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Raja Harishchandra: भारत की पहली फिल्म बनाने में आईं थीं ये चुनौतियां, निर्देशक की पत्नी ने बेचे थे गहने

Sat, 03 May 2025 07:16 AM IST
सिराजुद्दीन एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: सिराजुद्दीन Updated Sat, 03 May 2025 07:16 AM IST
सार

First Indian Film Raja Harishchandra: भारत की सबसे पहली फिल्म का नाम 'राजा हरिश्चंद्र' है। यह फिल्म 3 मई 1913 को रिलीज हुई थी। इस फिल्म को बनाने की कहानी बहुत दिलचस्प है। आइए इसके बारे में जानते हैं।

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Dadasaheb Phalke face challenges to make First Indian Film Raja Harishchandra
राजा हरिश्चंद्र - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

भारत में हर हफ्ते कई फिल्में रिलीज होती हैं। इन फिल्मों में बॉलीवुड के अलावा कई दूसरी भाषाओं की फिल्में होती हैं। ऐसे में लोगों को यह जानने में दिलचस्पी होती है कि भारत में सबसे पहली फिल्म कौन सी थी। आज हम आपको बताने वाले हैं कि भारतीय सिनेमा की सबसे पहली फिल्म कौन सी थी और इसे बनाने में कितनी मुश्किल हुई थी। तो चलिए जानते हैं। 
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इन लोगों ने किया अभिनय
भारत की सबसे पहली फिल्म 'राजा रहिश्चंद्र' थी। यह फिल्म ब्लैक एंड व्हाइट थी। इसे दादा साहब फाल्के ने निर्देशित किया था और इसके निर्माता भी वही थे। दादा साहब फाल्के को ही भारतीय सिनेमा का जनक माना जाता है। वह प्रोड्यूसर, स्क्रीन राइटर और डायरेक्टर थे। 'राजा हरिश्चंद्र' फिल्म में दत्तात्रेय दामोदर दाबके, अन्ना सालुंके, भालचंद्र फाल्के और गजानन वासुदेव साने ने अभिनय किया था।
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Dadasaheb Phalke face challenges to make First Indian Film Raja Harishchandra
राजा हरिश्चंद्र - फोटो : सोशल मीडिया
फिल्म राजा हरिश्चंद्र की कहानी
फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' की कहानी सत्यवादी हरिश्चंद्र की कहानी से प्रेरित है। यह भारत की बहुत मशहूर कहानी है। यही वजह है कि दादा साहब फाल्के ने इसी कहानी पर फिल्म बनाई। 

बिना आवाज के थी पहली फिल्म
भारत की सबसे पहली फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' बिना आवाज वाली ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म थी। इस फिल्म का सबटाइटल अंग्रेजी, मराठी और हिंदी था। इस दौर में फिल्मों में ऑडियो का आविष्कार नहीं हुआ था। 
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दादा सहब फाल्के - फोटो : अमर उजाला
21 दिनों में बनकर तैयार हुई थी फिल्म
आज के दौर की फिल्मों को बनाने में काफी वक्त लगता है लेकिन फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' को बनाने में 21 दिन लगे थे। इस फिल्म की ड्यूरेशन 40 मिनट थी। इस फिल्म का प्रीमियर ओलंपिया थियेटर मुंबई में 21 अप्रैल 1913 को हुआ था। इसके बाद यह फिल्म 3 मई 1913 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी।

महिला अभिनय करने के लिए नहीं राजी थी
जिस दौर में दादा साहब फाल्के फिल्म बनाने की सोच रहे थे वह दौर अंग्रेजों का था। फिल्म में काम करने के लिए पुरुष कलाकार तो मिल गए थे लेकिन इसमें काम करने के लिए कोई भी महिला कलाकार नहीं मिल पाई थी। बताया जाता है कि दादा साहब फाल्के मुंबई के रेड लाइट एरिया भी गए थे लेकिन वहां भी कोई महिला फिल्म में काम करने के लिए तैयार नहीं हुई थी। इसके बाद अन्ना सालुंके नाम के व्यक्ति ने फिल्म में महिला का किरदार निभाया। 

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राजा हरिश्चंद्र - फोटो : सोशल मीडिया
पत्नी ने बेच दिए अपने गहने
राजा हरिश्चचंद्र फिल्म का बजट 15000 रुपये था। ये उस दौर की बड़ी रकम थी। ऐसे में दादा साहब फाल्के की पत्नी सरस्वती बाई ने फिल्म बनाने में बड़ा योगदान दिया। फिल्म बनाने के लिए जब पैसे कम पड़े तो उन्होंने अपने जेवर बेच दिए। दादा साहब ने जीवन बीमा पॉलिसी बेची और दोस्तों से पैसे उधार लिए।
फिल्म की शूटिंग के दौरान सरस्वती बाई 500 लोगों का खाना बनाती थीं। फिल्म में अभिनय करने वाले लोगों के कपड़े भी वह खुद ही धुलती थीं। कई सीन के वक्त वह सफेद चादर लेकर घंटों खड़ी रहती थीं।
दादा साहब ने खुद ही इसकी स्क्रिप्ट लिखी, निर्देशन किया, सेट डिजाइन किया, मेकअप से लेकर एडिटिंग तक सब संभाला।

कई दूसरी चुनौतियां
पैसों की कमी के अलावा उस दौर में दादा साहब फाल्के को फिल्म बनाने में कई दूसरी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उस दौर में तकनीकी और उपकरण बहुत सीमित थे। ऐसे में दादा साहब को बहुत ही सीमित संसाधनों में फिल्म पूरी करनी पड़ी।
उस दौर में आज के जितने अच्छे कैमरे, फिल्म रोल और लैब भी नहीं थी। इन चुनौतियों के बावजूद दादा साहब ने वह कर दिया जो कोई नहीं कर सका।
उस दौर में लोग भारतीय फिल्मों पर यकीन नहीं करते थे। वह विदेशी फिल्में देखते थे। ऐसे में दादा साहब को भारतीय फिल्म को कामयाब बनाने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ी।

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दादा सहब फाल्के - फोटो : सोशल मीडिया
दादा साहब फाल्के पुरस्कार की शुरूआत
दादा साबह फाल्के ने कई फिल्में बनाईं। यह फिल्में काफी कामयाब रहीं। भारतीय सिनेमा में उनका योगदान बहुत ज्यादा रहा। इसी को देखते हुए साल 1969 को उनकी जन्म शताब्दी के मौके पर भारत सरकार ने भारतीय सिनेमा में अच्छा काम करने वालों को दादा साहब फाल्के पुरस्कार देने का एलान किया। ये पुरस्कार भारत सरकार की तरफ से दिया जाने वाला सबसे बड़ा पुरस्कार है। जिसको यह पुरस्कार दिया जाता है उसे 10 लाख रुपये, शॉल और स्वर्ण कमल दिया जाता है।

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