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दुनिया आपको छोटा बताती रहेगी... हार मत मानिए, ‘अमर उजाला’ संवाद में बोले अभिनेता शाहरुख खान

Mon, 17 Dec 2018 03:02 AM IST
यशवीर सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: यशवीर सिंह Updated Mon, 17 Dec 2018 03:02 AM IST
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shahrukh khan talk with amar ujala in samwad
शाहरुख खान

‘दुनिया में कोई न कोई अक्सर आपको छोटा बताता रहता है। कभी हम फर्स्ट नहीं आए, कोई और आ गया तो उसका उदाहरण देकर मां-बाप छोटा बताते हैं। पढ़ाई-नौकरी को लेकर भी ऐसा होता है। हम खुद भी अक्सर सोचते हैं कि याद कोई और हमसे आगे है। हमारा विचार था कि ऐसा कैरेक्टर जो शारीरिक रूप से कुछ कमजोर जरूर है, लेकिन इसकी वजह से उदास या कमतर महसूस नहीं करता।’ यह कहना है शाहरुख खान का।

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शाहरुख ने लखनऊ में ‘अमर उजाला’ से संवाद में जिंदगी, कॅरिअर, उतार-चढ़ाव, सफलता-असफलता, अनुभवों और परिवार से जुड़ी कई रोचक किस्से साझा किए। साथ ही जल्द रिलीज हो रही अपनी फिल्म ‘जीरो’ के बारे में अलग अंदाज में जानकारियां दीं। कहा- मेरी फिल्म ‘जीरो’ का यही संदेश है कि आत्मविश्वास मत हारिए। छोटे आदमी में बड़ा दिल है। वह बड़ा काम कर सकता है।
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हमारी जिंदगी में कमियां हो सकती हैं, शारीरिक वजहें, पतले या मोटे होने, गोरे या काले होने जैसी बातों से आप खुद को कमतर महसूस कर सकते हैं, लेकिन इसकी वजह से जीवन को मत हारिए। हम सभी किसी न किसी तरह से कमतर हो सकते हैं। भगवान ने हमें ऐसा ही बनाया है। हम यह सोचते रहें कि हम किसी और के जैसे हो जाएं, इस होड़ में जीवन को जीना मत भूल जाइए। जीवन तो एक ही है, क्या पता पुनर्जन्म जैसी कोई चीज ही न हो और हम इस एक जीवन को कमतरी की सोच-सोच में ही बिता डालें।

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युवाओं को संदेश...

सफलता पर बहुत ज्यादा खुश न हों, असफलता पर बहुत ज्यादा दुखी न हों
‘जो भी आप हासिल करते हैं, वह मील का पत्थर है। जो हासिल नहीं हुआ, वह स्पीड ब्रेकर है। इसका अंत नहीं है, जीवन चलता रहता है। एक पल को सोच कर देखिए... यह जो जिंदगी आप जी रहे हैं, क्या इसकेबाद कोई जीवन नहीं है। तो क्या इस जीवन में आप वह लॉलीपॉप नहीं खाना चाहेंगे जो आपको ललचाता रहा है? इसलिए सफलता या असफलता पर बहुत ज्यादा खुश या दुखी होने की जरूरत नहीं है। डेढ़ साल पहले घर के करीब एक युवा को इमारत से कूद कर जान देने का वीडियो देखा तो बहुत दुख हुआ... ऐसा क्या हुआ होगा जो जीवन को खत्म कर लिया?

असफलता का जश्न मनाना चाहता हूं...

दुखी होना सफलता या असफलता से संबंधित नहीं है। व्यक्ति किसी भी बात से प्रभावित हो सकता है। पत्नी को कहा है कि बच्चों को प्रभावित न होने दो, उनकी असफलता पर भी जश्न मनाओ। अभी कुछ दिन पहले आर्यन परीक्षा के दौरान एक पूरा पेपर ही पढ़ना भूल गया। मेरी मां और सास ने उसे बहुत डांटा... मैंने समझाया कि फेल होना सामान्य है, इसकी वजह से बच्चों पर दबाव न बनाएं। मैंने जामिया से मासकॉम किया है। इंजीनियर बनना चाहता था, लेकिन यह भी जानता हूं कि स्कूली के दिनों में गणित में 100 में से तीन अंक तक पा चुका हूं।

