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Gorakhpur News: कानूनी दांवपेंच से बचने को जांचें बढ़ाईं तो खर्च से मरीज भी हुए परेशान

Sun, 06 Oct 2024 04:46 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Sun, 06 Oct 2024 04:46 AM IST
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Gorakhpur News: To avoid legal complications, tests were increased and patients were also troubled by the expense.
गोरखपुर। भगवान का दूसरा रूप कहे जाने वाले डॉक्टरों की प्रतिष्ठा समाज में कम हो रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह चिकित्सा व्यवस्था में बढ़ता व्यवसायीकरण है। डॉक्टरों ने जांच को इलाज असफल होने पर कानूनी दांव-पेंच से बचने का माध्यम बना रखा है। किसी प्रकार की शिकायत होने पर डॉक्टर बताते हैं कि उन्होंने इलाज किस जांच रिपोर्ट के आधार पर की। जानकारों का मानना है कि जांचें बढ़ाने से लोगों का खर्च भी बड़ा और उसी से वे परेशान होकर विरोध करने लगे। शुक्रवार को शहर के एक निजी नर्सिंग होम में डॉक्टर पर हमले की वारदात भी जांच कराने की बात को लेकर ही हुई।
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भालोटिया मार्केट के पास दवा की दुकान चलाने वाले राजेंद्र अग्रवाल कहते हैं कि महज 20 साल पहले तो डॉक्टर ही नहीं, कंपाउंडर (फार्मासिस्ट) को भी साहब कहा जाता था। डॉक्टर साहब मरीज को कोई जांच कराने को तभी कहते थे, जब उनको लगता था कि ऐसा करना एकदम जरूरी है, लेकिन आज ऐसा नहीं है। आज आप किसी डॉक्टर के पास पेट दर्द की शिकायत लेकर जाइए, तो वहां पहले पांच हजार रुपये की जांच करा देते हैं। लोगों को लगता है कि कहीं न कहीं उसकी मजबूरी का फायदा उठाया जा रहा है।
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स्वास्थ्य विभाग से सेवानिवृत डॉ. आरके सिंह बताते हैं कि जबसे अस्पतालों में मरीज को उपभोक्ता माना जाने लगा, तभी से यह दिक्कत आई है। दरअसल, मरीज को अगर इलाज से फायदा नहीं हुआ तो वह डॉक्टर पर गलत इलाज का आरोप लगाते हुए केस कर देता है। अब वहां डॉक्टर को खुद को सही साबित करने के लिए डॉक्यूमेंट चाहिए।
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अस्पतालों में भीड़ से बिगड़ रही व्यवस्था



बीआरडी मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. रामकुमार जायसवाल कहते हैं कि वार्ड में भर्ती 50 मरीजों को इंजेक्शन लगाना है और एक ही स्टाफ नर्स ड्यूटी पर है। अगर एक बेड पर एक मिनट का भी समय दिया तो 50 मिनट लगेंगे। ऐसे में दूसरे छोर पर भर्ती मरीज का आरोप होता है कि उसकी देखभाल नहीं हो रही है। वहीं चिकित्सा स्टाफ कार्य की अधिकता को लेकर परेशान होता है। इसी बात को लेकर अक्सर ही डॉक्टर और मरीजों में विवाद होता है।



एक साल में करीब 50 मामलों में गठित हुई जांच समिति



निजी अस्पतालों में इलाज में लापरवाही के करीब 50 मामले इस साल जनवरी से अब तक सीएमओ कार्यालय पहुंचे हैं। यह वे मामले हैं, जिसे गंभीर मानते हुए जांच कमेटी गठित की गई है। इसमें से एक मामले में नर्सिंग होम पर कार्रवाई हुई है, जबकि 35 मामलों में इलाज को सही मानते हुए क्लीन चिट दे दी गई है। हालांकि, शिकायतकर्ता इससे संतुष्ट नहीं हैं।



बोले जिम्मेदार--



रेफरल सिस्टम लागू हो



लोग सामान्य इलाज भी विशेषज्ञ डॉक्टर से कराना चाहते हैं। विशेषज्ञ डॉक्टर जब जांच शुरू कराता है, तब लगता है कि यह तो मरीज के साथ लूट हो रही है। जबकि, कायदे से होना यह चाहिए कि पहले मरीज किसी सामान्य एमबीबीएस या एमडी से अपना इलाज कराए। वहां से वह डॉक्टर प्राथमिक लक्षण के आधार पर विशेषज्ञ के पास मरीज को रेफर करे।



-डॉ. महेंद्र अग्रवाल, पूर्व अध्यक्ष आईएमए



मरीज के साथ बढ़ाएं संवेदनशीलता



मरीज अगर गंभीर है तो उसका इलाज दूसरे मरीज के नंबर से पहले करेंगे। यही व्यवस्था मरीज को माननी होगी कि अगर कोई गंभीर है तो उसका इलाज पहले होना चाहिए। दूसरे जांच व दवा के लिए मरीज को स्वतंत्रता देनी चाहिए, लेकिन जो जांचकर्ता व दवा विक्रेता हैं, वह भी विश्वसनीय होना चाहिए, जिससे कि इलाज में एकरूपता रहे।



-डॉ. डीके सिंह, पूर्व अध्यक्ष आईएमए



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व्यावहारिक सामंजस्य जरूरी है



लोगों में धैर्य खत्म होता जा रहा है। यह हर क्षेत्र की समस्या है। शुक्रवार की घटना भी इसी का परिणाम है। डॉक्टरी पेशा ऐसा है, जिसमें मरीज ठीक हो गया तो वाह-वाह, लेकिन अगर कोई दिक्कत हुई तो सारी लानत डॉक्टर को ही झेलनी होती है। जबकि डॉक्टर केवल इलाज का निमित मात्र ही होता है, यह सबको पता है। किसी भी स्थिति में मारपीट को सही नहीं ठहराया जा सकता। डॉक्टर और मरीज के बीच व्यावहारिक सामंजस्य जरूरी है। अन्यथा सिस्टम बिगड़ते देर नहीं लगती है।




-डॉ. स्मिता जायसवाल, अध्यक्ष आईएमए



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भीड़ का प्रबंधन सबसे जरूरी



अस्पतालों में बढ़ते हंगामा की सबसे बड़ी वजह बेतहाशा बढ़ती मरीजों की भीड़ है। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर और अन्य कर्मचारी वर्कलोड से प्रभावित हैं। निजी अस्पतालों में आए मरीज सुविधाएं तो बेहतर चाहते हैं, लेकिन जब पैसा खर्च करने की बात होती है, तब उन्हें सब कुछ महंगा लगने लगता है। इस तरह के केस हर दिन आ रहे हैं। अधिकतर मामलों में मैनेज करने का प्रयास किया जाता है, लेकिन कई बार स्थितियां नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं। जैसे मरीज अपनी सहूलियत सोचता है, उसे वैसे ही डॉक्टर व उनके स्टाफ के बारे में भी सोचना चाहिए। अस्पताल के कर्मियों को भी अपने व्यवहार में संवेदनशीलता लानी होगी।



डॉ. अमित मिश्रा, सचिव आईएमए
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