UP News: बीआरडी के डॉक्टरों ने छह साल की बच्ची का ऑपरेशन कर दी नई जिंदगी, चली गई थी पैरों की ताकत
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. गणेश कुमार ने कहा कि बीआरडी मेडिकल कॉलेज के सुपर स्पेशियलिटी ब्लॉक में गंभीर ऑपरेशन होने लगे हैं। न्यूरो सर्जरी से लेकर हृदय रोग के मरीजों का सफल ऑपरेशन हो रहा है। गंभीर मरीजों को इलाज के लिए अब लखनऊ और दिल्ली जाने की जरूरत नहीं है।
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छह साल की बच्ची जन्म से लुंबोसैक्रल मेनिंगोमाइलोसील विथ टेथर्ड कोर्ड जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रही थी। बीआरडी मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने सर्जरी कर बच्ची को नई जिदंगी दी है। बच्ची की रीढ़ की हड्डी की नसें गुच्छा बनकर रीढ़ से बाहर आ गई थी। बच्ची के कमर पर एक किलोग्राम की गांठ हो गई थी।
नसें रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से से सट गई थीं। इसकी वजह से पैरों में ताकत पूरी तरह से खत्म हो गई थी। बच्ची इस समस्या से चल नहीं पाती थी और चोट का प्रभाव भी उस हिस्से पर नहीं पड़ता था। आपरेशन के बाद बच्ची स्वस्थ है। पैरों में धीरे-धीरे ताकत लौट रही है।
जानकारी के मुताबिक, बच्ची को जन्म से ही लुंबोसैक्रल मोनिंगोमाइलोसील विथ टेथर्ड कोर्ड बीमारी से जूझ रही थी। परिजनों ने कई जगह इलाज कराया, लेकिन कोई राहत नहीं मिली। यहां तक की डॉक्टर ऑपरेशन के लिए भी तैयार नहीं होते थे। किसी ने सलाह दी कि एक बार बीआरडी में जांच कराएं। इस पर परिजन बच्ची को लेकर बीआरडी मेडिकल कॉलेज के सुपर स्पेशियलिटी ब्लॉक पहुंचे।
न्यूरो सर्जन डॉ. नवनीत काला ने जांच की तो बीमारी और उकी गंभीरता के बारे में पता चला। ऑपरेशन काफी कठिन था और लाभ होने की संभावना भी ज्यादा नहीं थी। लेकिन, परिजनों की सहमति के बाद टीम ने पांच घंटे तक ऑपरेशन किया। डॉ. नवनीत काला ने बताया कि यह बीमारी बहुत जटिल है और एक लाख बच्चों में किसी एक को होती है।
बीआरडी में इस तरह का पहला ऑपरेशन किया गया है। इससे पहले केजीएमयू में इस तरह का ऑपरेशन किया था। निजी अस्पतालों में इस आपरेशन में करीब साढ़े चार लाख से पांच लाख के बीच खर्च होता है। जबकि, बीआरडी में मात्र 40 हजार रुपये में यह ऑपरेशन हो गया है। मरीज की स्थिति में काफी सुधार है। धीरे-धीरे उसके पैरों में जान आ रही है। अब वह पूरी तरह से स्वस्थ है।
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. गणेश कुमार ने कहा कि बीआरडी मेडिकल कॉलेज के सुपर स्पेशियलिटी ब्लॉक में गंभीर ऑपरेशन होने लगे हैं। न्यूरो सर्जरी से लेकर हृदय रोग के मरीजों का सफल ऑपरेशन हो रहा है। गंभीर मरीजों को इलाज के लिए अब लखनऊ और दिल्ली जाने की जरूरत नहीं है।
15 वर्षों से नहीं खुल रहा था मरीज का मुंह, एम्स के डॉक्टरों ने की सर्जरी
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में दंत रोग विभाग ने एक जटिल सर्जरी कर मरीज की जान बचाई है। मरीज 15 वर्षों से मुंह न खुलने और नींद में थोड़ी-थोड़ी देर में सांस रुकने की समस्या से ग्रसित था। कई डॉक्टरों को दिखाने के बाद राहत नहीं मिली तो एम्स में आकर दिखाया। जांच के बाद डॉक्टरों ने ऑपरेशन का फैसला लिया है। ऑपरेशन के बाद मरीज एकदम स्वस्थ्य है।
जानकारी के मुताबिक जिले के रहने वाले एक 20 वर्षीय का 15 वर्षों से मुंह नहीं खुल रहा था। इसकी वजह से नींद में थोड़ी-थोड़ी देर के लिए सांस रुक जाती थी। परिजन पांच वर्ष से काफी डॉक्टरों को दिखाए, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ। इस बीच एम्स के दंत रोग विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जन डॉ. शैलेश कुमार को दिखाया। मरीज की जांच और स्कैन के बाद ये पता चला की मरीज एक जटील किस्म की बीमारी से ग्रसित है। मरीज के खोपड़ी की हड्डी निचले जबड़े की हड्डी से पूरी तरह से जुड़ गई थी।
इसकी वजह से पिछले 15 वर्षों से मरीज मुंह न खुलने की वजह से सिर्फ तरल खाने पर निर्भर था, जिसके कारण मरीज का स्वास्थ्य भी बुरी तरह प्रभावित हो रहा था। एम्स निदेशक डॉ. सुरेखा किशोर को विभाग ने जानकारी दी। इस पर उन्होंने मरीज का ऑपरेशन करने का निर्देश दिया।
डॉ. शैलेष ने बताया कि ऐसे मरीजों को बेहोश करने की प्रक्रिया काफी कठिन होती है। लेकिन, एनेस्थीसिया की डॉ अंकिता काबी, डॉ प्रियंका एवं डॉ विजिता ने मरीज को बेहोश करने में विशेष भूमिका निभाई। इसके बाद पांच घंटे तक सर्जरी चली। सर्जरी पूरी तरह से सफल रही। इस पर एम्स निदेशक ने डॉ. शैलेश कुमार और उनकी टीम को सफल ऑपरेशन के लिए बधाई दी है।
निदेशक ने बताया कि इस तरह का पहला ऑपरेशन एम्स में हुआ है। अब तक इस तरह के ऑपरेशन के लिए मरीजों को दिल्ली और लखनऊ जाना पड़ता था, लेकिन अब ऐसा ऑपरेशन एम्स गोरखपुर में भी हो सकेगा। ऑपरेशन में सहयोग करने वाली टीम में सीनियर रेजीडेंट डॉ अनुराधा एवं एनेस्थीसिया विभाग के सीनियर रेजीडेंटों का भी विशेष योगदान रहा। डॉ. शैलेष ने बताया कि दक्षिण भारत की तुलना में उत्तर भारत में इस तरह की समस्या मरीजों में ज्यादा मिलती है। इसका प्रमुख कारण डॉक्टर को समय पर न दिखाना है। सही समय पर अगर मरीजों को दिखा दिया जाए तो ऑपरेशन की जरूरत नहीं पड़ती।