जीरो का मतलब है आपको नया मौका

‘हम जीरो को कुछ नहीं समझते, लेकिन यह आपको नया मौका देता है। यह हमारे जीवन के सबसे नीचे स्तर को बताता है। जब लगने लगता है कि सब कुछ खत्म हो गया... मगर इसे खत्म मत समझिए... भगवान से आपको जीवन फिर से जीने का एक मौका दिया है। अपनी गलतियां सुधारने का मौका दिया है। इस जीरो के स्तर पर आप कुछ नहीं होते हैं, लेकिन आप सब कुछ हासिल करने के बारे में भी सोच सकते हैं।

16 साल से लिख रहा बायोग्राफी

अपनी बायोग्राफी को मैं 16 साल लिख रहा हूं, लेकिन पूरी नहीं हो रही। मुझे लगा था कि बेटे आर्यन के जन्म पर पूरी हो गई, लेकिन फिर बेटी सुहाना हो गई, उसे नहीं छोड़ सकता था। अब अबराम हो गया है। जीवन में कई छोटे-बड़े मील का पत्थर जैसे क्षण आए हैं, जिन्हें उसमें समेटना चाहता हूं। जीवन इतनी घटनाओं से भरा है। बच्चों के आंखों में पिता की छवि बहुत बड़ी होती है, स्टार के लिए यह छवि और विशाल हो जाती है। दिल्ली का मेरा जीवन और उसकी यादें इस पुस्तक में बच्चों के लिए छोड़ जाना चाहता हूं, किसी आम पिता की तरह। वे पढ़ें और जानें कि किन मौकों पर मैं उदास हुआ, क्या वजहें थीं, क्या क्या किया।’

राम लीला से शुरुआत और आगे का सफर

कभी-कभी आप अच्छा ख्वाब देखते हैं तो लगता है कि नींद आपकी चलती रहे। बाहर से भले लोग सोचते हों कि बहुत अच्छी एक्टिंग करता है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि मैं सबसे अच्छा एक्टर या हीरो हूं। सवाल आ सकता है कि फिर मुझे सफलता क्यों मिली? शायद इसलिए कि मैं एक ही चीज करना चाहता था... एक्टिंग। अभी भी लोग पूछते हैं कि आप अमुक फिल्म जैसी फिल्म क्यों नहीं करते? किसी खास तरह की फिल्म ही क्यों करते हो? लेकिन सच कहूं तो मैं यह सब नहीं सोचता, सुबह उठकर बस यही लगता है कि अच्छी एक्टिंग कर सकूं, उसके लिए कुछ नया करुं। यह भी लगता कि इस सफर और सफलता की वजह अच्छे लोग और अच्छा वक्त मिलना था। 90 के दशक का समय ही ऐसा था कि हमारी पीढ़ी के लोग बदलाव के दौर से गुजर रहे थे। उस समय एक्शन फिल्में खत्म हो रही थीं, एंटी-स्टैबलिशमेंट की भावना खत्म हो रही थी, कुछ अच्छा नहीं लगे तो अब लोग लड़ नहीं पड़ते थे। डॉक्टरों, इंजीनियरों को दूसरे विकल्पों को सोचने का मौका मिल रहा था। ‘कभी हां, कभी ना’ के हीरो की तरह लोगों में हार को भी  स्वीकारने की भावना आ रही थी। कुछ हासिल ना भी हो तो जिंदगी बसर हो जाएगी, इस सोच के साथ लोग जीना सीख रहे थे।

पहली फिल्म आज तक नहीं देखी

यकीन मानिए, मैंने आज तक अपनी पहली फिल्म नहीं देखी। मैं खुद को थियेटर आर्टिस्ट मानता था। शूटिंग के दौरान एक सीन के लिए रोजाना के पेमेंट पर काम कर रहे कुछ कलाकारों ने पैसे ज्यादा मांग लिए। इस पर प्रोड्यूसर को कहते सुना कि इनका सीन कट कर दो। मुझे लगता था कि ये लोग हमारी कला को बर्बाद कर रहे हैं। गुड्डू धनोआ से काफी समय खफा रहा। अपना कैरेक्टर खराब होने की बात सोचता रहा।

फौजी का शाहरुख अब समझदार हो गया है

फौजी के वक्त थियेटर की वजह से जैसा स्वभाव था, मुझे लगता है कि अब वह बदला है, समझ भी आई है। अब जानता हूं कि फिल्म और थियेटर अलग अलग चीजें हैं। हिंदी फिल्मों में हीरो होता है, कैरेक्टर नहीं। भला कोई कैरेक्टर अचानक गाना कैसे गाने लग सकता है? ‘जीरो’ के लिए हमने प्रयास किया है कि बउवा सिंह को कैरेक्टर ही दिखाएं, वो गाना भी गाए तो अपनी वास्तविकता (कि वह बौना है) भूल न जाए।

