रिदम कला महोत्सव: घराने से ताल्लुक रखने की चुनौतियों पर की बात, ऋषि मिश्रा ने कहा- "हमें गलती करने का हक नहीं..."
रिदम कला महोत्सव का आगाज हो चुका है। अंजना वेलफेयर सोसायटी के सहयोग से आयोजित इस महोत्सव में संगीत एवं नृत्य की कार्यशालाओं का प्रबंधन किया गया है। युवाओं को भारतीय संस्कृति से जोड़ने के उद्देश्य से इस महोत्सव को बीते 8 सालों से आयोजित किया जा रहा है। 26 जनवरी से शुरू हुआ कला महोत्सव 45 दिन तक आयोजित किया जाएगा।
इस सप्ताहांत आयोजित कार्यशाला में संगीत और नृत्य के क्षेत्र से महमानों को आमंत्रित किया गया था। इस दौरान अंजना वेलफेयर सोसाइटी की फाउंडर कत्थक नृत्यांगना माया कुलश्रेष्ठ ने संगीतकार इमान दास और ऋषि मिश्रा व नृत्यांगना इमिली घोष और स्निगधा दास से उनके गुरु और सफर के बारे में जानना का प्रयत्न किया। पढ़िए...
सवाल: ऋषि मिश्रा जी, आप बनारस घराने की संगीत परंपरा से जुड़े हुए हैं। आपके घर में ही इतना महान गायक रहे हैं। ऐसे में आपने संगीत की तालीम कहां से ली? आपने पहली बार जब संगीत सीखना शुरू किया तब आप कितने साल के रहे होंगे?
जवाब: मेरा ताल्लुक घराने से रहा है। घराने में हमेशा से गुरु-शिष्य की परंपरा रही है। मेरे गुरु और मेरे दादा जी पंडित गणेश प्रसाद मिश्र जी और मेरे पिताजी पंडित विद्याधर मिश्रा जी (अलाहाबाद विश्वविद्यालय के संगी विभाग के अध्यक्ष) घर पर ही अपने शिष्यों को संगीत की तालीम दिया करते थे। उस तालीम के अंतर्गत उनके द्वारा दी जाने वाली शिक्षा मेरे कानों में पड़ती थी। इसलिए मैं कहता हूं कि मेरे जन्म से ही मेरी शिक्षा आरंभ हो गई थी।
सवाल: पंडित इमान दास जी, आपके गुरु प्रसिद्ध गीतकार और संगीतकार पंडित अजय चक्रवर्ती जी रहे हैं। आपकी संगीत की तालीम का सफर किस तरह शुरू हुआ?
जवाब: जी,17-18 साल की उम्र में मेरे गुरु पंडित अजय चक्रवर्ती जी संगीत की तालीम ली थी। मेरे सौभाग्य रहा कि मैंने अपने जीवनकाल में पंडित शांतनु भट्टाचार्य जी और पंडित सत्यान बाक्शी जी से संगीत भी सीखा। आज 20 साल हो गए हैं, गाते-गाते। लेकिन आज भी उम्र वही सीखने वाली ही है।
सवाल: इमिली घोष जी, आपने नृत्य की दुनिया में कदम रखने का फैसला क्यों किया?
जवाब: मैंने तीन साल की उम्र में नृत्य की दुनिया में कदम रखा था। कुछ साल बंगाल के चितरंजन में ही रहकर कत्थक की शिक्षा हासिल की। इसके बाद मैंने डॉ मालविका मिश्रा जी से कत्थक सीखना शुरू किया। दस साल की उम्र में मैं कोलकाता से चितरंजन अपडाउन किया करती थी। दो साल बाद यानी 1995 में मेरे पिताजी कोलकाता के पास शिफ्ट हो गए और यहां से मेरे करियर की शुरुआत हुई।
सवाल: स्निगधा दास जी, आप अपने बारे में कुछ बताईए? आपके करियर की शुरुआत कैसे हुई़?
जवाब: इमली जी की ही तरह मैं भी बंगाल के चितरंजन शहर में रहती थी और मेरे सफर की शुरुआत भी यहीं से हुई थी। मैंने दूसरी कक्षा से ही शिक्षा लेना शुरू कर दिया था। पांचवीं कक्षा में पश्चिम बंगाल के शांति निकेतन जाकर डांस का प्रशिक्षण हासिल किया। मेरी पूरी तालीम शांति निकेतन में ही हुई है। स्नातक के लिए मुझे दिल्ली स्थानांतरित होना पड़ा और मेरा स्वभाग्य रहा कि यहां मैंने भारतीय कला केंद्र में भरतनाट्यम की आगे की शिक्षा पूरी की।
सवाल: ऋषि मिश्रा जी, मेरा अगला सवाल आपसे है। घराना परिवार से ताल्लुक रखने की वजह से किन-किन चुनौतियां का सामना करना पड़ता है?
जवाब: घराना परिवार से ताल्लुक रखने की वजह से बचपन से ही तालिम मिलना शुरू हो जाती है। हमें बाहर गुरु की तलाश नहीं करनी पड़ती। घर में हमें गुरु और संगीतमय महौल मिल जाता है। हम जब चाहें तब रियाज कर सकते हैं। अब अगर हम चुनौतियों की बात करें, तो वो भी कई सारी हैं। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती घराना परिवार का नाम रखना है। अगर हम कहीं परफॉर्म करते हैं और अच्छा गाते हैं, तो लोग तारीफ करने की बजाए कहते हैं कि अच्छा तो गाएंगे ही, घराने से जो हैं। अगर हम कहीं सुरों की गड़बड़ कर दें, तो लोग कहने लगते हैं कि घराने से ताल्लुक रखने के बावजूद इतनी गलतियां कर रहे हैं। इसलिए हमें हर जगह अपना बेस्ट देना पड़ता है। हमें गलती करने का हक नहीं है।
सवाल: इमिली जी, कथक के लिए कहा जाता है कि "कथा कहे सो कथक कहलावे"। मैंने जानना चाहती हूं कि आपके लिए कथक के क्या मायने हैं?
जवाब: कथक हमेशा से मेरे लिए चुनौतीपूर्ण रहा है। मेरे घर में कोई भी कथक डांसर नहीं रहा है। किसी को नहीं पता था कि कथक क्या है? इसका भविष्य क्या है? और कथक सीखने के बाद मेरा भविष्य क्या होगा? इसलिए मेरा सफर काफी मुश्किलों भरा रहा है। लेकिन कथक अब मेरी जिंदगी है। चाहे मैं बात करूं या लड़ाई करूं, मेरी हर हरकत में कथक झलकता है। कथक के बिना मैं अपनी जिंदगी सोच भी नहीं सकती। अमर उजाला इसमे मीडिया पार्टनर है।
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