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Reporting Live Review: सच की तलाश में निकले पत्रकारों की कहानी, परिणीति के कमजोर अभिनय ने किया निराश
सार
Reporting Live Movie Review: परिणीति चोपड़ा और देवेन भोजानी अभिनीत फिल्म ‘रिपोर्टिंग लाइव’ रिलीज हो चुकी है। मेकर्स का दावा है कि इस फिल्म की कहानी काल्पनिक है। हालांकि, वह इसे सच्ची घटनाओं से प्रेरित बताते है। जानें कैसी है यह फिल्म?
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रिपोर्टिंग लाइव फिल्म रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला
Movie Review
रिपोर्टिंग लाइव
कलाकार
परिणीति चोपड़ा
,
देवेन भोजानी
,
अमोल पालेकर
,
आदिल हुसैन
,
शेखर सुमन
और
नासर
लेखक
ध्रुव त्रिपाठी
और
मीहिर जाधव
निर्देशक
ध्रुव त्रिपाठी
निर्माता
जाेशुआ
,
प्रथा
और
आमित
रिलीज डेट
9 अक्तूबर 2026
रेटिंग
2.5/5
विस्तार
पत्रकारिता का काम सत्ता से सवाल पूछना और उन सच्चाइयों को सामने लाना है, जिन्हें ताकतवर लोग पर्दे के पीछे रखना चाहते हैं। लेकिन जब खबरों के पीछे कारोबार, राजनीतिक रसूख और अपराध का गठजोड़ खड़ा हो, तब सच सामने लाने की कीमत भी बड़ी हो जाती है।
निर्देशक ध्रुव त्रिपाठी की फिल्म 'रिपोर्टिंग लाइव' इसी संघर्ष को पर्दे पर उतारने की कोशिश करती है। फिल्म का विषय गंभीर है, मगर इसे रोमांचक कहानी में बदलने के लिए जिस कसावट की जरूरत थी, वह पूरी तरह नजर नहीं आती।
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निर्देशक ध्रुव त्रिपाठी की फिल्म 'रिपोर्टिंग लाइव' इसी संघर्ष को पर्दे पर उतारने की कोशिश करती है। फिल्म का विषय गंभीर है, मगर इसे रोमांचक कहानी में बदलने के लिए जिस कसावट की जरूरत थी, वह पूरी तरह नजर नहीं आती।
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रिपोर्टिंग लाइव फिल्म रिव्यू
- फोटो : सोशल मीडिया
क्या है 'रिपोर्टिंग लाइव' की कहानी?
फिल्म की कहानी के केंद्र में संध्या यादव (परिणीति चोपड़ा) और विनोद शर्मा (देवेन भोजानी) हैं। दोनों एक न्यूज चैनल में काम करते हैं और प्राइम टाइम पर अपनी खबर दिखाने का मौका तलाश रहे हैं। संध्या महत्वाकांक्षी है। वह अपने करियर में आगे बढ़ना चाहती है और एक ऐसी खबर की तलाश में है, जो उसे पहचान दिला सके। विनोद उसका कैमरामैन है, जो इस सफर में उसका साथ देता है।
कहानी तब नया मोड़ लेती है, जब महाराष्ट्र के एक कस्बे में एक पुल ढह जाता है। इस हादसे में स्कूली बच्चों को ले जा रही बस नदी में गिर जाती है और कई लोगों की जान चली जाती है। शुरुआत में यह एक दुर्घटना लगती है, लेकिन संध्या और विनोद की पड़ताल उन्हें अवैध रेत खनन के बड़े कारोबार तक पहुंचा देती है। नदी से रेत निकालने वाला यह नेटवर्क इतना ताकतवर है कि उसके खिलाफ आवाज उठाना पत्रकारों के लिए जान जोखिम में डालने जैसा है।
जैसे-जैसे दोनों जांच आगे बढ़ाते हैं, उन्हें स्थानीय प्रभावशाली लोगों, कारोबारी हितों और अपने ही न्यूज रूम के दबाव का सामना करना पड़ता है। ऐसे में सवाल सिर्फ अपराधियों को बेनकाब करने का नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या पत्रकारिता अपने पेशेवर और नैतिक मूल्यों को बचा पाएगी?