लूजर महसूस करता हूं, कमी नहीं
मैं अपने जीवन में कोई कमी महसूस नहीं करता हूं। जो कुछ किया है, उसे बेहतर कर सकता था, यह ख्याल मन में नहीं लाता। इस चक्कर में अब तक जो किया है, उसका मजा खराब नहीं करना चाहता। जानता हूं कि हर फिल्म दिलवाले दुल्हनियां... नहीं कर सकता। मुझे हमेशा लगता है कि मैं जो काम कर रहा हूं, मेहनत कर रहा हूं, यही मेरी मंजिल नहीं है। उम्मीद करता हूं कि वह लोगों को बहुत पसंद आए। फिल्म खराब हो तो बाथरूम में जाकर दो घंटे नहाता हूं... सच बताऊं तो वहां आंसू बहाता हूं। फिर खुद से कहता हूं कि जो भी था, खत्म हो चुका है। अब नई कहानी कहनी है।

पापा की फिल्म देखने के लिए बच्चों में उत्साह नहीं

हमारे घर में ऐसा माहौल नहीं है कि बच्चों में पापा की फिल्म देखने का उत्साह हो। पत्नी कोशिश करती हैं कि सभी देखें, लेकिन बच्चों में ऐसा नहीं है। बच्चों को रईस अच्छी लगी, लेकिन दुखी थे कि मैं उसमें मर जाता हूं। दिलवाले जैसी फिल्में उन्हें अच्छी नहीं लगी। वे ईमानदारी और खुले दिल से बता देते हैं। किसी खास हीरोइन के साथ काम करने पर कोई बात नहीं होती, उनके लिए अनुष्का, आलिया, दीपिका दोस्त जैसी हैं। बेटा आर्यन अभी लॉस एंजिल्स में बीए फिल्म प्रोडक्शन का चार साल का कोर्स कर रहा है। बेटी सुहाना न्यूयॉर्क में एक्टिंग कोर्स शुरू करने जा रही हैं।

घर की झलक दिखाई, जहां नहीं चलता फिल्मी अंदाज
‘स्टार शाहरुख खान घर में किसी आम व्यक्ति की तरह है। अगर घर में गौरी के सामने दोनों हाथ खोल कर उसे बुलाने लग गया तो शायद वो थप्पड़ लगा देगी। घर पर किसी आम परिवार की तरह लड़ाई भी हो जाती है, जब मैं पलंग पर बैठकर खाना खाता हूं। अपने घर में मैं भी किसी फिल्मी स्टाइल यूनिफॉर्म में रहने वाला खानसामा चाहता हूं, लेकिन कई-कई वर्षों से हमारे लिए काम कर रहा स्टाफ वैसा नहीं हो सकता। उनकी भी घर में चलती है। घर के कामकाज की प्रमुख बीना है जो अक्सर मुझ पर गलत जगह जूते उतारने के लिए नाराज हो जाती है। दूसरी तरफ हिंदू पत्नी होने की बावजूद आपसी समन्वय भी है। हमारे घर में ईद की तैयारियां पत्नी करती है तो दीपावली पर पूजा के लिए पंडित बुलाने से लेकर पूजा की तैयारियां मेरे जिम्मे। ड्राइंग रूम में राधा-कृष्ण की प्रतिमा मेरी पसंद से लगाई गई, तो मलेशिया से कुरान पत्नी लेकर आई। बेटी सुहाना नमाज पढ़ती है और गायत्री मंत्र भी। हमने अपने बच्चों को कभी कोई धर्म मानने पर विवश नहीं किया।’

‘अपराजिता’ मुहिम को सराहा

शाहरुख ने बातचीत के दौरान ‘अमर उजाला’ की ‘अपराजिता’ मुहिम के बारे में जाना और इसे सराहा। उन्होंने कहा कि ऐसी मुहिम महिलाओं की छवि को मजबूती से पेश करने के लिए जरूरी है। खुद अपना अनुभव बताया कि उन्होंने अपने पिता ताज मोहम्मद खान के नाम पर एक मुहिम शुरू की है, जिसमें एसिड अटैक सर्वाइवर्स को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए प्रेरित किया जाता है। उन्होंने महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए उन्हें खुद में विश्वास बढ़ाने की बात कही।

