हर सिक्के के दो पहलू होते हैं जिसे समझना बहुत जरूरी है : राजकुमार राव
बॉलीवुड एक्टर राजकुमार राव को साल 2013 में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय अवार्ड मिला था और अब उनकी 'न्यूटन' को सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है। 'न्यूटन' ऑस्कर में भारत की तरफ से एंट्री भी की थी। जल्द ही राजकुमार की फिल्म 'ओमर्टा' रिलीज होगी। इन्हीं सब पर राजकुमार राव से अमर उजाला की विशेष बातचीत...
न्यूटन को नेशनल अवॉर्ड मिलने पर कौन सी बातें याद आ रही हैं। कैसे खुद को आपने इसके लिए तैयार किया था?
खास बात यह है कि मैंने इसके लिए पूरी चुनाव प्रक्रिया को समझा था। आमतौर पर हम सिर्फ वोट डालने जाते हैं, अंदर क्या होता है हमें मालूम नहीं? फिर मैंने अपने लुक पर काम किया। कुछ अलग करना था, तो मैंने बाल घुंघराले करा लिए। शूटिंग के दौरान बालों में वक्त लगता था, क्योंकि कहानी एक दिन की है और लुक समान होना चाहिए। स्क्रिप्ट बहुत शोध के बाद लिखी गई।
इससे पहले अमित की फिल्म 'सुलेमानी कीड़ा' कई जगहों पर सराही गई थी। क्या वह फिल्म आपने देखी थी?
वह तो नहीं देखी थी, परंतु मैं उन्हें मेरी पहली फिल्म 'लव सेक्स और धोखा' से जानता हूं। उन्होंने उसकी मेकिंग की थी। वह अपने काम के प्रति गंभीर और सुलझे हुए इंसान हैं। फिर 'न्यूटन' की कहानी मुझे इतनी पसंद आई कि हां कहने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।
'न्यूटन' लोकतंत्र में वोटिंग के महत्व को स्थापित करती है। क्या ऐसी फिल्में वाकई समाज को बदल सकती हैं?
सच्चाई तो यही है कि जब तक आप नहीं चाहेंगे, कुछ नहीं बदलेगा। सिस्टम को बदलने के लिए सिस्टम का हिस्सा बनना होगा। वोट लोकतंत्र में सबसे ताकतवर चीज है। अब भी बहुत से लोग यह नहीं समझ पाए इसलिए आज भी बड़ी संख्या में लोग वोट नहीं डालते। मुझे लगता है, 'न्यूटन' देखने वाले वोटिंग के महत्व को महसूस कर सकते हैं।
'शाहिद' और 'न्यूटन' के बाद अब 'ओमर्टा' जैसी एक और रियलिस्टिक फिल्म कर रहे हैं। यह एक व्यक्ति के आतंकी (उमर शेख) बनने की कहानी है। क्या यह उसकी जिंदगी को महिमामंडित नहीं करती?
ऐसा नहीं है बल्कि यह एक ईमानदार और कड़वी हकीकत दिखाने वाली फिल्म है। दुनिया में आज जो हो रहा है या होता आया है, हम पढ़ते और भूल जाते हैं। मगर हमने इसे सिनेमा में कैद करके बताने की कोशिश की है। 'शाहिद' एक सच्चाई थी, 'न्यूटन' एक सच्चाई है और 'ओमर्टा' भी एक हकीकत है। सिनेमा हमारे समाज का आईना है।
शाहिद आतंकी कैंपों में रह कर सामान्य दुनिया में लौटा था जबकि 'ओमर्टा' का उमर शेख उसी तरफ रहते हुए नापाक हकरतें करता है। क्यों लगा कि फिर आतंक की दुनिया से जुड़ा किरदार करें?
हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। सीरिया एक सच्चाई है और हमारे यहां एक इमाम ने दंगाइयों से कहा कि आप मेरे बेटे की मौत का बदला मत लीजिए, यह भी सच्चाई है। दोनों तरह के लोग और दोनों तरह की बातें हैं।
'न्यूटन' समाज में दबा दिए गए एक वर्ग की बात करती है। 'शाहिद' भी एक आवाज बन कर उठती है। आप सिर्फ सिनेमा तक ही इनसे जुड़ते हैं या ऐसे मुद्दों/बातों से निजी स्तर पर भी प्रभावित होते हैं?
मैं 'न्यूटन' करता हूं, तो उन लोगों से कनेक्ट भी होता हूं, जिन्हें हक नहीं मिल रहा। 'शाहिद' से भी मैं कनेक्ट करता हूं। 'ओमर्टा' चुनौती थी, क्योंकि मैं गलत राह पर चल रहे उस व्यक्ति की फिलॉसफी से नहीं जुड़ा। फिर भी उसे पर्दे पर जीवंत करना है। अभिनय करते हुए मैं भीतर नफरत और गुस्सा लेकर चल रहा था, मगर जानता था कि मैं कौन हूं।