फिल्म की कहानी के केंद्र में संध्या यादव (परिणीति चोपड़ा) और विनोद शर्मा (देवेन भोजानी) हैं। दोनों एक न्यूज चैनल में काम करते हैं और प्राइम टाइम पर अपनी खबर दिखाने का मौका तलाश रहे हैं। संध्या महत्वाकांक्षी है। वह अपने करियर में आगे बढ़ना चाहती है और एक ऐसी खबर की तलाश में है, जो उसे पहचान दिला सके। विनोद उसका कैमरामैन है, जो इस सफर में उसका साथ देता है।
कहानी तब नया मोड़ लेती है, जब महाराष्ट्र के एक कस्बे में एक पुल ढह जाता है। इस हादसे में स्कूली बच्चों को ले जा रही बस नदी में गिर जाती है और कई लोगों की जान चली जाती है। शुरुआत में यह एक दुर्घटना लगती है, लेकिन संध्या और विनोद की पड़ताल उन्हें अवैध रेत खनन के बड़े कारोबार तक पहुंचा देती है। नदी से रेत निकालने वाला यह नेटवर्क इतना ताकतवर है कि उसके खिलाफ आवाज उठाना पत्रकारों के लिए जान जोखिम में डालने जैसा है।
जैसे-जैसे दोनों जांच आगे बढ़ाते हैं, उन्हें स्थानीय प्रभावशाली लोगों, कारोबारी हितों और अपने ही न्यूज रूम के दबाव का सामना करना पड़ता है। ऐसे में सवाल सिर्फ अपराधियों को बेनकाब करने का नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या पत्रकारिता अपने पेशेवर और नैतिक मूल्यों को बचा पाएगी?
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रिपोर्टिंग लाइव फिल्म रिव्यू
- फोटो : सोशल मीडिया
अभिनय: परिणीति और देवेन की कोशिश
परिणीति चोपड़ा: परिणीति चोपड़ा संध्या के किरदार में एक महत्वाकांक्षी पत्रकार बनने की कोशिश करती हैं। उनके किरदार में आगे बढ़ने की चाह और सच सामने लाने का जज्बा है, लेकिन कमजोर लेखन के कारण संध्या की भावनात्मक यात्रा दर्शकों से गहरा जुड़ाव नहीं बना पाती। कई मौकों पर उनका अभिनय भी किरदार की स्वाभाविकता दिखाने के बजाय एक पत्रकार की तयशुदा छवि के करीब दिखाई देता है।
देवेन भोजानी: देवेन भोजानी विनोद के किरदार में सहजता और गर्मजोशी लेकर आते हैं। उनके अभिनय में एक अनुभवी कैमरामैन की झलक मिलती है, लेकिन पटकथा उनके किरदार को भी पर्याप्त विस्तार नहीं देती। दोनों के बीच बेहतर तालमेल और भावनात्मक गहराई होती, तो उनकी साझेदारी फिल्म की बड़ी ताकत बन सकती थी।
आदिल हुसैन: आदिल हुसैन संपादक की भूमिका में अपने अनुभव से प्रभावित करते हैं। उनका किरदार पत्रकारिता के आदर्शों और व्यावसायिक मजबूरियों के बीच फंसे उस पेशेवर की तस्वीर पेश करता है, जो व्यवस्था के भीतर रहते हुए अपने मूल्यों को बचाने की कोशिश कर रहा है।
बाकी स्टारकास्ट: शेखर सुमन चैनल के कारोबारी हितों को प्राथमिकता देने वाले प्रमुख के रूप में नजर आते हैं। अमोल पालेकर और नासर भी अपने सीमित समय में अनुभव से प्रभाव छोड़ते हैं। हालांकि, इन अनुभवी कलाकारों के किरदारों को और गहराई से लिखा जा सकता था।
परिणीति चोपड़ा: परिणीति चोपड़ा संध्या के किरदार में एक महत्वाकांक्षी पत्रकार बनने की कोशिश करती हैं। उनके किरदार में आगे बढ़ने की चाह और सच सामने लाने का जज्बा है, लेकिन कमजोर लेखन के कारण संध्या की भावनात्मक यात्रा दर्शकों से गहरा जुड़ाव नहीं बना पाती। कई मौकों पर उनका अभिनय भी किरदार की स्वाभाविकता दिखाने के बजाय एक पत्रकार की तयशुदा छवि के करीब दिखाई देता है।
देवेन भोजानी: देवेन भोजानी विनोद के किरदार में सहजता और गर्मजोशी लेकर आते हैं। उनके अभिनय में एक अनुभवी कैमरामैन की झलक मिलती है, लेकिन पटकथा उनके किरदार को भी पर्याप्त विस्तार नहीं देती। दोनों के बीच बेहतर तालमेल और भावनात्मक गहराई होती, तो उनकी साझेदारी फिल्म की बड़ी ताकत बन सकती थी।
