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विशेष: हिंदी के कई लेखकों की कर्म व जन्मभूमि है गोरक्षनगरी, कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने यहीं गुजारा था सालों

Tue, 14 Sep 2021 12:41 PM IST
vivek shukla अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Tue, 14 Sep 2021 12:41 PM IST
सार

करीब पांच साल तक कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने यहीं गुजारा था, दशरथ प्रसाद द्विवेदी ने स्वदेश अखबार निकाल हिंदी को बढ़ाया।

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Gorakhpur is birthplace of many Hindi writers
बाबा गोरखनाथ। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

गोरक्षनगरी हिंदी के कई विख्यात लेखकों-साहित्यकारों की कर्म व जन्मभूमि रही है। ऐसे लोगों ने देश में हिंदी को विशेष मुकाम दिलाया है। यह सिलसिला आज भी जारी है।  

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कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद गोरखपुर में नौ साल रहे। यहीं नौकरी की और त्यागपत्र देकर राष्ट्रीय आंदोलन में कूदे। उनकी ईदगाह और नमक की दारोगा जैसी कहानियों की जमीन यहीं की है। 19 अगस्त 1916 से 16 फरवरी 1921 तक प्रेमचंद जिस भवन में रहे, वहां उनकी स्मृतियों को संजोने की कोशिश की गई है। प्रेमचंद का साहित्य आज भी पूरे देश में सबसे अधिक पढ़ा जाता है। हिंदी का कोई भी विद्वान हो बिना उन्हें पढ़े पूर्ण नहीं माना जाता।
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इसी तरह आजादी की लड़ाई में जन-जन तक स्वराज का संदेश पहुंचाने में सशक्त माध्यम बने थे गोरखपुर से स्वदेश अखबार निकालने वाले दशरथ प्रसाद द्विवेदी। उन्होंने आजादी की लड़ाई के लिए दारोगा की नौकरी छोड़ दी थी। छह अप्रैल 1919 को उन्होंने स्वदेश का प्रकाशन शुरू किया। स्वदेश अखबार में उस समय के सभी प्रमुख साहित्यकार मसलन, अयोध्या प्रसाद उपाध्याय हरिऔध, मैथिली शरण गुप्त, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, गया प्रसाद शुक्ल स्नेही, जयशंकर प्रसाद, निराला और प्रेमचंद के लेख प्रकाशित होते थे।
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गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पहले अध्यक्ष रहे रमाशंकर शुक्ल रसाल ने रीति कालीन काव्य पर विशेष कार्य किया। प्रो भगवती प्रसाद सिंह ने भक्तिकाल एवं प्रो रामचंद तिवारी ने हिंदी का महत्वपूर्ण गद्य साहित्य का इतिहास लिखा। नाटक एवं रंगमंच के क्षेत्र में प्रो गिरीश रस्तोगी ने हिंदी की पहचान देश स्तर पर बनाई। प्रो विश्वनाथ तिवारी साहित्य अकादमी के पहले अध्यक्ष रहे जो हिंदी भाषा के हैं। प्रो परमानंद श्रीवास्तव कविता के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पहचान बनाई। आजादी से पहले मन्नन द्विवेदी गजपुरी ने व्यंग शैली में रचनाएं लिखकर हिंदी साहित्य में विशिष्ट पहचान बनाई।

गोरखपुर विश्वविद्यालय के आचार्य प्रो प्रत्युष दुबे ने कहा कि हम अपनी विरासत को ठीक से पहचान लें तो बेहतर भविष्य एवं देश का निर्माण कर सकते हैं। हिंदी की मजबूत विरासत हमारे पास है। इससे प्रेरणा लेकर हिंदी को यथोचित सम्मान दिलाया जा सकता है। आज के समय में विज्ञान और प्रौद्योगिकी में हिंदी भाषा और उसके साथ ही देवनागरी लिपी के उचित प्रयोग की आवश्यकता है, ताकि हम अपनी भाषा और लिपि दोनों को बचा सकें।

साहित्यकार डॉ. फूलचंद प्रसाद गुप्त ने कहा कि हिंदी विश्व मंच पर प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कर चुकी है। अनेक विश्वविद्यालयों में हिंदी साहित्य का अध्ययन और अध्यापन हो रहा है। भारत में इसकी सर्वाधिक स्वीकार्यता है। यह जन मन की भाषा बन चुकी है। स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदी की अहम भूमिका रही। स्वतंत्र भारत में स्वावलंबन की आधारशिला और उस पर उन्नति का भव्य भवन हिंदी ने निर्मित किया। देश को आत्मनिर्भर बनाने में हिंदी की अहम भूमिका होगी।
 

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