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दर्शन मामले में मीडिया कवरेज पर सख्त हुआ कर्नाटक हाईकोर्ट, केंद्र सरकार को दिए जांच के आदेश; जानें पूरा मामला

Sat, 16 May 2026 08:57 AM IST
Aradhya Tripathi एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: Aradhya Tripathi Updated Sat, 16 May 2026 08:57 AM IST
सार

Darshan: रेणुकास्वामी हत्याकांड में आरोपी अभिनेता दर्शन की याचिका पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने सुनवाई की है। जानिए क्या है पूरा मामला और कोर्ट ने केंद्र सरकार को दिए क्या निर्देश…

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Renukaswamy Murder Case Karnataka High Court Slams Media Carnival Orders Centre To Act On Darshan Plea
एक्टर दर्शन - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

रेणुकास्वामी हत्याकांड में कर्नाटक हाईकोर्ट ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और आईटी मिनिस्ट्री को कन्नड़ अभिनेता दर्शन से जुड़े मीडिया प्रसारणों और डिजिटल कंटेंट की जांच करने का निर्देश दिया है। साथ ही नियमों का उल्लंघन होने पर जरूरी कार्रवाई करने की बात भी कही है। फिलहाल अभिनेता दर्शन अभी जेल में बंद हैं।

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कोर्ट ने केंद्र को दिया सख्त निर्देश
न्यायमूर्ति सचिन शंकर मगदुम ने 30 अप्रैल को जारी अपने आदेश में कहा कि ब्रॉडकास्ट मीडिया ने अदालत की कार्यवाही को हूबहू दिखाने की हद कर दी है। केवल जज का चेहरा ढका जाता है, जबकि आरोपियों और उनके वकीलों के चेहरे खुलेआम दिखाए जाते हैं। ऐसा हर सुनवाई को देखने को मिलता है। इससे चल रही न्यायिक कार्यवाही एक सार्वजनिक तमाशा बनकर रह जाती है।

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लगातार मना किए जाने के बावजूद इस तरह की ब्रॉडकास्टिंग न्यायिक अधिकार की घोर अवहेलना को दिखाता है। कोर्ट ने अब मंत्रालय को दर्शन द्वारा अपनी शिकायत में दिए गए विवादित प्रसारणों और डिजिटल कंटेंट लिंक की जांच का निर्देश दिया है। अगर नियमों का उल्लंघन पाया जाएगा तो मीडिया संस्थानों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करने की बात भी कही है। इसमें मामले की आगे की जांच तक मामले से जड़े किसी भी तरह के प्रसारण या स्ट्रीमिंग पर रोक लगाने का निर्देश शामिल है।

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एक्टर दर्शन - फोटो : सोशल मीडिया

दर्शन ने शिकायत में क्या कहा?
साल की शुरुआत में 16 जनवरी को दर्शन ने आईबी मिनिस्ट्री में एक हजार से अधिक यूट्यूब लिंक का हवाला देते हुए शिकायत दर्ज कराई थी। साथ ही दोषी चैनलों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। अधिकारियों द्वारा कोई कार्रवाई न किए जाने पर दर्शन ने हाईकोर्ट का रुख किया।

अपनी याचिका में उन्होंने उन्होंने कहा कि मीडिया कर्नाटक हाईकोर्ट द्वारा न्यायालय और शहर की सिविल अदालत द्वारा 2024 में पारित आदेशों का घोर उल्लंघन कर रहा था। जिसमें मीडिया को मामले से जुड़ी संवेदनशील जानकारी दिखाने या बताने से रोकने पर प्रतिबंध लगाना शामिल है।

दर्शन ने यह भी दावा किया कि मीडिया चैनल ग्राफिक्स और एआई से तैयार किए एनिमेशन दिखाकर अदालती कार्यवाही और कथित घटनास्थन को अपने तरीके से बनाकर दिखा रहे हैं। यही नहीं निचली अदालत द्वारा दर्ज किए गए सबूतों पर चर्चा कर रहे हैं। मीडिया चैनल जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण ढंग से कार्यवाही और मामले से जुड़ी जानकारी की दिखा या छाप रहे हैं।

मीडिया प्रेरित न्याय लोकतंत्र के लिए खतरा
बेंच ने सुप्रीम कोर्ट, यूएसए के सर्वोच्च न्यायालय और यूके व फ्रांस की कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि इन सभी अदालतों का ये मानना है कि मीडिया रिपोर्टिंग को न्यायिक फैसलों का स्थान लेने या न्याय की प्रक्रिया को प्रभावित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

दर्शन द्वारा दिखाई गई फुटेज को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि ये व्यवहार एक सुनियोजित मीडिया से प्रेरित न्यायनिर्णय के समान है, जो मुकदमे से पहले एक पूर्वाग्रह को जन्म देता है। कोर्ट ने कहा कि फ्रीडम ऑफ स्पीच संवैधानिक अधिकार है, लेकिन अगर यह मीडिया प्रेरित न्याय में बदल जाता है, तो यह लोकतंत्र की रक्षा करने की बजाय, उसके लिए खतरा बन जाती है।

मीडिया सिर्फ एक पहरेदार होती है, लेकिन अगर ये जज या जूरी की भूमिका निभाने लगे, तो यह कानून के लिए खतरा बन सकती है। हम इससे न्यायालय की प्रक्रिया को प्रभावित नहीं होने दे सकते।

इसलिए कोर्ट केंद्र सरकार को ये आदेश देता है कि वो इस मामले को गंभीरता से देखे और जरूरी कदम उठाए। वर्ना कोर्ट मामले में दखल देगा और संबंधित मीडिया संस्थान के लाइसेंस रद्द करने तक पर विचार किया जा सकता है।

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