आदिल हुसैन: आदिल हुसैन संपादक की भूमिका में अपने अनुभव से प्रभावित करते हैं। उनका किरदार पत्रकारिता के आदर्शों और व्यावसायिक मजबूरियों के बीच फंसे उस पेशेवर की तस्वीर पेश करता है, जो व्यवस्था के भीतर रहते हुए अपने मूल्यों को बचाने की कोशिश कर रहा है।
बाकी स्टारकास्ट: शेखर सुमन चैनल के कारोबारी हितों को प्राथमिकता देने वाले प्रमुख के रूप में नजर आते हैं। अमोल पालेकर और नासर भी अपने सीमित समय में अनुभव से प्रभाव छोड़ते हैं। हालांकि, इन अनुभवी कलाकारों के किरदारों को और गहराई से लिखा जा सकता था।
रिपोर्टिंग लाइव फिल्म रिव्यू
- फोटो : सोशल मीडिया
निर्देशन और पटकथा: विषय मजबूत पर असर कमजोर
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत उसका विषय है। अवैध रेत खनन, पर्यावरण को नुकसान, भ्रष्टाचार और मीडिया संस्थानों पर कारोबारी दबाव जैसे मुद्दे गंभीर पड़ताल की मांग करते हैं। फिल्म यह भी दिखाती है कि किसी हादसे के पीछे छिपे कारणों को सामने लाने के लिए पत्रकारों को किस तरह लगातार मेहनत करनी पड़ती है।
लेकिन निर्देशक ध्रुव त्रिपाठी और सहलेखक मिहिर जाधव की पटकथा कई जगह जल्दबाजी में आगे बढ़ती महसूस होती है। जांच के दौरान आने वाली बाधाएं, अचानक मिलने वाले सुराग और कहानी के अहम मोड़ जरूरत के मुताबिक तनाव पैदा नहीं कर पाते। दर्शक जिस रहस्य, खतरे और अनिश्चितता की उम्मीद करता है, वह धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाती है।
फिल्म न्यूज रूम के भीतर संपादकीय स्वतंत्रता और कॉरपोरेट हितों के टकराव को भी छूती है। चैनल के मालिकों और संपादकों के बीच खबरों को लेकर होने वाला संघर्ष कहानी में एक अहम परत जोड़ सकता था। हालांकि, इन पहलुओं को विस्तार से समझने के बजाय फिल्म कई बार उन्हें सिर्फ संवादों तक सीमित रखती है।
यही वजह है कि सच की लड़ाई का विचार तो प्रभावी लगता है, लेकिन उसका सिनेमाई अनुभव उतना असरदार नहीं बन पाता।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत उसका विषय है। अवैध रेत खनन, पर्यावरण को नुकसान, भ्रष्टाचार और मीडिया संस्थानों पर कारोबारी दबाव जैसे मुद्दे गंभीर पड़ताल की मांग करते हैं। फिल्म यह भी दिखाती है कि किसी हादसे के पीछे छिपे कारणों को सामने लाने के लिए पत्रकारों को किस तरह लगातार मेहनत करनी पड़ती है।
लेकिन निर्देशक ध्रुव त्रिपाठी और सहलेखक मिहिर जाधव की पटकथा कई जगह जल्दबाजी में आगे बढ़ती महसूस होती है। जांच के दौरान आने वाली बाधाएं, अचानक मिलने वाले सुराग और कहानी के अहम मोड़ जरूरत के मुताबिक तनाव पैदा नहीं कर पाते। दर्शक जिस रहस्य, खतरे और अनिश्चितता की उम्मीद करता है, वह धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाती है।
फिल्म न्यूज रूम के भीतर संपादकीय स्वतंत्रता और कॉरपोरेट हितों के टकराव को भी छूती है। चैनल के मालिकों और संपादकों के बीच खबरों को लेकर होने वाला संघर्ष कहानी में एक अहम परत जोड़ सकता था। हालांकि, इन पहलुओं को विस्तार से समझने के बजाय फिल्म कई बार उन्हें सिर्फ संवादों तक सीमित रखती है।
यही वजह है कि सच की लड़ाई का विचार तो प्रभावी लगता है, लेकिन उसका सिनेमाई अनुभव उतना असरदार नहीं बन पाता।
रिपोर्टिंग लाइव फिल्म रिव्यू
- फोटो : सोशल मीडिया
कहां चूक जाती है फिल्म?
