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गांधारी मूवी रिव्यू: तापसी पन्नू ने एक्शन में छोड़ी छाप, लेकिन मां-बेटी की कहानी क्यों नहीं कर पाई इमोशनल?
सार
Gandhari Film Review In Hindi: ‘गांधारी’ नाम सुनते ही महाभारत याद आती है। वहां गांधारी ने पति के लिए आंखों पर पट्टी बांधी थी, यहां बानी अपनी बेटी के लिए अंधेरे रास्ते पर निकलती है। एक मां अपनी बच्ची के लिए किस हद तक जा सकती है, फिल्म इसी सवाल से शुरू होती है। सुनने में आइडिया अच्छा है, इसलिए फिल्म से उम्मीद भी बनती है। पढ़िए कैसी है तापसी की फिल्म?
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'गांधारी' मूवी रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला
Movie Review
‘गांधारी’
कलाकार
तापसी पन्नू
,
इश्वाक सिंह
,
स्वास्तिका मुखर्जी
,
छाया कदम
,
जतिन सरना
,
मीता वशिष्ठ
और
कियारा चौहान
लेखक
कनिका ढिल्लों
निर्देशक
देवाशीष मखीजा
निर्माता
कनिका ढिल्लों
रिलीज डेट
3 सितंबर
रेटिंग
2/5
विस्तार
चाइल्ड ट्रैफिकिंग पर हिंदी सिनेमा में पहले काफी कुछ हो चुका है। ‘मर्दानी’, ‘लव सोनिया’ और ‘सेक्टर 36’ इस विषय को अलग-अलग तरीके से दिखा चुकी हैं। ‘गांधारी’ इसमें मां की तलाश, बदला और एक्शन जोड़ती है।
साथ ही जॉयपुर्रा की अलग दुनिया, बहुरुपिए, सुरंगें और रहस्यमयी पूजा-पाठ भी कहानी का हिस्सा हैं। लेकिन सवाल यही है कि इन सबके बावजूद क्या ‘गांधारी’ एक असरदार कहानी बन पाती है? पढ़िए पूरा रिव्यू...
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साथ ही जॉयपुर्रा की अलग दुनिया, बहुरुपिए, सुरंगें और रहस्यमयी पूजा-पाठ भी कहानी का हिस्सा हैं। लेकिन सवाल यही है कि इन सबके बावजूद क्या ‘गांधारी’ एक असरदार कहानी बन पाती है? पढ़िए पूरा रिव्यू...
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'गांधारी' मूवी रिव्यू
- फोटो : सोशल मीडिया
कहानी
बानी (तापसी पन्नू) और गोकुल (इश्कवाक सिंह) की जिंदगी अपनी 6 साल की बेटी मिष्ठी (किआरा चौहान) के इर्द-गिर्द घूमती है। एक सफर के दौरान मिष्ठी का अपहरण हो जाता है। रेलवे स्टेशन पर बच्ची को लेकर भाग रही महिला का पीछा करते हुए बानी पर हमला होता है। आंख के पास गंभीर चोट लगने के बाद.. कुछ समय के लिए उसकी आंखों की रोशनी चली जाती है।
डॉक्टर इसे ट्रॉमा से जुड़ी चोट बताते हैं। लेकिन बानी के लिए अंधेरा सिर्फ आंखों तक सीमित नहीं है। उसे अपनी बेटी को ऐसे शहर में ढूंढना है, जहां बच्चों के गायब होने के पीछे एक बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है।
जॉयपुर्रा में कई बच्चों के गायब होने की बात सामने आती है और मामला चाइल्ड ट्रैफिकिंग से जुड़ता है। स्थानीय पुलिस सुस्त है और वरिष्ठ अधिकारी कबीर (जतिन सरना) अपनी तरफ से जांच आगे बढ़ाते हैं। कहानी का बैकड्रॉप बंगाल है और जॉयपुर्रा एक काल्पनिक शहर है। यहां बहुरुपिए, सुरंगें और रहस्यमयी पूजा-पाठ की परंपराएं हैं, जो फिल्म को अलग माहौल देती हैं।
