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Gorakhpur News: कॉक्लियर इम्प्लांट के बाद वॉइस थेरेपी से बच्चे सीख रहे बोलना
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- बीआरडी मेडिकल कॉलेज स्थित सीआरसी में 25 से 30 बच्चे रोज आते हैं सीखने
- पिछले दो सालों में 13 बच्चों का कराया गया कॉक्लियर इम्प्लांट
गोरखपुर। दिव्यांग बच्चों के लिए कॉक्लियर इम्प्लांट की सुविधा फायदेमंद साबित हो रही है। इम्प्लांट के बाद बच्चों की भाषा और श्रवण क्षमता को विकसित करने के लिए सीआरसी में विशेष वॉइस थेरेपी प्रदान की जाती है।
जिला दिव्यांग अधिकारी कमलेश वर्मा के अनुसार, बीआरडी मेडिकल कॉलेज परिसर में स्थित सीआरसी में पिछले वर्ष आठ बच्चे कॉक्लियर इम्प्लांट के लिए आए थे, जबकि इस वर्ष अब तक पांच बच्चों को यह सुविधा दी जा चुकी है। सीआरसी अब कॉक्लियर इम्प्लांट के जरिये बच्चों के पुनर्वास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यहां विशेषज्ञों की ओर से वॉइस थेरेपी कराई जाती है। इससे बच्चे धीरे-धीरे शब्दों की पहचान, उच्चारण और संवाद की क्षमता विकसित करते हैं।
थेरेपी के दौरान बच्चों को विभिन्न चित्रों, वस्तुओं के माध्यम से बोलने और समझने की ट्रेनिंग दी जाती है। छोटे बच्चों में सीखने की क्षमता अधिक होती है, इसलिए इम्प्लांट के बाद शुरुआती महीनों में यह थेरेपी बेहद प्रभावी रहती है। सीआरसी में प्रतिदिन 25 से 30 बच्चे थेरेपी और काउंसलिंग के लिए आते हैं। यहां उन्हें सुनने-बोलने के कौशल भी प्रदान किए जाते हैं।
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- पिछले दो सालों में 13 बच्चों का कराया गया कॉक्लियर इम्प्लांट
गोरखपुर। दिव्यांग बच्चों के लिए कॉक्लियर इम्प्लांट की सुविधा फायदेमंद साबित हो रही है। इम्प्लांट के बाद बच्चों की भाषा और श्रवण क्षमता को विकसित करने के लिए सीआरसी में विशेष वॉइस थेरेपी प्रदान की जाती है।
जिला दिव्यांग अधिकारी कमलेश वर्मा के अनुसार, बीआरडी मेडिकल कॉलेज परिसर में स्थित सीआरसी में पिछले वर्ष आठ बच्चे कॉक्लियर इम्प्लांट के लिए आए थे, जबकि इस वर्ष अब तक पांच बच्चों को यह सुविधा दी जा चुकी है। सीआरसी अब कॉक्लियर इम्प्लांट के जरिये बच्चों के पुनर्वास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यहां विशेषज्ञों की ओर से वॉइस थेरेपी कराई जाती है। इससे बच्चे धीरे-धीरे शब्दों की पहचान, उच्चारण और संवाद की क्षमता विकसित करते हैं।
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थेरेपी के दौरान बच्चों को विभिन्न चित्रों, वस्तुओं के माध्यम से बोलने और समझने की ट्रेनिंग दी जाती है। छोटे बच्चों में सीखने की क्षमता अधिक होती है, इसलिए इम्प्लांट के बाद शुरुआती महीनों में यह थेरेपी बेहद प्रभावी रहती है। सीआरसी में प्रतिदिन 25 से 30 बच्चे थेरेपी और काउंसलिंग के लिए आते हैं। यहां उन्हें सुनने-बोलने के कौशल भी प्रदान किए जाते हैं।
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