अमर उजाला फाउंडेशन की पहल: आइए करें रक्तदान, बनें महादान का हिस्सा
जिला अस्पताल के एसआईसी डॉ. डीके ठाकुर ने बताया कि 14 जून को सुबह 10 बजे से लेकर दोपहर दो बजे तक लोग रक्तदान कर सकते हैं। ऐसे दानियों को जिला अस्पताल प्रशासन सलाम कर उनका हौसला बढ़ाएगा।
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विश्व रक्तदाता दिवस (14 जून) के मौके पर आप घरों से निकलें और रक्तदान कर महादानी बनें। अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से बीआरडी मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल के ब्लड बैंक में सुबह 10 बजे से दोपहर दो बजे तक रक्तदान शिविर का आयोजन किया जाएगा। अमर उजाला फाउंडेशन महादानियों को विशेष प्रमाण पत्र उपलब्ध कराएगा।
जिला अस्पताल के एसआईसी डॉ. डीके ठाकुर ने बताया कि 14 जून को सुबह 10 बजे से लेकर दोपहर दो बजे तक लोग रक्तदान कर सकते हैं। ऐसे दानियों को जिला अस्पताल प्रशासन सलाम कर उनका हौसला बढ़ाएगा। बीआरडी मेडिकल कॉलेज के ब्लड बैंक प्रभारी डॉ राजेश कुमार ने बताया कि मेडिकल कॉलेज के ब्लड बैंक में 10 बजे से लेकर दो बजे तक लोग रक्तदान कर सकते हैं।
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रक्तदान के बारे में ये भी जाने
एक यूनिट में 350 मिलीग्राम खून निकाला जाता है। रक्तदान के बाद खून की कमी 24 घंटे में पूरी हो जाती है। एक यूनिट खून से एक यूनिट प्लाज्मा, एक यूनिट प्लेटलेट्स, एक यूनिट आरबीसी और एक यूनिट क्रायो मिलता है। इन चारों से अलग-अलग चार लोगों का जीवन बचाया जा सकता है। तीन महीने के अंतराल पर ही दोबारा रक्तदान करना चाहिए। रक्तदाता की उम्र 18 से 65 साल के बीच हो, शरीर का वजन न्यूनतम 45 किलो होना चाहिए।
अंजान की जान बचाने के लिए किया रक्तदान
पंकज त्रिपाठी एक निजी आटोमोबाइल कंपनी में काम करते हैं। इनकी तैनाती कुशीनगर में है। जनवरी में कंपनी से सवारी गाड़ी में अपने घर आ रहे थे। गाड़ी में बैठा एक युवक अपनी बहन के हो रहे डायलिसिस को लेकर परेशान था। फोन पर किसी से बहन के डायलिसिस में रक्त की जरूरत की बात कह रहा था। पंकज ने उसे अपना नंबर दिया।
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कहा, जरूरत पड़ने पर फोन कर बुला सकते हो। अगले दिन सुबह युवक ने फोन किया तो प्रेमचंद पार्क के पास ब्लड बैंक में रक्तदान कर पंकज ने अपनी जिम्मेदारी निभाई। अपील की कि सभी स्वेच्छा से रक्तदान करने के लिए आगे आएं।
रक्तदान से दोस्ती की पत्नी की बची जान
गोरखपुर शहर के तुर्कमानपुर निवासी आफताब अहमद ने वर्ष 2016 में पहली बार गंभीर रूप से बीमार अपने दोस्त की पत्नी को रक्तदान किया। रक्तदान से उनके पत्नी की जान बच गई। इसके बाद उनको रक्तदान का महत्व मालूम पड़ा। साथ ही आगे रक्तदान के लिए प्रेरणा मिली। अब वह साल में दो बार रक्तदान करते हैं। आफताब का कहना है कि रक्तदान से जहां आप दूसरे को नई जिंदगी देते हैं, वहीं खुद के शरीर में भी रक्त प्रवाह सही रहता है।