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Gorakhpur News: बेटे शिव से मिलकर शुरू होती है पिता गोपाल की दिनचर्या
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गोरखपुर। 20 साल के जवान बेटे को सेना की वर्दी पहनाकर गोपाल सिंह छेत्री सेवानिवृत्त हो गए थे। बेटा शिव सिंह छेत्री जम्मू कश्मीर के कुपवाड़ा सेक्टर में देश की रक्षा के लिए आतंकियों से मुकाबला करते हुए शहीद हो गए, लेकिन पिता का बेटे से वही गहरा नाता आज भी कायम है। बिछिया हनुमान मंदिर के पास रहने वाले गोपाल सिंह छेत्री भोर में साढ़े चार बजे मोहद्दीपुर ओवरब्रिज के पास लगी बेटे की प्रतिमा तक आते हैं और चबूतरे की सफाई के बाद अपनी दैनिक दिनचर्या शुरू करते हैं।
बेटे के गम में 23 साल की लंबी बीमारी के बाद पत्नी गीता भी स्वर्ग सिधार गईं। बड़े बेटे-बहू के साथ रहे रहे गोपाल कहते हैं कि सरकार को शहीद सैनिक के माता-पिता का भी अंतिम वक्त तक ख्याल रखना चाहिए।
गोरखा रेजिमेंट के जवान रहे गोपाल सिंह छेत्री के पिता नेपाल से भारत आकर यूपी पुलिस में भर्ती हुए थे। तब से उन्होंने भारत को ही अपनी कर्मभूमि के साथ-साथ मातृभूमि भी मान लिया। अब बिछिया हनुमान मंदिर के आगे वाली गली में घर बना चुके गोपाल ने 1996 में बेटे शिव को सेना में भर्ती होने के लिए प्रोत्साहित किया।
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स्मृतियों में खोए गोपाल बताते हैं कि उन दिनों वाराणसी में सेना की भर्ती हो रही थी। बेटा शिव पहले ही चयन में सफल रहा। प्रशिक्षण के बाद जब उसकी ज्वाइनिंग हुई तो देश सेवा की अपनी भावना को उसे सौंपकर हम घर आ गए। इसके एक साल बाद ही 14 अगस्त 1999 को कुपवाड़ा सेक्टर में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान शिव सिंह को गोली लगी थी। 22 अगस्त को सेना के हॉस्पिटल में इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली।
मोहद्दीपुर-असुरन मार्ग पर ओवरब्रिज के पास शहीद शिव सिंह छेत्री की प्रतिमा लगी है। पिता गोपाल के लिए यह जगह जीवंत है। वह हर दिन भोर में चार बजे उठकर सीधे यहीं आते हैं। प्रतिमा और चबूतरे की सफाई के बाद कुछ देर बेटे के पास एकांत में बैठते हैं। अपने मन की बात बेटे से साझा करते हैं, इसके बाद अपने को फिट रखने के लिए योग, व्यायाम करते हैं। करीब एक घंटे तक आसपास ही वक्त बिताने के बाद वापस घर आकर अन्य कार्यों में लग जाते हैं।
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मां प्यार से बुलाती थी दीपू, अंतिम वक्त तक रहीं बीमार
शहीद शिव सिंह छेत्री को घरवाले दीपू बुलाते थे। पिता गोपाल सिंह बताते हैं कि आखिरी बार आशीर्वाद लेकर ड्यूटी पर जाते बेटे का चेहरा उन्हें आज भी याद है। बेटे की शहादत के बाद मां गीता उसके गम में ऐसी डूबीं कि बीमार हो गईं। वर्ष 2022 में गीता भी स्वर्ग सिधार गईं। बेटे के गम ने मां को इतना कमजोर कर दिया था कि कोई भी दवा उनके दिल व दिमाग को आराम नहीं दे सकी।
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मां-बाप को मिलने चाहिए विशेष सुविधा
शहीद सैनिकों के मां-बाप की स्थिति पर चर्चा छिड़ते ही गोपाल सिंह छेत्री गंभीर हो जाते हैं। कहते हैं कि मां ने नौ माह गोद में पाला, खुद गीले में रहकर बेटे को अच्छी नींद दिलाई। पिता ने स्कूल, नौकरी, ट्रेनिंग के लिए भागदौड़ की। बेटा देश के लिए शहीद हुआ तो मां-बाप ने अपनी सारे अरमान खो दिए। अगर बेटा विवाहिता होता है तो उसे मिलने वाली सहायता राशि में पत्नी व मां को हिस्सा मिलता है। अगर बेटा अविवाहित है तो यह सुविधा मां को मिलती है। पेंशन भी मां को मिलती है, लेकिन पिता को कुछ नहीं मिलता। खुद को उदाहरण रखते हुए कहते हैं कि अगर मैं सेना से सेवानिवृत्त न होता और पेंशन नहीं पा रहे होते तो बुढ़ावा कैसे कटता? क्योंकि दो साल पहले पत्नी के निधन के बाद उसे मिलने वाली पेंशन बंद हो गई।
