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Gorakhpur News: अपनी विचारधारा साहित्य पर नहीं थोपते बड़े साहित्यकार - देवेंद्र आर्य
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गोरखपुर। कवि और आलोचक देवेन्द्र आर्य ने कहा कि सभी रचनाकारों और समय की सीमा होती है। प्रेमचंद भी इसके अपवाद नहीं हैं, लेकिन वे इन सीमाओं को लांघते हैं। उनके समय में आज जैसा दलित विमर्श नहीं था, इसके बावजूद उन्होंने तत्कालीन दलित मुद्दों पर अपनी कलम चलाई। वह गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रेमचंद की 143 वीं जयंती पर प्रेमचंद पीठ की ओर से आयोजित ‘प्रेमचंद का महत्व’ विषयक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि बड़े साहित्यकार अपनी विचारधारा अपने साहित्य पर कभी नहीं थोपते हैं।
विभाग के सहायक आचार्य डॉ. राम नरेश राम ने कहा कि प्रेमचंद का रचनात्मक संघर्ष ब्रिटिश कानून विशेष रूप से कर प्रणाली के विरुद्ध आक्रोश की सृजनात्मक अभिव्यक्ति है। विशिष्ट वक्ता युवा आलोचक अर्पण कुमार ने कहा कि प्रेमचंद के साहित्य में वर्णित किसानों की समस्याएं आज भी बनी हुई है जिसके चलते गांवों से पलायन जारी है। हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. दीपक प्रकाश त्यागी ने कहा कि प्रेमचंद पीठ की गतिविधियां बढ़ाई जाएंगी। उन्होंने प्रेमचंद पीठ के पूर्व प्रोफेसर परमानंद श्रीवास्तव के प्रयासों को भी याद किया। अध्यक्षता हिन्दी के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल राय ने व संचालन प्रो. राजेश मल्ल ने किया।
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प्रेमचंद का साहित्य कालजयी- प्रो. प्रेमव्रत
गोरखपुर। चन्द्रवती रमावती देवी आर्य महिला पीजी कॉलेज में प्रेमचंद की जयंती पर सोमवार को सेमिनार का आयोजन किया गया। मुख्य अतिथि गोविवि के हिन्दी विभाग के पूर्व प्रोफेसर प्रेमव्रत तिवारी ने कहा कि प्रेमचंद की कहानियों का क्षेत्र इतना व्यापक है कि उनके अध्ययन से तत्कालीन मानवीय जीवन एवं समाज को जाना और समझा जा सकता है। उनका साहित्य कालजयी है। कॉलेज की प्रबंधक डॉ. विजयलक्ष्मी मिश्रा, प्राचार्या डॉ. सुमन सिंह, तपस्या जायसवाल, डॉ. रेखा श्रीवास्तव, स्वप्निल पांडेय, डॉ. वीरेन्द्र गुप्त, डॉ. पवन, डॉ. प्रीति त्रिपाठी, डॉ. सारिका पांडेय आदि उपस्थित रहीं। संवाद
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समाज का यथार्थ रूप प्रस्तुत करते थे प्रेमचंद : डॉ. फूलचंद
गोरखपुर। प्रेमचंद यथार्थवादी आदर्श उन्मुख लेखक थे। वे समाज का यथार्थ रूप फिर आदर्श रूप प्रस्तुत करते थे। वे कथा सम्राट के रूप में ख्यातिलब्ध हैं। ये बातें एमपी इंटर काॅलेज के हिंदी विभाग के वरिष्ठ प्रवक्ता डाॅ.फूलचंद प्रसाद गुप्त ने कहीं। वह सोमवार को एमपी इंटर काॅलेज में प्रेमचंद की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। संचालन अभय प्रताप सिंह ने किया। उप प्रधानाचार्य जनार्दन गौड़, अनिल कुमार, हरिशंकर पांडेय, प्रेम कुमार, राधेश्याम मिश्र, हरिश्चंद्र यादव, शंभू यादव, शेषनाथ प्रसाद आदि मौजूद रहे। संवाद
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विभाग के सहायक आचार्य डॉ. राम नरेश राम ने कहा कि प्रेमचंद का रचनात्मक संघर्ष ब्रिटिश कानून विशेष रूप से कर प्रणाली के विरुद्ध आक्रोश की सृजनात्मक अभिव्यक्ति है। विशिष्ट वक्ता युवा आलोचक अर्पण कुमार ने कहा कि प्रेमचंद के साहित्य में वर्णित किसानों की समस्याएं आज भी बनी हुई है जिसके चलते गांवों से पलायन जारी है। हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. दीपक प्रकाश त्यागी ने कहा कि प्रेमचंद पीठ की गतिविधियां बढ़ाई जाएंगी। उन्होंने प्रेमचंद पीठ के पूर्व प्रोफेसर परमानंद श्रीवास्तव के प्रयासों को भी याद किया। अध्यक्षता हिन्दी के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल राय ने व संचालन प्रो. राजेश मल्ल ने किया।
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प्रेमचंद का साहित्य कालजयी- प्रो. प्रेमव्रत
गोरखपुर। चन्द्रवती रमावती देवी आर्य महिला पीजी कॉलेज में प्रेमचंद की जयंती पर सोमवार को सेमिनार का आयोजन किया गया। मुख्य अतिथि गोविवि के हिन्दी विभाग के पूर्व प्रोफेसर प्रेमव्रत तिवारी ने कहा कि प्रेमचंद की कहानियों का क्षेत्र इतना व्यापक है कि उनके अध्ययन से तत्कालीन मानवीय जीवन एवं समाज को जाना और समझा जा सकता है। उनका साहित्य कालजयी है। कॉलेज की प्रबंधक डॉ. विजयलक्ष्मी मिश्रा, प्राचार्या डॉ. सुमन सिंह, तपस्या जायसवाल, डॉ. रेखा श्रीवास्तव, स्वप्निल पांडेय, डॉ. वीरेन्द्र गुप्त, डॉ. पवन, डॉ. प्रीति त्रिपाठी, डॉ. सारिका पांडेय आदि उपस्थित रहीं। संवाद
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समाज का यथार्थ रूप प्रस्तुत करते थे प्रेमचंद : डॉ. फूलचंद
गोरखपुर। प्रेमचंद यथार्थवादी आदर्श उन्मुख लेखक थे। वे समाज का यथार्थ रूप फिर आदर्श रूप प्रस्तुत करते थे। वे कथा सम्राट के रूप में ख्यातिलब्ध हैं। ये बातें एमपी इंटर काॅलेज के हिंदी विभाग के वरिष्ठ प्रवक्ता डाॅ.फूलचंद प्रसाद गुप्त ने कहीं। वह सोमवार को एमपी इंटर काॅलेज में प्रेमचंद की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। संचालन अभय प्रताप सिंह ने किया। उप प्रधानाचार्य जनार्दन गौड़, अनिल कुमार, हरिशंकर पांडेय, प्रेम कुमार, राधेश्याम मिश्र, हरिश्चंद्र यादव, शंभू यादव, शेषनाथ प्रसाद आदि मौजूद रहे। संवाद