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बीआरडी मेडिकल कॉलेज: डॉ. अभिषो की मौत से सकते में आ गए साथी
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डॉ. अभिषो के व्यवहार को देखकर नहीं लगा था कि वह डिप्रेशन में हैं
गोरखपुर। बीआरडी मेडिकल कॉलेज के एनेस्थेसिया विभाग में कार्यरत जूनियर रेजिडेंट (जेआर) डॉ. अभिषो की मौत ने साथियों को झकझोर दिया है। दो दिन पहले ही उनके साथ परिसर में घूमे अन्य डॉक्टरों का कहना है कि उनका (डॉ. अभिषो) व्यवहार और परस्थिति देखकर बिल्कुल नहीं लगा कि वे डिप्रेशन में होंगे।
शुक्रवार को हुई घटना को लेकर शनिवार को भी परिसर में इसको लेकर चर्चाएं होती रहीं। सहकर्मियों और सीनियर डॉक्टरों का कहना था कि डॉ. अभिषो अपनी पढ़ाई को लेकर चिंतित तो रहते थे, लेकिन इसको लेकर वह तनाव या अवसाद जैसी स्थिति में नहीं दिखते थे। एक सीनियर ने बताया कि बृहस्पतिवार को उनसे मुलाकात हुई थी। वे बिल्कुल सामान्य बातचीत कर रहे थे। वह दो महीने बाद होने वाली परीक्षा की तैयारी में जुटे थे। केरल का होने के कारण भाषा की दिक्कत थी, जिस वजह से कम ही लोगों से उनकी बात होती थी। एक जेआर से उनकी ज्यादा गहरी दोस्ती थी।
परिसर में इस बात की चर्चा रही कि डॉ. अभिषो की थीसिस पहले ही जमा हो चुकी थी और पारिवारिक जीवन भी सामान्य था। उनकी पत्नी भी दूसरे मेडिकल कॉलेज में जेआर के रूप में कार्यरत हैं और जल्द ही बच्चे को जन्म देने वाली हैं। डॉ. अभीषो ने अवकाश का आवेदन भी दिया था।
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एनस्थिसिया के डॉक्टरों पर रहता है कार्य का बोझ, कम मिलती है तारीफ
सीनियर डॉक्टरों में हो रही चर्चा के अनुसार चिकित्सा क्षेत्र में डॉक्टरों में आत्महत्या के मामले में किए गए अध्ययन में सामने आया है कि एनेस्थेसिया के डॉक्टरों में आत्महत्या की घटनाएं अन्य विभागों की तुलना में सबसे अधिक होती है। इसका प्रमुख कारण ऑपरेशन थिएटर का अत्यधिक मानसिक दबाव, रोगी की जान की जिम्मेदारी और लगातार सतर्क रहने की आवश्यकता है। ऑपरेशन की सफलता का श्रेय अन्य विशेषज्ञों को मिलता है, जबकि मामला बिगड़ने पर सारा दोष एनेस्थेटिक पर आता है। इस वजह से वे जल्द डिप्रेशन के शिकार होते हैं। एनेस्थेसिया विशेषज्ञों के पास तीव्र असर वाली दवाओं तक सीधी पहुंच होती है। वे इन दवाओं के प्रभाव, मात्रा और दुष्प्रभावों को अच्छी तरह समझते हैं।
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कोट
यह मास्क डिप्रेशन या स्माइली डिप्रेशन का मामला हो सकता है। इस तरह के केस में व्यक्ति बाहर से सामान्य और खुश दिखाई देता है, लेकिन अंदर ही अंदर वह गंभीर मानसिक अवसाद से जूझ रहा होता है। ऐसे मामलों में व्यक्ति अचानक आत्महत्या जैसा कदम उठा लेता है, जिससे परिवार और सहयोगी पूरी तरह से अचंभित रह जाते हैं।
डॉ. तपस कुमार आइच, विभागाध्यक्ष मानसिक रोग विभाग
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गोरखपुर। बीआरडी मेडिकल कॉलेज के एनेस्थेसिया विभाग में कार्यरत जूनियर रेजिडेंट (जेआर) डॉ. अभिषो की मौत ने साथियों को झकझोर दिया है। दो दिन पहले ही उनके साथ परिसर में घूमे अन्य डॉक्टरों का कहना है कि उनका (डॉ. अभिषो) व्यवहार और परस्थिति देखकर बिल्कुल नहीं लगा कि वे डिप्रेशन में होंगे।
शुक्रवार को हुई घटना को लेकर शनिवार को भी परिसर में इसको लेकर चर्चाएं होती रहीं। सहकर्मियों और सीनियर डॉक्टरों का कहना था कि डॉ. अभिषो अपनी पढ़ाई को लेकर चिंतित तो रहते थे, लेकिन इसको लेकर वह तनाव या अवसाद जैसी स्थिति में नहीं दिखते थे। एक सीनियर ने बताया कि बृहस्पतिवार को उनसे मुलाकात हुई थी। वे बिल्कुल सामान्य बातचीत कर रहे थे। वह दो महीने बाद होने वाली परीक्षा की तैयारी में जुटे थे। केरल का होने के कारण भाषा की दिक्कत थी, जिस वजह से कम ही लोगों से उनकी बात होती थी। एक जेआर से उनकी ज्यादा गहरी दोस्ती थी।
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परिसर में इस बात की चर्चा रही कि डॉ. अभिषो की थीसिस पहले ही जमा हो चुकी थी और पारिवारिक जीवन भी सामान्य था। उनकी पत्नी भी दूसरे मेडिकल कॉलेज में जेआर के रूप में कार्यरत हैं और जल्द ही बच्चे को जन्म देने वाली हैं। डॉ. अभीषो ने अवकाश का आवेदन भी दिया था।
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एनस्थिसिया के डॉक्टरों पर रहता है कार्य का बोझ, कम मिलती है तारीफ
सीनियर डॉक्टरों में हो रही चर्चा के अनुसार चिकित्सा क्षेत्र में डॉक्टरों में आत्महत्या के मामले में किए गए अध्ययन में सामने आया है कि एनेस्थेसिया के डॉक्टरों में आत्महत्या की घटनाएं अन्य विभागों की तुलना में सबसे अधिक होती है। इसका प्रमुख कारण ऑपरेशन थिएटर का अत्यधिक मानसिक दबाव, रोगी की जान की जिम्मेदारी और लगातार सतर्क रहने की आवश्यकता है। ऑपरेशन की सफलता का श्रेय अन्य विशेषज्ञों को मिलता है, जबकि मामला बिगड़ने पर सारा दोष एनेस्थेटिक पर आता है। इस वजह से वे जल्द डिप्रेशन के शिकार होते हैं। एनेस्थेसिया विशेषज्ञों के पास तीव्र असर वाली दवाओं तक सीधी पहुंच होती है। वे इन दवाओं के प्रभाव, मात्रा और दुष्प्रभावों को अच्छी तरह समझते हैं।
कोट
यह मास्क डिप्रेशन या स्माइली डिप्रेशन का मामला हो सकता है। इस तरह के केस में व्यक्ति बाहर से सामान्य और खुश दिखाई देता है, लेकिन अंदर ही अंदर वह गंभीर मानसिक अवसाद से जूझ रहा होता है। ऐसे मामलों में व्यक्ति अचानक आत्महत्या जैसा कदम उठा लेता है, जिससे परिवार और सहयोगी पूरी तरह से अचंभित रह जाते हैं।
डॉ. तपस कुमार आइच, विभागाध्यक्ष मानसिक रोग विभाग