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Gorakhpur News: गुस्से में किशोर ने निगल ली थीं 17 कीलें, कोलोनोस्कोपी की मदद से निकाली गईं

Mon, 16 Jun 2025 12:52 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Mon, 16 Jun 2025 12:52 AM IST
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Gorakhpur News: In anger, the teenager had swallowed 17 nails, they were removed with the help of colonoscopy
पेट में दर्द होने पर दी जानकारी, घर वाले ले गए निजी अस्पताल
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गोरखपुर। आजकल मां-बाप की डांट से बच्चे इस कदर उग्र हो रहे हैं कि वे कोई भी कदम उठा ले रहे हैं। गोरखनाथ क्षेत्र में फर्नीचर का काम करने वाले एक कारीगर के 14 वर्षीय बेटे ने घरवालों से नाराज होकर गुस्से में लोहे की 16-17 कीलें निगल लीं। 24 घंटे बाद जब पेट में असहनीय दर्द और चुभन शुरू हुई तब जाकर उसने बात घरवालों को बताईं। घरवाले पहले सरकारी अस्पताल ले गए, वहां से शहर के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। कोलोनोस्कोपी की मदद से सभी कीलें बाहर निकाल ली गई हैं। अब उसकी हालत खतरे से बाहर बताई जा रही है।
परिजनों ने बताया कि लड़के को अच्छी आदत सिखाने के लिए पिता ने हल्की डांट लगाई थी। इससे नाराज होकर घर में फर्नीचर बनाने के लिए रखीं छोटी-छोटी 16-17 कीलें निगल लीं। अगले दिन पेट दर्द और चुभन होने लगा। पहले तो उसने इधर-उधर की बात कही, लेकिन जब दवा से आराम नहीं मिला और दर्द बढ़ता गया, तब घरवालों को सचाई बताई।
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परिजनों ने कील निकालने के लिए घरेलू उपाय के रूप में उसे केले खिलाए, लेकिन आराम मिलने के बजाय दर्द बढ़ता गया।
परिजन उसे एक सरकारी अस्पताल लेकर गए, जहां से रेफर कर दिया गया। इसके बाद वे शहर के ही एक प्राइवेट अस्पताल लेकर पहुंचे। वरिष्ठ गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट डॉ. विवेक मिश्र ने एक्स-रे करवाया। रिपोर्ट में कीलें छोटी और बड़ी आंत के जंक्शन पर धंसे होने की जानकारी मिली। नुकीली कीलें धंसने की वजह से आंत में घाव हो गया था। कील निकालने के लिए कोलोनोस्कोपी की मदद ली गई। लगभग एक घंटे में सभी कीलें निकल जाने पर किशोर को पेट दर्द से राहत मिली।
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गुस्से में किशोर पहले भी कर चुके हैं बड़ी वारदात

केस एक
पिपराइच इलाके में बीते साल तीन दिसंबर को एक किशोर ने अपनी मां की जान केवल इसीलिए ले ली थी कि उन्होंने स्कूल पहुंचकर बेटे को डांट दिया था। स्कूल जाने का दबाव बनाने पर बेटे ने घर में मां को धक्का दे दिया, जिससे फर्श पर गिरकर घायल होने से उनकी मौत हो गई। इसके बाद वह तीन दिन तक घर में ही रहा और शव भी वहीं पड़ा रहा। बदबू न फैले, इसलिए शव के पास अगरबत्ती जलाता था।
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चिमटा गरम कर बच्ची को जला दिया

चिलुआताल थाना क्षेत्र की रहने वाली एक महिला ने अपनी बेटी को मामा के घर शाहपुर थाना क्षेत्र में भेजा था। वहां से एक रिश्तेदार महिला मासूम को अपने घर ले गईं। रिश्तेदार महिला ने बेटी के सड़क पर गिरकर घायल होने और मीठा खाने से तबीयत बिगड़ने की सूचना दी और बताया कि उसे मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया है। मां मेडिकल कॉलेज पहुंची तो देखा कि बेटी को काफी चोट लगी है। डॉक्टर ने बच्ची के साथ दुष्कर्म की आशंका जाहिर की। बेटी ने बताया कि उसे दीदी (आरोपी किशोरी) और उनकी मां ने मिलकर बहुत पीटा, दांत से काटा और चिमटा गरम करके शरीर पर कई जगह जला दिया।

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सीरियल देखकर मासूम की ले ली जान

दिसंबर में ही कुशीनगर जिले के तमकुहीराज इलाके के करनपट्टी गांव में दिल दहला देने वाली वारदात सामने आई थी। वहां 12 साल की फुफेरी बहन ने मासूम को पानी से भरी टंकी में डालकर ढक्कन बंद कर दिया था। बच्ची को पानी की टंकी में डालने का ख्याल उसे टीवी पर आने वाले अपराध आधारित धारावाहिक देखकर आया था। बालिका से जब-जब पूछताछ की गई तो वह हर बार अलग-अलग कहानी सुनाती रही। उसके चेहरे पर न तो अपराधबोध दिखा और न ही किसी तरह का पछतावा।
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वर्जन

अक्सर छोटे बच्चे खेलते-खेलते कोई सामान निगल लेते हैं, लेकिन यह अपनी तरह का एक अलग ही मामला था। कीलें निगलते वक्त कहीं नहीं चुभीं, बल्कि वह छोटी व बड़ी आंत के जंक्शन पर जाकर धंस गई थीं। इसी वजह से यह आगे नहीं बढ़ रही थीं। अगर जल्द इन्हें बाहर नहीं निकाला जाता तो आंत क्षतिग्रस्त हो जाती।




डॉ. विवेक मिश्र, गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट
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वर्जन
ये घटनाएं इस ओर इशारा करती हैं कि बड़े ही नहीं, अब बच्चों में मानसिक तनाव के मामले बढ़ रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि मां-बाप के पास बच्चों की भावनाओं को समझने और उनसे बात करने के लिए वक्त नहीं है। खाली समय में मोबाइल व दूसरे अन्य कार्यों में व्यस्त होने की वजह से लोगों का अपने परिजनों से भी संवाद घटता जा रहा है। मां-बाप को पता ही नहीं लगता कि उनकी संतान किस मन:स्थिति से गुजर रही है। कोई भी व्यक्ति हिंसक कदम तभी उठाता है, जब उसे इस बात का एहसास होने लगता है कि उसकी भावना को कोई समझ नहीं रहा है। उसे लगता है कि कोई उसकी चिंता ही नहीं करता, इसलिए वह दूसरों की चिंता क्यों करे? ऐसी स्थिति में अगर बच्चे को परिजनों का साथ मिल जाए और किसी अच्छे डॉक्टर के पास ले जाएं तो वह आसानी से इसका इलाज कर देगा।
डाॅ. तापस कुमार आइच, विभागाध्यक्ष मनोचिकित्सा विभाग, बीआरडी मेडिकल कॉलेज
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