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Gorakhpur News: महिला सशक्तिकरण की पहचान थीं हजरत आयशा- जानिए कौन थी आयशा
Thu, 28 Mar 2024 06:40 PM IST
रोहित सिंह
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर
Published by: रोहित सिंह
Updated Thu, 28 Mar 2024 06:40 PM IST
सार
हजरत आयशा सिद्दीका मुहम्मद साहब की बीवी व इस्लाम के पहले खलीफा हजरत अबू बक्र की पुत्री थीं। आप महिला सशक्तिकरण की सशक्त पहचान हैं।
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चिश्तिया मस्जिद बक्शीपुर में हजरत आयशा व शोह-दाए-बद्र की याद में सामूहिक कुरआन ख्वानी
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
गुरुवार 17 रमजान को चिश्तिया मस्जिद बक्शीपुर में सामूहिक कुरआन ख्वानी हुई। हजरत आयशा सिद्दीका व शोह-दाए-बद्र के शहीदों को अकीदत का नजराना पेश किया गया। इस मौके पर मस्जिद के इमाम मौलाना महमूद रजा कादरी ने कहा कि हजरत आयशा सिद्दीका मुहम्मद साहब की बीवी व इस्लाम के पहले खलीफा हजरत अबू बक्र की पुत्री थीं।
आप महिला सशक्तिकरण की सशक्त पहचान हैं। पूरी जिंदगी महिलाओं को हक दिलाने के लिए आप कोशिशें करती रहीं। 17 रमजानुल मुबारक को आप इस दुनिया को अलविदा कह गईं।
सब्जपोश हाउस मस्जिद जाफरा बाजार में हाफिज रहमत अली निजामी ने कहा कि आपकी जिंदगी का हर पहलू दुनिया की तमाम महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत है। कुरआन-ए-पाक में आपकी पाकीजगी बयान की गई है। मरकजी मदीना जामा मस्जिद रेती चौक में मुफ्ती मेराज अहमद कादरी ने कहा कि 17 रमजानुल मुबारक सन 2 हिजरी को जंग-ए-बद्र हक और बातिल के बीच हुई।
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जिसमें 313 सहाबा किराम की मदद के लिए फरिश्ते जमीन पर उतरे। इस्लामी इतिहास की सबसे पहली जंग मुसलमानों ने खुद के बचाव में लड़ी। जंग-ए-बद्र में मुसलमानों की तादाद 313 थीं। वहीं विरोधी तीन गुना से ज्यादा था। जंग-ए-बद्र में कुल 14 सहाबा शहीद हुए। इसके मुकाबले में दुश्मन के 70 आदमी मारे गए।
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आप महिला सशक्तिकरण की सशक्त पहचान हैं। पूरी जिंदगी महिलाओं को हक दिलाने के लिए आप कोशिशें करती रहीं। 17 रमजानुल मुबारक को आप इस दुनिया को अलविदा कह गईं।
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सब्जपोश हाउस मस्जिद जाफरा बाजार में हाफिज रहमत अली निजामी ने कहा कि आपकी जिंदगी का हर पहलू दुनिया की तमाम महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत है। कुरआन-ए-पाक में आपकी पाकीजगी बयान की गई है। मरकजी मदीना जामा मस्जिद रेती चौक में मुफ्ती मेराज अहमद कादरी ने कहा कि 17 रमजानुल मुबारक सन 2 हिजरी को जंग-ए-बद्र हक और बातिल के बीच हुई।
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जिसमें 313 सहाबा किराम की मदद के लिए फरिश्ते जमीन पर उतरे। इस्लामी इतिहास की सबसे पहली जंग मुसलमानों ने खुद के बचाव में लड़ी। जंग-ए-बद्र में मुसलमानों की तादाद 313 थीं। वहीं विरोधी तीन गुना से ज्यादा था। जंग-ए-बद्र में कुल 14 सहाबा शहीद हुए। इसके मुकाबले में दुश्मन के 70 आदमी मारे गए।
मदरसा रजा-ए-मुस्तफा तुर्कमानपुर में मौलाना दानिश रजा अशरफी ने कहा कि जंग-ए-बद्र में मुसलमानों के पास लड़ने के लिए पूरे हथियार भी न थे। पूरे लश्कर के पास सिर्फ 70 ऊंट और दो घोड़े थे। जिन पर सहाबा बारी-बारी सवारी करते थे। इसमें अजीम कामयाबी मिली।
अंत में सलातो-सलाम पढ़कर पूरी दुनिया में अमनो अमान की दुआ मांगी गई। इस मौके पर हाफिज नजरे आलम, हाफिज गुलाम गौस, हाफिज शारिक, सैफ अली, फुजैल अली, असलम, फैजान, अख़्लाक, फरीद, युनूस अली, नेहाल आदि मौजूद रहे।
शब-ए-कद्र में होगी इबादत
गुरुवार को रोजेदारों का 17वां रोजा मुकम्मल हो गया। दूसरा अशरा खत्म होने के करीब है। अब जहन्नम से आजादी का तीसरा अशरा बहुत महत्वपूर्ण है। अंतिम दस दिन की पांच रात यानी 21, 23, 25, 27 व 29 रमजान की रात में से एक शबे कद्र की रात है।
जिसमें इबादत का सवाब हजार महीनों की इबादत से बेहतर है। शबे कद्र में ही कुरआन-ए-पाक नाजिल हुआ। अंतिम दस दिन का एतिकाफ करना पैगंबरे इस्लाम हजरत मुहम्मद साहब की सुन्नत है। मस्जिद खूनीपुर में तरावीह नमाज के दौरान हाफिज शारिब ने एक कुरआन-ए-पाक मुकम्मल किया। मुबारकबाद के साथ तोहफे व दुआएं मिलीं।
अंत में सलातो-सलाम पढ़कर पूरी दुनिया में अमनो अमान की दुआ मांगी गई। इस मौके पर हाफिज नजरे आलम, हाफिज गुलाम गौस, हाफिज शारिक, सैफ अली, फुजैल अली, असलम, फैजान, अख़्लाक, फरीद, युनूस अली, नेहाल आदि मौजूद रहे।
शब-ए-कद्र में होगी इबादत
गुरुवार को रोजेदारों का 17वां रोजा मुकम्मल हो गया। दूसरा अशरा खत्म होने के करीब है। अब जहन्नम से आजादी का तीसरा अशरा बहुत महत्वपूर्ण है। अंतिम दस दिन की पांच रात यानी 21, 23, 25, 27 व 29 रमजान की रात में से एक शबे कद्र की रात है।
जिसमें इबादत का सवाब हजार महीनों की इबादत से बेहतर है। शबे कद्र में ही कुरआन-ए-पाक नाजिल हुआ। अंतिम दस दिन का एतिकाफ करना पैगंबरे इस्लाम हजरत मुहम्मद साहब की सुन्नत है। मस्जिद खूनीपुर में तरावीह नमाज के दौरान हाफिज शारिब ने एक कुरआन-ए-पाक मुकम्मल किया। मुबारकबाद के साथ तोहफे व दुआएं मिलीं।