पत्रकारिता की पढ़ाई से कॅरिअर में मदद मिली
जामिया मिलिया से मैंने मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की है। इसका फायदा लोगों और उनके विचारों को समझने में मिलता है। यह पढ़ाई हमेशा काम आती है। पिताजी ने सिखाया था कि शिक्षित व्यक्ति वह है जो अखबार का हर पेज पढ़कर कर अपने काम की कुछ न कुछ जानकारी हासिल कर ले, भले ही विशेषज्ञ न बने।

परिवार के बाद अखबार पर सबसे ज्यादा विश्वास... इसे बनाए रखिए

मुझे अखबारों में खबरें गहराई से चाहिए, विश्लेषण चाहिए। खबर तो हमें डिजिटल माध्यम से पहले ही मिल चुकी होती है। अखबार कुछ देरी से आते हैं, सूचना देने के आगे उन्हें हमें एक व्यू पॉइंट देना चाहिए। दुनिया बदल रही है, मुझे इसके बारे में शिक्षित होना चाहिए। कुछ वर्षों में डिजिटल मीडिया के तेज प्रसार के बाद सबको यह जल्दी है कि खबर को हवाई जहाज की तरह उड़ाकर ले जाएं, लेकिन याद रखें कि खबर को जमीन पर उतारना भी है। मैं जब कोई आर्टिकल पढ़ रहा हूं तो मुझे पता होना चाहिए कि वह खत्म कहां हुआ है। केवल डराना नहीं है, अंत भी बताना है। अपने परिवार के बाद शायद सबसे ज्यादा प्रिंट न्यूज पर विश्वास करता हूं। इस विश्वास को बनाए रखना जरूरी है। मेरी फिल्म पैसा देकर देखने आने वाले लोगों को अगर मजा नहीं आएगा तो यह विश्वास तोड़ना ही तो हुआ।

घर की झलक दिखाई : जहां नहीं चलता फिल्मी अंदाज

‘स्टार शाहरुख खान घर में किसी आम व्यक्ति की तरह है। अगर घर में गौरी के सामने दोनों हाथ खोल कर उसे बुलाने लग गया तो शायद वो थप्पड़ लगा देगी। घर पर किसी आम परिवार की तरह लड़ाई भी हो जाती है, जब मैं पलंग पर बैठकर खाना खाता हूं। वहीं अपने घर में भी मैं किसी फिल्मी स्टाइल यूनिफॉर्म में रहने वाला खानसामा चाहता हूं, लेकिन कई कई वर्षों से हमारे लिए काम कर रहा स्टाफ वैसा नहीं हो सकता। उनकी भी घर में चलती है, घर के कामकाज की प्रमुख बीना है जो अक्सर मुझ पर गलत जगह जूते उतारने के लिए नाराज हो जाती है। दूसरी तरफ हिंदू पत्नी होने की बावजूद आपसी समन्वय भी है। हमारे घर में ईद की तैयारियां पत्नी करती है तो दीपावली पर पूजा के लिए पंडित बुलाने से लेकर पूजा की तैयारियां मेरे जिम्मे। ड्राइंग रूम में राधा-कृष्ण की प्रतिमा भी मेरी ही पसंद से लगाई गई, तो मलेशिया से कुरान पत्नी लेकर आई। बेटी सुहाना नमाज पढ़ती है और गायत्री मंत्र भी। हमने अपने बच्चों को कभी कोई धर्म मानने पर विवश नहीं किया।’

अपराजिता पोस्टर लॉन्च कर, मुहिम को सराहा

शाहरुख खान ने इस बातचीत के दौरान अमर उजाला की अपराजिता मुहिम के बारे में जाना और इसे सराहा। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की मुहिम महिलाओं की छवि को मजबूती से पेश करने के लिए जरूरी है। खुद अपना अनुभव बताया कि वे अपने पिता ताज मोहम्मद खान के नाम पर एक मुहिम शुरू की है, जिसमें एसिड अटैक सर्वाइवर्स को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए प्रेरित किया जाता है। उन्होंने महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए उन्हें खुद में विश्वास बढ़ाने के लिए कहा। वहीं रिश्तों को लेकर उन्होंने कहा कि जीवन में प्रेम होना, ब्रेक-अप होना, अलगाव आदि यह सब सामान्य घटनाएं हैं, इनके लिए लड़कियां खुद को दोषी न मानें, न ही ये मान लें कि इनसे जीवन से खत्म हो जाता है। 
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