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देवताओं की प्रवृत्ति के अनुकूल हो भवन निर्माण तो मिलेगा अद्भुत परिणाम: पं. सतीश शर्मा
Sun, 26 Jan 2020 10:22 AM IST
विजय जैन
डिजिटल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गोरखपुर
डिजिटल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गोरखपुर
Published by: विजय जैन
Updated Sun, 26 Jan 2020 10:22 AM IST
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होटल रेडिसन ब्लू में वास्तु की जानकारी वास्तुविद पंडित सतीश शर्मा व शामिल अतिथि।।
- फोटो : अमर उजाला
उत्तरे कुबेरे, दक्षिणे यमो, ईशाने ईश्वरे, वरुणाय पश्चिमे। यानी भवन में धन की जगह उत्तर दिशा में, दक्षिण दिशा में पितरों का स्थान, ईशान दिशा सबसे अच्छा फल देने वाली होती है।
वास्तु के आधार पर चारों दिशाएं 45 देवताओं के अधीन हैं, भवन निर्माण इन देवताओं की प्रवृत्ति को ध्यान में रख कर किया जाए तो परिणाम अद्भुत होंगे। यह जानकारी दुनिया के जाने-माने वास्तुविद पंडित सतीश शर्मा ने शनिवार को होटल रेडिसन ब्लू में आयोजित ‘द वास्तुविद सतीश शर्मा शो’ में दी।
अमर उजाला की पहल पर आयोजित इस शो में पंडित सतीश शर्मा ने शहर की गिनीचुनी हस्तियों को वैदिक और पौराणिक तथ्यों के आधार पर भवन निर्माण की गूढ़ जानकारी दी। शो के आयोजन में पॉम पैराडाइज का विशेष सहयोग रहा है। शो की शुरुआत वास्तुविद पंडित सतीश शर्मा के स्वागत के साथ हुई।
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पॉम पैराडाइज के निदेशक विकास केजरीवाल ने पुष्प गुच्छ देकर स्वागत किया, फिर आरपीएम समूह के प्रबंध निदेशक अजय शाही ने पंडित सतीश शर्मा की पत्नी पद्मा शर्मा का स्वागत किया। इसके बाद वास्तुविद ने मत्स्य पुराण के आधार पर वास्तु पुरुष की उत्पत्ति की कथा सुनाई। इसके अनुसार शिव जी ने गणों से युद्ध करने के लिए अपने पसीने से वास्तु पुरुष को उत्पन्न किया।
गणों को हराने के बाद शिव के इस रौद्र रूप ने देवताओं को भी मारना शुरू कर दिया। इस पर देवता ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा ने 45 देवताओं को वास्तु पुरुष से लड़ने भेजा। यह 45 देवता वास्तु पुरुष को मार तो नहीं सके, लेकिन पृथ्वी पर उन्हें चारों ओर से बांध लिया। वास्तु ने हार मान ली, ब्रह्मा जी ने उन्हें वरदान दिया कि जो घर वास्तु के बिना बनेगा वह नहीं बचेगा।
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वास्तु के आधार पर चारों दिशाएं 45 देवताओं के अधीन हैं, भवन निर्माण इन देवताओं की प्रवृत्ति को ध्यान में रख कर किया जाए तो परिणाम अद्भुत होंगे। यह जानकारी दुनिया के जाने-माने वास्तुविद पंडित सतीश शर्मा ने शनिवार को होटल रेडिसन ब्लू में आयोजित ‘द वास्तुविद सतीश शर्मा शो’ में दी।
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अमर उजाला की पहल पर आयोजित इस शो में पंडित सतीश शर्मा ने शहर की गिनीचुनी हस्तियों को वैदिक और पौराणिक तथ्यों के आधार पर भवन निर्माण की गूढ़ जानकारी दी। शो के आयोजन में पॉम पैराडाइज का विशेष सहयोग रहा है। शो की शुरुआत वास्तुविद पंडित सतीश शर्मा के स्वागत के साथ हुई।