बानी (तापसी पन्नू) और गोकुल (इश्कवाक सिंह) की जिंदगी अपनी 6 साल की बेटी मिष्ठी (किआरा चौहान) के इर्द-गिर्द घूमती है। एक सफर के दौरान मिष्ठी का अपहरण हो जाता है। रेलवे स्टेशन पर बच्ची को लेकर भाग रही महिला का पीछा करते हुए बानी पर हमला होता है। आंख के पास गंभीर चोट लगने के बाद.. कुछ समय के लिए उसकी आंखों की रोशनी चली जाती है।
डॉक्टर इसे ट्रॉमा से जुड़ी चोट बताते हैं। लेकिन बानी के लिए अंधेरा सिर्फ आंखों तक सीमित नहीं है। उसे अपनी बेटी को ऐसे शहर में ढूंढना है, जहां बच्चों के गायब होने के पीछे एक बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है।
जॉयपुर्रा में कई बच्चों के गायब होने की बात सामने आती है और मामला चाइल्ड ट्रैफिकिंग से जुड़ता है। स्थानीय पुलिस सुस्त है और वरिष्ठ अधिकारी कबीर (जतिन सरना) अपनी तरफ से जांच आगे बढ़ाते हैं। कहानी का बैकड्रॉप बंगाल है और जॉयपुर्रा एक काल्पनिक शहर है। यहां बहुरुपिए, सुरंगें और रहस्यमयी पूजा-पाठ की परंपराएं हैं, जो फिल्म को अलग माहौल देती हैं।
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'गांधारी' मूवी रिव्यू
- फोटो : वीडियो ग्रैब
अभिनय
तापसी पन्नू के लिए एक्शन कोई नई चीज नहीं है। ‘बेबी’ और ‘नाम शबाना’ में वह पहले भी एक्शन करती नजर आ चुकी हैं। ‘गांधारी’ में भी फाइट सीन्स उनके हिस्से की सबसे मजबूत चीज हैं। वह बानी के किरदार के एक्शन वाले हिस्से को अच्छे से निभाती हैं और मारधाड़ वाले सीन्स में उनका कॉन्फिडेंस साफ नजर आता है।
समस्या तब आती है जब बानी को सिर्फ लड़ना नहीं, टूटना भी होता है। बेटी को खोने के बाद मां की घबराहट और दर्द हर जगह उस तरह नहीं पहुंचता, जिस तरह पहुंचना चाहिए। कई बार तापसी की एक्शन हीरो वाली छवि किरदार की मां वाली बेचैनी को ढक देती है।
इश्कवाक सिंह गोकुल के रूप में ठीक हैं, लेकिन उनका किरदार तापसी के सामने हल्का पड़ता है। पिता भी अपनी बेटी की तलाश में परेशान है, लेकिन फिल्म उसे बानी की बराबरी का इमोशनल किरदार नहीं बना पाती। बानी और गोकुल की केमिस्ट्री भी साधारण लगती है।
मीता वशिष्ठ फिल्म में ज्यादा असर छोड़ती हैं। झुनू अंबा के किरदार में उनके पास रहस्य भी है और ठहराव भी। छाया कदम ध्यान खींचती हैं। जतिन सरना, चंदन रॉय, स्वास्तिका मुखर्जी और प्रशांत नारायणन अपने-अपने हिस्से में ठीक हैं, लेकिन किसी को ज्यादा जगह नहीं मिलती।
तापसी पन्नू के लिए एक्शन कोई नई चीज नहीं है। ‘बेबी’ और ‘नाम शबाना’ में वह पहले भी एक्शन करती नजर आ चुकी हैं। ‘गांधारी’ में भी फाइट सीन्स उनके हिस्से की सबसे मजबूत चीज हैं। वह बानी के किरदार के एक्शन वाले हिस्से को अच्छे से निभाती हैं और मारधाड़ वाले सीन्स में उनका कॉन्फिडेंस साफ नजर आता है।
समस्या तब आती है जब बानी को सिर्फ लड़ना नहीं, टूटना भी होता है। बेटी को खोने के बाद मां की घबराहट और दर्द हर जगह उस तरह नहीं पहुंचता, जिस तरह पहुंचना चाहिए। कई बार तापसी की एक्शन हीरो वाली छवि किरदार की मां वाली बेचैनी को ढक देती है।
