Manoj Muntashir: 'आनंद बक्शी आज गाने लिख रहे होते तो मैं शर्मिंदगी से लिखना छोड़ देता', संवाद में बोले मनोज
Amar Ujala Samwad 2025: अमर उजाला संवाद कार्यक्रम के दूसरे दिन 18 अप्रैल को गीतकार व लेखक मनोज मुंतशिर शुक्ला ने शिरकत की। इस दौरान उन्होंने पुराने जमाने के गानों पर बात की। साथ ही आनंद बक्शी के लिखे गानों की भी तारीफ की।
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विस्तार
साल 2025 के पहले अमर उजाला संवाद का आगाज उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गोमतीनगर स्थित इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में 17 अप्रैल को हुआ था। अमर उजाला संवाद कार्यक्रम के दूसरे दिन 18 अप्रैल को मशहूर गीतकार और लेखक मनोज मुंतशिर ने शिरकत की थी। अभिनेता ने अमर उजाला संवाद कार्यक्रम के दौरान मनोज ने पुराने जमाने के गाने और आज के गानों के बीच फर्क के बारे में बात की। साथ ही उन्होंने आनंद बक्शी के बारे में भी चर्चा की।
मनोज ने जाहिर की पुराने गानों को लिखने की ख्वाहिश
जब उनसे पूछा गया कि क्या उनकी पसंद का कोई ऐसा पुराना गाना है, जिसे सुनकर उन्हें ऐसा लगता हो कि अगर इसे वह लिखते तो मजा आ जाता? इस पर मनोज ने जवाब दिया कि ऐसे हजारों गाने हैं। ऐसे अनगिनत गाने हैं। ऐसे मामलों में, मैं बहुत लालची हूं। आनंद बक्शी के पांच हजार गाने एक तरफ कर लो, जिन्हें सुनकर ऐसा लगता है कि काश इनमें से मैं कुछ लिख पाता।
आनंद बक्शी को बताया लिरिक्स राइटिंग का भगवान
मनोज ने कहा, 'आनंद बक्शी के लिखे गए एक-एक गानों के लिए मैं अपना करियर देने के लिए तैयार हूं, क्योंकि मैं समझता हूं कि जो स्क्रीन राइटिंग होती है, उनके लिए कोई गॉड हैं तो वो आनंद बक्शी हैं, जब लिरिक्स राइटिंग की बात होती है तो आनंद बक्शी से ऊपर कोई नहीं हैं। शायरी एक जगह, बोल एक जगह, कविता एक जगह और फिल्म के लिए शायरी, बोल और कविता को एक जगह मिलाकर एक कर देना वो एक तरफ है। आप 'डर' फिल्म देखिए, करीब 350 पन्नों की स्क्रिप्ट रही होगी, जिन्हें बक्शी साहब ने एक लाइन में उतार दिया कि 'तू हां कर या ना कर, तू है मेरी किरण'। वो आपके लिए फिल्म है।'
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शब्दों में उतारे जाती थीं भावनाएं
मनोज ने पुराने गानों के बारे में बात करते हुए आगे कहा, 'जब आप फिल्म 'जब जब फूल खिले' देखते हैं कि कश्मीर का एक शिकारे वाला शहर में आता है और अपनी माशूका को कई लोगों के साथ पॉलरूम डांस करता हुआ देखता है तो जब वो रोता है और जिन शब्दों के साथ रोता है तो उसे देखकर लगता है कि हम इस दुनिया के हैं ही नहीं और हमें कुछ पता ही नहीं हैं, जिसका गाना है- तेरी बाहों में देखूं, सनम गैरों की बाहें, मैं लाऊंगा कहां से भला ऐसी निगाहें।'
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शर्मिंदगी से गाना लिखना छोड़ देते मनोज
ये सब सिनेमा के लिए लिखे गए गाने हैं। इतने अद्भुद और इतने बढ़िया। 'करवटें बदलते रहे सारी रात हम, आपकी कसम' इन गानों में इतनी सरलता है, इतनी सरलता कोई कैसे ले आता है। ऐसे में मैं आश्चर्यचकित हूं कि आनंद बक्शी साहब मेरे जमाने में लिख रहे होते तो मैंने शर्मिंदगी से लिखना ही छोड़ दिया होता।
कई मुद्दों पर मनोज ने रखी अपनी राय
अमर उजाला संवाद में इस मुलाकात के दौरान मनोज मुंतशिर ने करियर के दौरान सफलता और असफलता के साथ-साथ इस मुद्दे पर भी बात की नए राइटर को कैसे लिखना चाहिए। साथ ही मनोज ने और भी कई मुद्दों पर राय रखी। मनोज मुंतशिर ने क्या बोला, वो जानने ने के लिए नीचे दिया गया वीडियो देखें...