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Gorakhpur News: बिकने से बचीं बेटियां, अब मेहनत कर बढ़ाएंगी परिवार का सम्मान
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गोरखपुर। सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर बेटियों को फंसाकर बेचने वाली गैंग सक्रिय है। हाल फिलहाल में जिले के अच्छे घरों की नाबालिग किशोरियां यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर बने अंजान दोस्त के जाल में फंस गईं। घर छोड़ने के बाद पता चला कि अंजान दोस्त उन्हें बेचने की फिराक में है, तब घर वालों की मदद से किसी तरह उनके चंगुल से छूटकर वापस आईं।
अब ठोकर खाईं बेटियां परिवार के लिए पढ़-लिखकर उनका खोया सम्मान वापस दिलाने का प्रयास कर रही हैं। चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (सीडब्ल्यूसी) की टीम इन किशोरियों की लगातार काउंसिलिंग कर रही है।
केस - 1
मेरठ के लड़के साथ भाग गई थी किशोरी
खोराबार क्षेत्र की हाईस्कूल की छात्रा (15) का इंस्टाग्राम पर मेरठ के लड़के से दोस्ती हो गई। मई में छात्रा युवक के गोरखपुर आने पर घर छोड़ उसके साथ रोडवेज बस से निकल गई। रास्ते में छात्रा ने घर पर बात करना चाही तो युवक ने उसका मोबाइल बंद दिया। कंडक्टर की मदद से पुलिस तक छात्रा पहुंची। पूछताछ में सामने आया कि युवक छात्रा को दिल्ली में बेचने ले जा रहा था।
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केस 2
राजस्थान के लड़के साथ निकली थी छात्रा
राजघाट क्षेत्र की 11वीं की छात्रा की फ्री फायर गेम खेलने के दौरान राजस्थान के युवक से दोस्ती हो गई। एक सप्ताह पहले युवक के साथ छात्रा बस से राजस्थान निकली। छात्रा को बातचीत से पता चला कि युवक ने नाम गलत बताया था। छात्रा बस से उतरने के लिए बोली। तब युवक ने नशीला पदार्थ सूंघाकर बेहोश कर दिया। होश में आने पर लोगों से छात्रा ने मदद ली। पुलिस ने युवक को पकड़ा तो पता चला कि वह जाल में फंसाकर किशोरियों को बेच देता है।
साइबर विशेषज्ञ की सलाह
कम उम्र के बच्चों को मोबाइल फोन देने से बचें।
बच्चे मोबाइल फोन पर कौन-कौन सा एप इस्तेमाल कर रहे हैं, इसकी जांच करें।
अंजान नंबर से आई कॉल या फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार न करें।
प्रोफाइल पर पड़ी तस्वीरें झूठी भी हो साबित होती हैं, उसके चक्कर में न पड़ें।
वर्चुअल नहीं फिजिकल जांच से ही वास्तविकता का पता चल पाता है।
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कोट
बेटियों द्वारा उठाया गए ऐसे कदम से सबसे अधिक परिवार प्रभावित होता है। समाज में इससे उनकी छवि धूमिल होती है। अंजान पर विश्वास करना और परिवार की बातें हवा में उड़ा देना, एक दिन वह दुख का कारण बनता है।
- प्रो. संगीता पांडेय, समाजशास्त्र, डीडीयू
युवा पीढ़ी भ्रम की चीजों को बहुत जल्द स्वीकार लेती है। मोबाइल फोन और सोशल मीडिया प्लेटफार्म से ही युवा जिंदगी का फैसला भी रहे हैं। ऐसे में अभिभावकों को 18 साल तक बच्चों का दोस्त बनकर समय देना होगा, तभी इस परेशानी से छुटकारा मिल सकता है।
- डॉ. आकृति पांडेय, मनोचिकित्सक