इश्कवाक सिंह गोकुल के रूप में ठीक हैं, लेकिन उनका किरदार तापसी के सामने हल्का पड़ता है। पिता भी अपनी बेटी की तलाश में परेशान है, लेकिन फिल्म उसे बानी की बराबरी का इमोशनल किरदार नहीं बना पाती। बानी और गोकुल की केमिस्ट्री भी साधारण लगती है।
मीता वशिष्ठ फिल्म में ज्यादा असर छोड़ती हैं। झुनू अंबा के किरदार में उनके पास रहस्य भी है और ठहराव भी। छाया कदम ध्यान खींचती हैं। जतिन सरना, चंदन रॉय, स्वास्तिका मुखर्जी और प्रशांत नारायणन अपने-अपने हिस्से में ठीक हैं, लेकिन किसी को ज्यादा जगह नहीं मिलती।
'गांधारी' मूवी रिव्यू
- फोटो : सोशल मीडिया
निर्देशन
देवाशीष मखीजा ने जॉयपुर्रा को फिल्म का सबसे दिलचस्प हिस्सा बनाया है। गलियां, बहुरुपिए, चेहरे पर रंग, सुरंगें और पूजा...इन सबमें एक अजीब और असहज माहौल है। बानी के अंधेपन को कहानी की रणनीति से जोड़ना भी अच्छा विचार है।
दिक्कत यह है कि फिल्म हर जगह उतनी टाइट नहीं रहती। शुरुआत में बेटी की तलाश पकड़ बनाती है, फिर कहानी कई दिशाओं में घूमने लगती है। आखिर में एक्शन पर काफी भरोसा किया जाता है। कुछ फाइट सीक्वेंस इतने लंबे हो जाते हैं कि कहानी का तनाव पीछे छूट जाता है .. कुछ एक्शन सीक्वेंस सिर्फ बानी की ताकत दिखाने तक सीमित रह जाते हैं।
देवाशीष मखीजा ने जॉयपुर्रा को फिल्म का सबसे दिलचस्प हिस्सा बनाया है। गलियां, बहुरुपिए, चेहरे पर रंग, सुरंगें और पूजा...इन सबमें एक अजीब और असहज माहौल है। बानी के अंधेपन को कहानी की रणनीति से जोड़ना भी अच्छा विचार है।
दिक्कत यह है कि फिल्म हर जगह उतनी टाइट नहीं रहती। शुरुआत में बेटी की तलाश पकड़ बनाती है, फिर कहानी कई दिशाओं में घूमने लगती है। आखिर में एक्शन पर काफी भरोसा किया जाता है। कुछ फाइट सीक्वेंस इतने लंबे हो जाते हैं कि कहानी का तनाव पीछे छूट जाता है .. कुछ एक्शन सीक्वेंस सिर्फ बानी की ताकत दिखाने तक सीमित रह जाते हैं।
'गांधारी' मूवी रिव्यू
- फोटो : सोशल मीडिया
पटकथा और लेखन
कनिका ढिल्लों की पटकथा और लेखन में कमी आइडिया की नहीं, फोकस की है। बेटी का अपहरण, चाइल्ड ट्रैफिकिंग, पुलिस जांच, बहुरुपियों की दुनिया और बानी का अतीत ...सब कुछ एक साथ चलता है। शुरुआत में यह दिलचस्प लगता है, लेकिन आगे कहानी बिखरने लगती है।
लंबे डायलॉग और फ्लैशबैक रफ्तार धीमी करते हैं। कई जगह रहस्य को दिखाने के बजाय डायलॉग के जरिए समझा दिया जाता है, जिससे सस्पेंस कम हो जाता है। बेटी के गायब होने का दर्द दिखाने से ज्यादा फिल्म जल्दी ही बानी को एक्शन मोड में ले जाती है। ट्विस्ट भी चौंकाने के बजाय कहानी को बस आगे बढ़ाते हैं।
सबसे बड़ी कमी बानी और मिष्ठी के रिश्ते में है। मिष्ठी के गायब होने से ही पूरी कहानी शुरू होती है... लेकिन फिल्म मां-बेटी के रिश्ते को इतना मजबूत नहीं बना पाती कि बानी की बेटी के लिए लड़ाई देखकर दर्शक भी बेचैन हो जाए।