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पॉम पैराडाइज के निदेशक विकास केजरीवाल ने पुष्प गुच्छ देकर स्वागत किया, फिर आरपीएम समूह के प्रबंध निदेशक अजय शाही ने पंडित सतीश शर्मा की पत्नी पद्मा शर्मा का स्वागत किया। इसके बाद वास्तुविद ने मत्स्य पुराण के आधार पर वास्तु पुरुष की उत्पत्ति की कथा सुनाई। इसके अनुसार शिव जी ने गणों से युद्ध करने के लिए अपने पसीने से वास्तु पुरुष को उत्पन्न किया।
गणों को हराने के बाद शिव के इस रौद्र रूप ने देवताओं को भी मारना शुरू कर दिया। इस पर देवता ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा ने 45 देवताओं को वास्तु पुरुष से लड़ने भेजा। यह 45 देवता वास्तु पुरुष को मार तो नहीं सके, लेकिन पृथ्वी पर उन्हें चारों ओर से बांध लिया। वास्तु ने हार मान ली, ब्रह्मा जी ने उन्हें वरदान दिया कि जो घर वास्तु के बिना बनेगा वह नहीं बचेगा।
45 देवताओं से घिरी है पृथ्वी
रेडिएशन ब्लू में वास्तुविद सतीश शर्मा को सुनते अतिथि।
- फोटो : अमर उजाला
वर्तमान में पूरी पृथ्वी वास्तु पुरुष और उनको घेरे हुए 45 देवताओं से घिरी है। पृथ्वी गोल है और यह 360 अक्षांश, 180 देशांतर रेखाओं में बंटी है। यदि इन अक्षांश और देशांतर रेखाओें के समानांतर कोई भवन बनाया जाता है तो वह उत्तम है।
आधुनिक युग के परिप्रेक्ष्य में वास्तु पुरुष को नगर योजना का और विश्वकर्मा को नगर विकास का प्रभारी बताया और कहा कि पौराणिक कथा के अनुसार पहले पृथ्वी पर मनुष्य और देवता साथ रहते थे। धीरे-धीरे मनुष्य खुद को देवता समझने लगे। इस पर देवता नाराज होकर कल्प वृक्ष लेकर स्वर्गलोक को कूच कर गए। पृथ्वी पर मनुष्य परेशान हो गए। सब ब्रह्मा के पास पहुंचे।
ब्रह्मा ने राजा पृथु को भेजा और मनुष्यों के रहने की व्यवस्था करने का आदेश दिया। राजा पृथु ने पृथ्वी में जंगल, पहाड़, नदी आदि प्राकृतिक संपदा को अंधाधुंध काटना शुरू कर दिया। इससे पृथ्वी परेशान हुई और ब्रह्मा के पास पहुंचीं। तब ब्रह्मा ने अपने मानसपुत्र विश्वकर्मा को निर्माण के लिए पृथ्वी लोक भेजा। विश्वकर्मा ने इंद्र की सभा, अमरावती, सुदामापुरी, कर्ण के कवच कुंडल जैसे अद्भुत निर्माण किए थे। यहां तक कि सूर्य को भी काट कर गोल किया और पृथ्वीवासियों के लिए लाभदायी बनाया। पृथ्वी पर विकास और निर्माण के लिए यही दोनों देवता महत्वपूर्ण हैं।
आधुनिक युग के परिप्रेक्ष्य में वास्तु पुरुष को नगर योजना का और विश्वकर्मा को नगर विकास का प्रभारी बताया और कहा कि पौराणिक कथा के अनुसार पहले पृथ्वी पर मनुष्य और देवता साथ रहते थे। धीरे-धीरे मनुष्य खुद को देवता समझने लगे। इस पर देवता नाराज होकर कल्प वृक्ष लेकर स्वर्गलोक को कूच कर गए। पृथ्वी पर मनुष्य परेशान हो गए। सब ब्रह्मा के पास पहुंचे।
ब्रह्मा ने राजा पृथु को भेजा और मनुष्यों के रहने की व्यवस्था करने का आदेश दिया। राजा पृथु ने पृथ्वी में जंगल, पहाड़, नदी आदि प्राकृतिक संपदा को अंधाधुंध काटना शुरू कर दिया। इससे पृथ्वी परेशान हुई और ब्रह्मा के पास पहुंचीं। तब ब्रह्मा ने अपने मानसपुत्र विश्वकर्मा को निर्माण के लिए पृथ्वी लोक भेजा। विश्वकर्मा ने इंद्र की सभा, अमरावती, सुदामापुरी, कर्ण के कवच कुंडल जैसे अद्भुत निर्माण किए थे। यहां तक कि सूर्य को भी काट कर गोल किया और पृथ्वीवासियों के लिए लाभदायी बनाया। पृथ्वी पर विकास और निर्माण के लिए यही दोनों देवता महत्वपूर्ण हैं।
भवन का मुख्य द्वार उत्तर में होता है अति शुभ