- 'रिपोर्टिंग लाइव' की सबसे बड़ी कमी यह है कि फिल्म जिस खतरे को गंभीरता से दिखाना चाहती है, उसका एहसास दर्शकों को पर्याप्त रूप से नहीं करा पाती।
- शक्तिशाली रेत माफिया के खिलाफ लड़ रहे पत्रकारों के सामने मुश्किलें तो आती हैं, लेकिन उनके संघर्ष का तनाव और परिणामों का भावनात्मक असर कमजोर रहता है।
- फिल्म में यह दिखाने की गुंजाइश थी कि किसी खबर को प्रकाशित करने से पहले सबूत जुटाना, स्रोतों की सुरक्षा करना और संस्थागत दबाव के बीच अपनी रिपोर्ट पर टिके रहना कितना कठिन होता है। इसके बजाय जांच कई बार सुविधाजनक घटनाक्रम के सहारे आगे बढ़ती है।
- कहानी में चौंकाने वाले मोड़ों की कमी भी साफ महसूस होती है। नतीजतन, क्लाइमैक्स तक पहुंचते-पहुंचते दर्शक की दिलचस्पी कम होने लगती है।
- हालांकि, फिल्म का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि वह पत्रकारिता के प्रति पूरी तरह निराशावादी नजरिया नहीं अपनाती। वह ईमानदार रिपोर्टिंग और लगातार कोशिश करते रहने के महत्व पर भरोसा जताती है।
- लेकिन इस संदेश को प्रभावी बनाने के लिए सिर्फ अच्छे इरादे काफी नहीं होते। किरदारों के संघर्ष, उनके फैसलों और उनके सामने आने वाले खतरों को भी विश्वसनीय ढंग से दिखाना जरूरी था।
'रिपोर्टिंग लाइव' फिल्म रिव्यू
- फोटो : वीडियो ग्रैब
देखें या नहीं?
कुल मिलाकर, 'रिपोर्टिंग लाइव' एक जरूरी मुद्दे पर बनी ऐसी फिल्म है, जो अपनी संभावनाओं का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाती। अवैध रेत खनन और मीडिया पर कारोबारी दबाव जैसे विषय इसे प्रासंगिक बनाते हैं, लेकिन कमजोर पटकथा, अनुमान के मुताबिक आगे बढ़ती जांच और सीमित भावनात्मक गहराई इसके प्रभाव को कम कर देते हैं। कलाकारों की कोशिशों के बावजूद कहानी वह रोमांच पैदा नहीं कर पाती, जिसकी एक खोजी थ्रिलर से उम्मीद होती है।
अगर आपको पत्रकारिता, भ्रष्टाचार और सत्ता के खिलाफ संघर्ष पर आधारित फिल्में पसंद हैं, तो इसे एक बार देख सकते हैं। हालांकि, 'रिपोर्टिंग लाइव' से किसी बेहद रोमांचक या गहराई से झकझोर देने वाली फिल्म की उम्मीद न रखें। यह सच की अहमियत तो समझाती है, लेकिन उस सच के लिए लड़ने की कीमत दर्शकों को पर्याप्त रूप से महसूस नहीं करा पाती।
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कुल मिलाकर, 'रिपोर्टिंग लाइव' एक जरूरी मुद्दे पर बनी ऐसी फिल्म है, जो अपनी संभावनाओं का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाती। अवैध रेत खनन और मीडिया पर कारोबारी दबाव जैसे विषय इसे प्रासंगिक बनाते हैं, लेकिन कमजोर पटकथा, अनुमान के मुताबिक आगे बढ़ती जांच और सीमित भावनात्मक गहराई इसके प्रभाव को कम कर देते हैं। कलाकारों की कोशिशों के बावजूद कहानी वह रोमांच पैदा नहीं कर पाती, जिसकी एक खोजी थ्रिलर से उम्मीद होती है।
अगर आपको पत्रकारिता, भ्रष्टाचार और सत्ता के खिलाफ संघर्ष पर आधारित फिल्में पसंद हैं, तो इसे एक बार देख सकते हैं। हालांकि, 'रिपोर्टिंग लाइव' से किसी बेहद रोमांचक या गहराई से झकझोर देने वाली फिल्म की उम्मीद न रखें। यह सच की अहमियत तो समझाती है, लेकिन उस सच के लिए लड़ने की कीमत दर्शकों को पर्याप्त रूप से महसूस नहीं करा पाती।
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