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Gorakhpur News: चिड़ियाघर और नौका विहार पार्ट टू के पास प्रतिबंधित रहेगी आतिशबाजी
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रॉकेट की चिंकारी से जानवरों के बाड़े में आग लगने का रहता है खतरा
गोरखपुर। दीपावली से लेकर छठ पर्व तक शहर में आतिशबाजी अपने चरम पर रहती है लेकिन यही चिड़ियाघर में रह रहे जानवरों के लिए खतरा बन जाती है। तेज आवाज वाले पटाखों से जानवर भयभीत होकर व्याकुल हो जाते हैं। इसको देखते हुए चिड़ियाघर प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि वे चिड़ियाघर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में पटाखे न फोड़ें। साथ ही नौका विहार पार्ट टू से होकर गुजरने वाली सड़क पर आतिशबाजी पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा।
चिड़ियाघर के उप निदेशक एवं मुख्य वन्यजीव चिकित्सक डॉ. योगेश प्रताप सिंह ने बताया कि सबसे अधिक खतरा रॉकेट से होता है। अगर कोई रॉकेट जानवरों के बाड़े के ऊपर बने फूस के छप्पर पर गिरा तो आग लग सकती है। इस जोखिम को कम करने के लिए प्रशासन छप्परों को नियमित रूप से पानी से भिगो रहा है ताकि वे चिंगारी से न जलें। इसके अलावा बाड़ों के आसपास पड़े सूखे पत्तों की सफाई भी लगातार की जा रही है।
तेज आवाज वाले पटाखों से जानवरों की दिनचर्या प्रभावित होती है। शोर के कारण वे बेचैन हो जाते हैं और उनकी भूख भी खत्म हो जाती है। इस प्रभाव को कम करने के लिए पशु-पक्षियों को सूरज ढलने से पहले ही भोजन दे दिया जा रहा है। साथ ही शाम के समय बाड़ों में एग्जॉस्ट फैन चलाए जा रहे हैं ताकि पटाखों की आवाज कुछ हद तक दब सके।
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गोरखपुर। दीपावली से लेकर छठ पर्व तक शहर में आतिशबाजी अपने चरम पर रहती है लेकिन यही चिड़ियाघर में रह रहे जानवरों के लिए खतरा बन जाती है। तेज आवाज वाले पटाखों से जानवर भयभीत होकर व्याकुल हो जाते हैं। इसको देखते हुए चिड़ियाघर प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि वे चिड़ियाघर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में पटाखे न फोड़ें। साथ ही नौका विहार पार्ट टू से होकर गुजरने वाली सड़क पर आतिशबाजी पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा।
चिड़ियाघर के उप निदेशक एवं मुख्य वन्यजीव चिकित्सक डॉ. योगेश प्रताप सिंह ने बताया कि सबसे अधिक खतरा रॉकेट से होता है। अगर कोई रॉकेट जानवरों के बाड़े के ऊपर बने फूस के छप्पर पर गिरा तो आग लग सकती है। इस जोखिम को कम करने के लिए प्रशासन छप्परों को नियमित रूप से पानी से भिगो रहा है ताकि वे चिंगारी से न जलें। इसके अलावा बाड़ों के आसपास पड़े सूखे पत्तों की सफाई भी लगातार की जा रही है।
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तेज आवाज वाले पटाखों से जानवरों की दिनचर्या प्रभावित होती है। शोर के कारण वे बेचैन हो जाते हैं और उनकी भूख भी खत्म हो जाती है। इस प्रभाव को कम करने के लिए पशु-पक्षियों को सूरज ढलने से पहले ही भोजन दे दिया जा रहा है। साथ ही शाम के समय बाड़ों में एग्जॉस्ट फैन चलाए जा रहे हैं ताकि पटाखों की आवाज कुछ हद तक दब सके।
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