पंडित सतीश शर्मा ने कहा कि किसी भवन का मुख्यद्वार बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। यदि सही दिशा और देवता के क्षेत्र में बनाया जाए तो अकूत लाभ मिलते हैं और गलत होने पर ह्रास और समाप्ति का कारण बनते हैं। मुख्यद्वार के लिए सबसे उपयुक्त दिशा उत्तर में बताई।
उत्तर दिशा में भी यदि देवता मुण्य, भल्लाट और सोम के क्षेत्र में मुख्यद्वार बनाया जाए तो धन, समृद्धि और शत गुणों की प्राप्ति होती है। यदि पश्चिम दिशा में बनाना पड़े तो वरुण और पुष्पदंत देवताओं के क्षेत्र में ही मुख्यद्वार निकालना लाभदायक होगा। यह देवता धन संपत्ति के साथ पुत्रधन और बल की वृद्धि देने वाले हैं। दक्षिण दिशा में गृहत्क्षत देवता के क्षेत्र में ही मुख्यद्वार बनाना चाहिए।
यह देवता भोजन, पान और पुत्र वृद्धि का लाभ देते हैं लेकिन यह दिशा नीचपन, दासत्व, पुत्र का नाश, रौद्रता, पुत्र के पराक्रम बल का नाश आदि नकारात्मक गुणवाली है इसलिए इस दिशा में मुख्यद्वार बहुत ही सावधानी के साथ बनाया जाना चाहिए। यदि मुख्यद्वार पूर्व दिशा में बनाना है तो जयंत और इंद्र देवताओं के क्षेत्र में बनाएं इससे धन और समृद्धि दोनों मिलेंगे।
उत्तर दिशा में भी यदि देवता मुण्य, भल्लाट और सोम के क्षेत्र में मुख्यद्वार बनाया जाए तो धन, समृद्धि और शत गुणों की प्राप्ति होती है। यदि पश्चिम दिशा में बनाना पड़े तो वरुण और पुष्पदंत देवताओं के क्षेत्र में ही मुख्यद्वार निकालना लाभदायक होगा। यह देवता धन संपत्ति के साथ पुत्रधन और बल की वृद्धि देने वाले हैं। दक्षिण दिशा में गृहत्क्षत देवता के क्षेत्र में ही मुख्यद्वार बनाना चाहिए।
यह देवता भोजन, पान और पुत्र वृद्धि का लाभ देते हैं लेकिन यह दिशा नीचपन, दासत्व, पुत्र का नाश, रौद्रता, पुत्र के पराक्रम बल का नाश आदि नकारात्मक गुणवाली है इसलिए इस दिशा में मुख्यद्वार बहुत ही सावधानी के साथ बनाया जाना चाहिए। यदि मुख्यद्वार पूर्व दिशा में बनाना है तो जयंत और इंद्र देवताओं के क्षेत्र में बनाएं इससे धन और समृद्धि दोनों मिलेंगे।
दक्षिण में शयनकक्ष और तिजोरी बढ़ाती है समृद्धि
पंडित सतीश शर्मा ने परिवार में स्नेह, लक्ष्मी का वास और समृद्धि लाने के लिए बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक के शयनकक्ष कहां हों, इसकी विस्तार से जानकारी दी। घर के बडे़ बुजुर्गों के लिए दक्षिण दिशा में विवस्वान यानी सूर्य देवता के क्षेत्र में शयन कक्ष बनाया जाना चाहिए। विवस्वान देवता वरिष्ठता के प्रतीक हैं यानी इस क्षेत्र में जो रहेगा उसका घर पर वर्चस्व रहेगा।
घर के कमाऊ सदस्यों का शयनकक्ष विवस्वान के पश्चिम इंद्र के क्षेत्र में होने से समृद्धि में वृद्धि होती है। दक्षिण दिशा पित्रों की मानी जाती है इसलिए इस दिशा में बने कक्ष में पित्रों का चित्र या मूर्ति लाभदायी फल देती है। भगवान वराहमिहिर ने पढ़ने के लिए पश्चिम दिशा को उत्तम माना है इसलिए बच्चों की पढ़ाई और शयन के लिए इस दिशा में कक्ष बनाना लाभदायक होगा।
वास्तुविद ने पृथ्वी को चारों दिशाओं और उनसे संबंधित 45 देवी-देवताओं के आधार उनके गुण-दोष और उनसे मिलने वाले फल के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
घर के कमाऊ सदस्यों का शयनकक्ष विवस्वान के पश्चिम इंद्र के क्षेत्र में होने से समृद्धि में वृद्धि होती है। दक्षिण दिशा पित्रों की मानी जाती है इसलिए इस दिशा में बने कक्ष में पित्रों का चित्र या मूर्ति लाभदायी फल देती है। भगवान वराहमिहिर ने पढ़ने के लिए पश्चिम दिशा को उत्तम माना है इसलिए बच्चों की पढ़ाई और शयन के लिए इस दिशा में कक्ष बनाना लाभदायक होगा।