अच्छे आइडिया के बावजूद पटकथा और लेखन कहानी को मजबूती से बांध नहीं पाते।
कनिका ढिल्लों की पटकथा और लेखन में कमी आइडिया की नहीं, फोकस की है। बेटी का अपहरण, चाइल्ड ट्रैफिकिंग, पुलिस जांच, बहुरुपियों की दुनिया और बानी का अतीत ...सब कुछ एक साथ चलता है। शुरुआत में यह दिलचस्प लगता है, लेकिन आगे कहानी बिखरने लगती है।
लंबे डायलॉग और फ्लैशबैक रफ्तार धीमी करते हैं। कई जगह रहस्य को दिखाने के बजाय डायलॉग के जरिए समझा दिया जाता है, जिससे सस्पेंस कम हो जाता है। बेटी के गायब होने का दर्द दिखाने से ज्यादा फिल्म जल्दी ही बानी को एक्शन मोड में ले जाती है। ट्विस्ट भी चौंकाने के बजाय कहानी को बस आगे बढ़ाते हैं।
सबसे बड़ी कमी बानी और मिष्ठी के रिश्ते में है। मिष्ठी के गायब होने से ही पूरी कहानी शुरू होती है... लेकिन फिल्म मां-बेटी के रिश्ते को इतना मजबूत नहीं बना पाती कि बानी की बेटी के लिए लड़ाई देखकर दर्शक भी बेचैन हो जाए।
अच्छे आइडिया के बावजूद पटकथा और लेखन कहानी को मजबूती से बांध नहीं पाते।
'गांधारी' मूवी रिव्यू
- फोटो : सोशल मीडिया
‘गांधारी’ नाम कितना सही?
महाभारत की गांधारी और बानी के बीच आंखों का कनेक्शन फिल्म साफ तौर पर बनाती है। वहां आंखों पर पट्टी पति के लिए थी, यहां अंधेरा बेटी तक पहुंचने का रास्ता बनता है। विचार अच्छा है, मगर फिल्म इस कनेक्शन को ज्यादा गहराई से इस्तेमाल नहीं कर पाती।
महाभारत की गांधारी और बानी के बीच आंखों का कनेक्शन फिल्म साफ तौर पर बनाती है। वहां आंखों पर पट्टी पति के लिए थी, यहां अंधेरा बेटी तक पहुंचने का रास्ता बनता है। विचार अच्छा है, मगर फिल्म इस कनेक्शन को ज्यादा गहराई से इस्तेमाल नहीं कर पाती।
'गांधारी' मूवी रिव्यू
- फोटो : सोशल मीडिया
देखें या नहीं?
‘गांधारी’ उन फिल्मों में से है, जिनका कॉन्सेप्ट आपको फिल्म शुरू होने से पहले ज्यादा उत्साहित करता है, फिल्म खत्म होने के बाद नहीं। अगर आप तापसी पन्नू की एक्शन फिल्मों के फैन हैं और कहानी से ज्यादा स्क्रीन पर उनकी फाइट देखना चाहते हैं, तो फिल्म आपको कुछ हद तक पसंद आ सकती है। लेकिन अगर आप एक ऐसी मां की कहानी देखने जा रहे हैं, जिसकी बेटी के लिए पूरी दुनिया से लड़ने की वजह आपको अंदर तक महसूस हो, तो यहां निराशा हाथ लगती है।
फिल्म में कई दिलचस्प चीजें हैं, लेकिन वे मिलकर एक याद रह जाने वाली फिल्म नहीं बना पातीं।
‘गांधारी’ उन फिल्मों में से है, जिनका कॉन्सेप्ट आपको फिल्म शुरू होने से पहले ज्यादा उत्साहित करता है, फिल्म खत्म होने के बाद नहीं। अगर आप तापसी पन्नू की एक्शन फिल्मों के फैन हैं और कहानी से ज्यादा स्क्रीन पर उनकी फाइट देखना चाहते हैं, तो फिल्म आपको कुछ हद तक पसंद आ सकती है। लेकिन अगर आप एक ऐसी मां की कहानी देखने जा रहे हैं, जिसकी बेटी के लिए पूरी दुनिया से लड़ने की वजह आपको अंदर तक महसूस हो, तो यहां निराशा हाथ लगती है।
फिल्म में कई दिलचस्प चीजें हैं, लेकिन वे मिलकर एक याद रह जाने वाली फिल्म नहीं बना पातीं।