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Movie Review: 'हिंदी मीडियम', भाषा बन गई घर की मुर्गी

Fri, 19 May 2017 03:49 PM IST
रवि बुले
रवि बुले Updated Fri, 19 May 2017 03:49 PM IST
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Film Review Of 'Hindi Medium' Starring Irrfan Khan And Saba Qamar
'हिंदी मीडियम' फिल्म रिव्यू
निर्माताः दिनेश विजन, भूषण कुमार
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निर्देशकः साकेत चौधरी

सितारेः इरफान खान, सबा कमर, दीपक डोबरियाल, तिलोत्तमा शोम

रेटिंग: **1/2

हिंदी के बारे में अच्छी बातें करना सबको अच्छा लगता है। परंतु सच यही है कि हिंदी घर की मुर्गी है। आजादी के बाद लगातार मुटाती अंग्रेजी ने देश को फिर बांट दिया है। भारत और इंडिया। भारत गरीब-कमजोर है, इंडिया अमीर-ताकतवर है। भारत को अब रोटी-कपड़ा-मकान चाहिए तो उसे इंडिया की भाषा अंग्रेजी जाननी पड़ेगी। फिल्म की नायिका कहती है, ‘इस देश में अंग्रेजी जुबान नहीं है, क्लास (वर्ग) है क्लास...।’ यह कड़वा सच है। बच्चों का भविष्य मां-बाप को डराता है। सरकारी स्कूल में पढ़ेंगे तो अंग्रेजी नहीं सीख पाएंगे। कोई अंग्रेजी में बात करेगा तो उनकी रूह कांप जाएगी। मां-बाप का हिंदी पर से भरोसा उठ गया है। इसलिए बच्चों को फिरंग बनाने की ट्रेनिंग बचपन से जरूरी है।

निर्देशक साकेत चौधरी की फिल्म इन्हीं बातों को सामने लाने की कोशिश है। वह सरकार के शिक्षा के अधिकार (आरटीई) के जरिये गरीबों को भी इंग्लिश मीडियम में पढ़ाने के प्रयास भी बताती है परंतु फिल्म में हकीकत कम और हल्का-फुल्कापन ज्यादा है। चौधरी ने कॉमिक अंदाज में बात की है मगर वह 'थ्री इडियट्स' जैसी तार्कितता और 'तारे जमीन पर' वाली संवेदना को नहीं छू पाते। बहुत पीछे रह जाते हैं।
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कलाकारों के अभिनय ने बचाई फिल्म

Film Review Of 'Hindi Medium' Starring Irrfan Khan And Saba Qamar
'हिंदी मीडियम' फिल्म रिव्यू
फिल्म बीएमडब्लू में चलने और भव्य बंगले में रहने वाले अमीर राज बत्रा (इरफान) और मीता (सबा कमर) की कहानी है। जिनके पास सब कुछ है परंतु वह झूठे हथकंडों द्वारा गरीब कोटे से अपनी बच्ची का एडमिशन दिल्ली के टॉप अंग्रेजी स्कूल में कराते हैं। कहानी में गरीब श्याम (दीपक डोबरियाल) भी है जो हाड़ तोड़ मेहनत करके भी मक्खन जैसा दिल रखता है और पल में पिघल जाता है। बावजूद इसके कि एक अमीर ने गरीब बन कर उसके बेटे का हक मार दिया।

'हिंदी मीडियम' में मुद्दों की संजीदगी कम और ग्लैमर का दिखावा ज्यादा है। पूरा मध्यमवर्ग, जो वास्तव में हिंदी-अंग्रेजी के द्वंद्व और महंगी शिक्षा के पाटों में बुरी तरह पिस रहा है, वह कहीं नहीं है। कहानी और किरदार कहीं-कहीं नकली लगने लगते हैं। स्कूलों का असली-नकली कोई चेहरा सामने नहीं आता। स्कूलों के अंदर और स्कूलों को लेकर होने वाली राजनीति भी नहीं दिखती। एक अच्छे विषय को गहराई से रिसर्च किए बिना पेश किया गया है। फिल्म ऐसी कोई बात नहीं कहती जो पहले से आपको न पता हो।

फिर भी जो बात 'हिंदी मीडियम' को बचाती है वह तीनों कलाकारों का अभिनय है। इरफान हमेशा की तरह बढ़िया हैं और अपने अंदाज से बांधते हैं। पाकिस्तानी एक्ट्रेस सबा कमर इरफान को अंगुलियों पर नचाने वाली बीवी बनी हैं और इस काम को उन्होंने खूबसूरती से अंजाम दिया है। दीपक डोबरियाल को 'तनु वेड्स मनु' के बाद फिर से उल्लेखनीय भूमिका मिली, जिसमें वह अपनी प्रतिभा से न्याय करते हैं। एडमीशन की दौड़ में मदद करने वाले काउंसलर की भूमिका में तिलोत्तमा शोम उपस्थिति दर्ज कराती हैं। अमृता सिंह, नेहा धूपिया और संजय सूरी खानापूर्ति टाइप की भूमिकाओं में हैं। गीत-संगीत की यहां खास गुंजायश नहीं थी और जो है, वह विशेष नहीं है। अगर आप 'हिंदी मीडियम' को लेकर गंभीर न हों और हिंदी तथा हिंदीवालों की समस्याओं के बहाने थोड़ा खुद को गुदगुदाना चाहें तो फिल्म देख सकते हैं।
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