नाम और धर्म बदलकर सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर कम उम्र की किशोरियों को जाल में फंसाने के मामले बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे लड़के-लड़कियों की काउंसिलिंग की जाती है। तब एक बात सामने आती है कि अभिभावक बच्चों को सारी सुविधा रुपये-पैसे दे रहे हैं, लेकिन वह खुद उनके साथ बिल्कुल भी समय नहीं देते।
- वंदना सिंह, अध्यक्ष, सीडब्ल्यूसी
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अब ठोकर खाईं बेटियां परिवार के लिए पढ़-लिखकर उनका खोया सम्मान वापस दिलाने का प्रयास कर रही हैं। चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (सीडब्ल्यूसी) की टीम इन किशोरियों की लगातार काउंसिलिंग कर रही है।
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केस - 1
मेरठ के लड़के साथ भाग गई थी किशोरी
खोराबार क्षेत्र की हाईस्कूल की छात्रा (15) का इंस्टाग्राम पर मेरठ के लड़के से दोस्ती हो गई। मई में छात्रा युवक के गोरखपुर आने पर घर छोड़ उसके साथ रोडवेज बस से निकल गई। रास्ते में छात्रा ने घर पर बात करना चाही तो युवक ने उसका मोबाइल बंद दिया। कंडक्टर की मदद से पुलिस तक छात्रा पहुंची। पूछताछ में सामने आया कि युवक छात्रा को दिल्ली में बेचने ले जा रहा था।
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केस 2
राजस्थान के लड़के साथ निकली थी छात्रा
राजघाट क्षेत्र की 11वीं की छात्रा की फ्री फायर गेम खेलने के दौरान राजस्थान के युवक से दोस्ती हो गई। एक सप्ताह पहले युवक के साथ छात्रा बस से राजस्थान निकली। छात्रा को बातचीत से पता चला कि युवक ने नाम गलत बताया था। छात्रा बस से उतरने के लिए बोली। तब युवक ने नशीला पदार्थ सूंघाकर बेहोश कर दिया। होश में आने पर लोगों से छात्रा ने मदद ली। पुलिस ने युवक को पकड़ा तो पता चला कि वह जाल में फंसाकर किशोरियों को बेच देता है।
साइबर विशेषज्ञ की सलाह
कम उम्र के बच्चों को मोबाइल फोन देने से बचें।
बच्चे मोबाइल फोन पर कौन-कौन सा एप इस्तेमाल कर रहे हैं, इसकी जांच करें।
अंजान नंबर से आई कॉल या फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार न करें।
प्रोफाइल पर पड़ी तस्वीरें झूठी भी हो साबित होती हैं, उसके चक्कर में न पड़ें।
वर्चुअल नहीं फिजिकल जांच से ही वास्तविकता का पता चल पाता है।
कोट
बेटियों द्वारा उठाया गए ऐसे कदम से सबसे अधिक परिवार प्रभावित होता है। समाज में इससे उनकी छवि धूमिल होती है। अंजान पर विश्वास करना और परिवार की बातें हवा में उड़ा देना, एक दिन वह दुख का कारण बनता है।
- प्रो. संगीता पांडेय, समाजशास्त्र, डीडीयू
युवा पीढ़ी भ्रम की चीजों को बहुत जल्द स्वीकार लेती है। मोबाइल फोन और सोशल मीडिया प्लेटफार्म से ही युवा जिंदगी का फैसला भी रहे हैं। ऐसे में अभिभावकों को 18 साल तक बच्चों का दोस्त बनकर समय देना होगा, तभी इस परेशानी से छुटकारा मिल सकता है।
- डॉ. आकृति पांडेय, मनोचिकित्सक
नाम और धर्म बदलकर सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर कम उम्र की किशोरियों को जाल में फंसाने के मामले बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे लड़के-लड़कियों की काउंसिलिंग की जाती है। तब एक बात सामने आती है कि अभिभावक बच्चों को सारी सुविधा रुपये-पैसे दे रहे हैं, लेकिन वह खुद उनके साथ बिल्कुल भी समय नहीं देते।
- वंदना सिंह, अध्यक्ष, सीडब्ल्यूसी