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Hindi News ›   Entertainment ›   Movie Review ›   Rangoon movie review: Shahid Kapoor, Kangana Ranaut, Saif Ali Khan

Film Review: मैं 'रंगून' जाऊं कि नहीं, तय करें...

Fri, 24 Feb 2017 04:19 PM IST
रवि बुले/ अमर उजाला, मुंबई
रवि बुले/ अमर उजाला, मुंबई Updated Fri, 24 Feb 2017 04:19 PM IST
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Rangoon movie review: Shahid Kapoor, Kangana Ranaut, Saif Ali Khan
निर्माताः साजिद नाडियाडवाला
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निर्देशकः विशाल भारद्वाज
सितारेः सैफ अली खान, शाहिद कपूर, कंगना रनौत
रेटिंग**


विशाल भारद्वाज ज्यादातर पुराने साहित्य से प्रेरणा लेकर सिनेमा रचते आए हैं। इस बार उन्होंने पुराने सिनेमा से प्रेरणा ली। भले वह कहें कि 1940-50 के दशक की फिल्म नायिका फीयरलैस नाडिया से उनकी जांबाज जूलिया (कंगना रनौत) का लेना-देना नहीं, परंतु कैमरे की गवाही खुला निमंत्रण हैं। रंगून आज के सिनेमा में राष्ट्रभक्ति को और आगे बढ़ाती है। इसमें जन गण मन की धुन रह-रह कर बजती है। यहां वतनपरस्ती के साथ दो नायकों-एक नायिका का प्रेम त्रिकोण भी है। इतिहास गवाह है कि ऐसे त्रिकोण बलिदान के शिकार हो जाते हैं।
 

जरूरत से ज्यादा कंगना के कंधों पर टिकी है 'रंगून'

Rangoon movie review: Shahid Kapoor, Kangana Ranaut, Saif Ali Khan
कहानी यह कि बंजारन जूलिया को प्रोड्यूसर रूसी बिलिमोरिया (सैफ अली खान) ने उसकी मां से हजार रुपये में तब खरीदा था, जब वह बहुत छोटी थी। जूलिया प्रसिद्ध स्टंट अभिनेत्री है और रूसी से शादी करना चाहती है। जूलिया-रूसी के प्यार में जमादार नवाब मलिक (शाहिद कपूर) की तब एंट्री होती है, जब द्वितीय विश्व युद्ध के दौर में अंग्रेज कर्नल डेविड हार्डिंग्स, जूलिया को सीमा पर फौजियों के मनोरंजन को आमंत्रित करता है। नवाब, जूलिया का बॉडीगार्ड है। जापानियों के हमले में नवाब-जूलिया अलग-थलग पड़ जाते हैं और उनमें प्यार हो जाता है। कहानी में तब कुछ किरदारों के सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी की मदद करने के राज खुलते हैं और फिल्म का दायरा बढ़ जाता है।
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'रंगून' फिल्म समीक्षा: निराश प्रेम, नाकाम फार्मूला

Rangoon movie review: Shahid Kapoor, Kangana Ranaut, Saif Ali Khan
फिल्म जूलिया की चमक-दमक से बढ़ती हुई गहरी-अंधियारी राहों में मुड़ जाती है। मकबूल, ओमकारा और हैदर की तरह विशाल यहां किरदारों में गहरे नहीं उतर पाए। वे उनकी मानसिक बुनावट को नहीं खोल पाते और तीनों अहम चरित्र साधारण प्रेम कहानी में उलझे रह जाते हैं। देशप्रेम फार्मूलाबद्ध हो जाता है। फिल्मप्रेमियों के लिए अच्छी खबर नहीं है।

रंगून जरूरत से ज्यादा कंगना के कंधों पर टिकी है। जबकि सिनेमा टीम के संतुलन से सुंदर बनता है। कंगना के सामने शाहिद टिक नहीं पाते। न अभिनय में और न हाव-भाव में। सैफ प्रभावी हैं परंतु उनके रोल से न्याय नहीं हुआ। वह सिर्फ फिल्म प्रोड्यूसर जैसे हैं। उनके प्रेमी वाला पक्ष पीछे रह गया।
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जरूरत से ज्यादा कंगना के कंधों पर टिकी है 'रंगून'

Rangoon movie review: Shahid Kapoor, Kangana Ranaut, Saif Ali Khan
रंगून अरुणाचल प्रदेश में शूट हुई, परंतु यहां युद्ध की छाया को कैमरे ने ज्यादा कैद किया। फिल्म का वीएफएक्स कमजोर है। क्लाइमेक्स में फिल्म टूटे पुल की तरह लचर हो जाती है। गीतों में गुलजार की छाप और थाप है। मगर उसे अच्छी कहानी का सहारा नहीं है। विशाल से आप बेहतर की उम्मीद करते हैं, परंतु यहां वह निराश करते हैं।

सवाल यह भी है कि क्या कॉपीराइट मुकदमे से फिल्म पर असर पड़ा? मुकदमे के बाद क्या इसे फिर संपादित किया गया? इससे फिल्म की लय बिगड़ी? यह सच है तो बॉलीवुड को गिरेबान में झांकने का समय आ गया है कि दूसरों की रचनाओं में सेंध लगाने से बेहतर है ईमानदारी बरतना। दुनिया पारदर्शी होती जा रही है। सेंधमारी के विरुद्ध आवाजें तेज हैं। कॉपीराइट कानून की सख्ती पर धीरे-धीरे सही, मगर बात होने लगी है।
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