालों को जगह दी गई, ताकि वह व्यापार कर सके और जाम भी न लगे, लेकिन वह फिर बाहर आ जाते हैं।
बुधवार को एक बार फिर पुलिस ने रुस्तमपुर में ठेले वालों को आवंटित जगह में भेज दिया, लेकिन यह कवायद कितने दिन कारगर रहेगा, यह बड़ा सवाल है। इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह सोच है। लोगों को जब खुद सामान खरीदना होता है तो वह सड़क पर ही गाड़ी से लेना चाहते हैं, लेकिन जब वह खुद फंसते हैं तो दूसरों को जाम के लिए जिम्मेदार बताकर कोसते हैं।
सोच के साथ ही एक वजह वसूली भी है। इसे सह देने के पीछे तीन तरह के लोगों की अहम भूमिका होती है। पहला तो ठेले को अपने दुकान के सामने लगाने वाले दुकानदार की भूमिका होती है। वह हर ठेले से 100 से 200 रुपये लेता है।
इसके बाद नगर निगम ने कुछ कर्मचारी जो आंख मूंद लेते हैं, वह कैसे होता है, इसे हर कोई जानता है। रही सही कसर को पुलिस वाले पूरा कर देते हैं। उनका तर्क सीधा होता है कि ठेला हटाना उनका काम नहीं है, नगर निगम अतिक्रमण हटाने को जिम्मेदार है तो फिर महीने में अगर सब्जी-फल ही मिल जाए तो क्या नुकसान है।
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इस तिकड़ी के बीच एक ठेला बाहर आया तो उसे देखते ही दूसरा हिम्मत करके सिस्टम में शामिल हो जाता है और फिर एक-एक कर पूरी कोशिश बेकार हो जाती है और सब लोग सड़क पर आ जाते हैं।
दूसरे, वह लोग भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। अगर एक ठेला बाहर आया तो उससे बेहतर सामान बेचने वाला ठेला अगर अंदर है तो कोई वहां नहीं जाना चाहता है, जिस वजह से अंदर गए ठेले वालों का नुकसान होना लगता है और फिर वह बाहर आ ही जाते हैं।
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डीडीयू समाजशास्त्र विभाग के प्रो. डॉ मनीष पांडेय ने कहा कि स्ट्रीट विक्रेता आधुनिक शहरी जीवन की अनौपचारिक आपूर्ति लाइनें हैं। यह भीड़-भाड़ वाली जगहों पर अपनी दुकानें लगाते हैं। स्ट्रीट शॉप का विकास शहरों के विकास के साथ ही होता है, इसलिए यह अनियोजित होते हैं। शहर विशेष की संस्कृति के पहचान के रूप में स्ट्रीट शॉपिंग लोगों के जीवन व्यवहार का एक हिस्सा हैं और मानव व्यवहार में आसानी से बदलाव संभव नहीं है। दूसरी तरफ बाजार की अवधारणा में नए स्थान पर ग्राहक को आकर्षित करने तक ठेलेवालों या किसी भी व्यवसायी को मंदी जैसे समय का सामना करना पड़ता है। ऐसे में स्ट्रीट वेंडर्स को नियोजित कर विशेष स्थान पर नियत कर देना और स्थानीय समुदाय की बाजार संस्कृति में त्वरित परिवर्तन कर देना थोड़ा मुश्किल भरा है।