वास्तुविद ने पृथ्वी को चारों दिशाओं और उनसे संबंधित 45 देवी-देवताओं के आधार उनके गुण-दोष और उनसे मिलने वाले फल के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
मकान बनाते समय रखें इन बिंदुओं का ध्यान
पंडित सतीश शर्मा ने कहा कि भवन निर्माण के समय यदि कुछ खास बिंदुओं का ध्यान रखा जाना जरूरी है। भवन निर्माण की किंवदंती तीस तेरह अट्ठारह तीन, खंभ चूक और भुजाहीन, कहें विश्वकर्मा करे, विचार राजभवन या दैवद्वार सुनाते हुए बताया कि जो चाहे राजभवन हो या मंदिर यदि 30, 18, 13 या तीन खंभों पर बना है वह कष्टदायक ही होगा।
बताया कि कोण मकान से नहीं दिशाओं से बनते हैं जहां कोण आए वहीं पाया रखा जाए। जिस देवता की जैसी प्रवृत्ति हो वैसा ही निर्माण किया जाना चाहिए। यदि विपरीत प्रवृत्ति का निर्माण किया गया तो समस्याएं पैदा होंगी। कोनों को कभी भरें नहीं।
शास्त्रों में कहीं भी कोने पर गेट नहीं बताए गए हैं, इसलिए कोना छोड़ कर ही गेट लगाया जाना चाहिए। ईशान कोण का कोना छोड़ कोई भी कोना अच्छा नहीं होता। अग्निकोण में महिलाएं यदि प्रतिदिन दो घंटे रहती हैं, तो पति के जरिए दुनिया पर राज करती हैं।
लाफिंग बुद्धा से नहीं दूर होता वास्तुदोष
पंडित सतीश शर्मा ने दावा किया कि वास्तु दोष दूर करने के नाम पर मार्केट में लाफिंग बुद्धा, पिरामिड, कछुआ, क्रिस्टल आदि वस्तुएं बेची जा रही हैं इनका वास्तु शास्त्र से कोई लेना देना नहीं। वास्तु शास्त्र पूर्ण रूप भूमि और भूमि से जुड़े 45 देवताओं के ज्ञान पर आधारित है। यह वैदिक और पौराणिक विद्या है। वास्तु का उल्लेख वेदों के साथ मत्स्य पुराण, बृहत संहिता, समरांगण, सूत्रधार, मनसार, वास्तु राजवल्लभ, अपरिजित पृच्छा आदि साहित्य में किया गया है। लाफिंग बुद्धा आदि अवैदिक विकार इसमें शामिल करने का कुप्रयास किया जा रहा है। इन टोटकों से वास्तुदोष दूर नहीं किए जा सकते।
बताया कि कोण मकान से नहीं दिशाओं से बनते हैं जहां कोण आए वहीं पाया रखा जाए। जिस देवता की जैसी प्रवृत्ति हो वैसा ही निर्माण किया जाना चाहिए। यदि विपरीत प्रवृत्ति का निर्माण किया गया तो समस्याएं पैदा होंगी। कोनों को कभी भरें नहीं।
शास्त्रों में कहीं भी कोने पर गेट नहीं बताए गए हैं, इसलिए कोना छोड़ कर ही गेट लगाया जाना चाहिए। ईशान कोण का कोना छोड़ कोई भी कोना अच्छा नहीं होता। अग्निकोण में महिलाएं यदि प्रतिदिन दो घंटे रहती हैं, तो पति के जरिए दुनिया पर राज करती हैं।
लाफिंग बुद्धा से नहीं दूर होता वास्तुदोष
पंडित सतीश शर्मा ने दावा किया कि वास्तु दोष दूर करने के नाम पर मार्केट में लाफिंग बुद्धा, पिरामिड, कछुआ, क्रिस्टल आदि वस्तुएं बेची जा रही हैं इनका वास्तु शास्त्र से कोई लेना देना नहीं। वास्तु शास्त्र पूर्ण रूप भूमि और भूमि से जुड़े 45 देवताओं के ज्ञान पर आधारित है। यह वैदिक और पौराणिक विद्या है। वास्तु का उल्लेख वेदों के साथ मत्स्य पुराण, बृहत संहिता, समरांगण, सूत्रधार, मनसार, वास्तु राजवल्लभ, अपरिजित पृच्छा आदि साहित्य में किया गया है। लाफिंग बुद्धा आदि अवैदिक विकार इसमें शामिल करने का कुप्रयास किया जा रहा है। इन टोटकों से वास्तुदोष दूर नहीं किए जा सकते।