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अमर उजाला मोहल्लागाथा: सात दशक पहले जंगल हुआ करता था गोलघर के आसपास
Fri, 17 Feb 2023 11:33 AM IST
vivek shukla
डॉ. रविंद्र श्रीवास्तव, गोरखपुर।
डॉ. रविंद्र श्रीवास्तव, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Fri, 17 Feb 2023 11:33 AM IST
सार
जुगानी भाई आज से सात दशक पहले के गोलघर और बेतियाहाता के विकास से जुड़ी यादें साझा कर रहे हैं। उनके मुताबिक, गोलघर में नरकर और मेउड़ी का जंगल हुआ करता था। रेलवे स्टेशन से गोरखनाथ मंदिर जाने पर या गीता प्रेस की तरफ जाने पर जंगल के बीच से होकर गुजरना पड़ता था। बदलते समय के साथ गोलघर अब गोरखपुर की अलग पहचान बन गया है।
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गोलघर।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
वास्तव में गोरखपुर शहर का विस्तार रेल का मुख्यालय बनने के साथ तेजी से होने लगा। इस पर कोई विश्वास नहीं करेगा कि आज जहां गोलघर है वहां 70 साल पहले गीदड़ और साही घूमा करते थे। जी हां, ये बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें, शॉपिंग मॉल, होटल, एक से एक आधुनिक दुकानें जहां आज दिख रही हैं, वहां एक समय लोग आने-जाने से डरते थे। शहर के विकास, विस्तार और बदलाव की कहानी को अपनी यादों के सहारे साझा कर रह हैं डॉ रवींद्र श्रीवास्तव ऊर्फ जुगानी भाई।
जुगानी भाई आज से सात दशक पहले के गोलघर और बेतियाहाता के विकास से जुड़ी यादें साझा कर रहे हैं। उनके मुताबिक, गोलघर में नरकर और मेउड़ी का जंगल हुआ करता था। रेलवे स्टेशन से गोरखनाथ मंदिर जाने पर या गीता प्रेस की तरफ जाने पर जंगल के बीच से होकर गुजरना पड़ता था।
बदलते समय के साथ गोलघर अब गोरखपुर की अलग पहचान बन गया है। वहीं, बेतियाहाता सिर्फ बेतिया स्टेट (बिहार) की कोठी थी। आज जो कमिश्नर आवास के रूप में पहचाना जाता है, वो बिहार के पश्चिम चंपारण के बेतिया स्टेट की कोठी हुआ करती थी। बाद में इन्हीं के नाम पर इस पूरे इलाके का नाम बेतियाहाता पड़ गया।
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द्वितीय विश्वयुद्ध के समय ही गोरखपुर का हवाई अड्ड बन गया था। शहर में विश्वविद्यालय बना तो शैक्षिक गतिविधियां बढ़ीं। उर्वरक कारखाने के साथ गोरखपुर औद्योगीकरण की दिशा में आगे बढ़ा। इसी दौरान गोरखपुर टाउन एरिया को म्यूनिसिपॉलिटी, नगर पालिका और महानगर पालिका बना दिया गया। इसके बाद शहर के अलग-अलग मोहल्लों का विकास मसलन, सड़क, नाली, बिजली के खंभे, सीवर और अन्य सुविधाएं विकसति हुईं।
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जुगानी भाई आज से सात दशक पहले के गोलघर और बेतियाहाता के विकास से जुड़ी यादें साझा कर रहे हैं। उनके मुताबिक, गोलघर में नरकर और मेउड़ी का जंगल हुआ करता था। रेलवे स्टेशन से गोरखनाथ मंदिर जाने पर या गीता प्रेस की तरफ जाने पर जंगल के बीच से होकर गुजरना पड़ता था।
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बदलते समय के साथ गोलघर अब गोरखपुर की अलग पहचान बन गया है। वहीं, बेतियाहाता सिर्फ बेतिया स्टेट (बिहार) की कोठी थी। आज जो कमिश्नर आवास के रूप में पहचाना जाता है, वो बिहार के पश्चिम चंपारण के बेतिया स्टेट की कोठी हुआ करती थी। बाद में इन्हीं के नाम पर इस पूरे इलाके का नाम बेतियाहाता पड़ गया।
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द्वितीय विश्वयुद्ध के समय ही गोरखपुर का हवाई अड्ड बन गया था। शहर में विश्वविद्यालय बना तो शैक्षिक गतिविधियां बढ़ीं। उर्वरक कारखाने के साथ गोरखपुर औद्योगीकरण की दिशा में आगे बढ़ा। इसी दौरान गोरखपुर टाउन एरिया को म्यूनिसिपॉलिटी, नगर पालिका और महानगर पालिका बना दिया गया। इसके बाद शहर के अलग-अलग मोहल्लों का विकास मसलन, सड़क, नाली, बिजली के खंभे, सीवर और अन्य सुविधाएं विकसति हुईं।