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बेटे के गम में 23 साल की लंबी बीमारी के बाद पत्नी गीता भी स्वर्ग सिधार गईं। बड़े बेटे-बहू के साथ रहे रहे गोपाल कहते हैं कि सरकार को शहीद सैनिक के माता-पिता का भी अंतिम वक्त तक ख्याल रखना चाहिए।
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गोरखा रेजिमेंट के जवान रहे गोपाल सिंह छेत्री के पिता नेपाल से भारत आकर यूपी पुलिस में भर्ती हुए थे। तब से उन्होंने भारत को ही अपनी कर्मभूमि के साथ-साथ मातृभूमि भी मान लिया। अब बिछिया हनुमान मंदिर के आगे वाली गली में घर बना चुके गोपाल ने 1996 में बेटे शिव को सेना में भर्ती होने के लिए प्रोत्साहित किया।
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स्मृतियों में खोए गोपाल बताते हैं कि उन दिनों वाराणसी में सेना की भर्ती हो रही थी। बेटा शिव पहले ही चयन में सफल रहा। प्रशिक्षण के बाद जब उसकी ज्वाइनिंग हुई तो देश सेवा की अपनी भावना को उसे सौंपकर हम घर आ गए। इसके एक साल बाद ही 14 अगस्त 1999 को कुपवाड़ा सेक्टर में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान शिव सिंह को गोली लगी थी। 22 अगस्त को सेना के हॉस्पिटल में इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली।
मोहद्दीपुर-असुरन मार्ग पर ओवरब्रिज के पास शहीद शिव सिंह छेत्री की प्रतिमा लगी है। पिता गोपाल के लिए यह जगह जीवंत है। वह हर दिन भोर में चार बजे उठकर सीधे यहीं आते हैं। प्रतिमा और चबूतरे की सफाई के बाद कुछ देर बेटे के पास एकांत में बैठते हैं। अपने मन की बात बेटे से साझा करते हैं, इसके बाद अपने को फिट रखने के लिए योग, व्यायाम करते हैं। करीब एक घंटे तक आसपास ही वक्त बिताने के बाद वापस घर आकर अन्य कार्यों में लग जाते हैं।
मां प्यार से बुलाती थी दीपू, अंतिम वक्त तक रहीं बीमार
शहीद शिव सिंह छेत्री को घरवाले दीपू बुलाते थे। पिता गोपाल सिंह बताते हैं कि आखिरी बार आशीर्वाद लेकर ड्यूटी पर जाते बेटे का चेहरा उन्हें आज भी याद है। बेटे की शहादत के बाद मां गीता उसके गम में ऐसी डूबीं कि बीमार हो गईं। वर्ष 2022 में गीता भी स्वर्ग सिधार गईं। बेटे के गम ने मां को इतना कमजोर कर दिया था कि कोई भी दवा उनके दिल व दिमाग को आराम नहीं दे सकी।
मां-बाप को मिलने चाहिए विशेष सुविधा
शहीद सैनिकों के मां-बाप की स्थिति पर चर्चा छिड़ते ही गोपाल सिंह छेत्री गंभीर हो जाते हैं। कहते हैं कि मां ने नौ माह गोद में पाला, खुद गीले में रहकर बेटे को अच्छी नींद दिलाई। पिता ने स्कूल, नौकरी, ट्रेनिंग के लिए भागदौड़ की। बेटा देश के लिए शहीद हुआ तो मां-बाप ने अपनी सारे अरमान खो दिए। अगर बेटा विवाहिता होता है तो उसे मिलने वाली सहायता राशि में पत्नी व मां को हिस्सा मिलता है। अगर बेटा अविवाहित है तो यह सुविधा मां को मिलती है। पेंशन भी मां को मिलती है, लेकिन पिता को कुछ नहीं मिलता। खुद को उदाहरण रखते हुए कहते हैं कि अगर मैं सेना से सेवानिवृत्त न होता और पेंशन नहीं पा रहे होते तो बुढ़ावा कैसे कटता? क्योंकि दो साल पहले पत्नी के निधन के बाद उसे मिलने वाली पेंशन बंद हो गई।