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Ashutosh Rana: रावण के बाद अब कृष्ण, चाणक्य और कर्ण बनना चाहते हैं आशुतोष, बोले- ये रोल समाज को दिशा देने वाले
सार
Ashutosh Rana Interview: एक्टर आशुतोष राणा इन दिनों अपने नाटक ‘हमारे राम’ और आगामी फिल्म ‘हीर एक्सप्रेस’ को लेकर सुर्खियों में हैं। अमर उजाला डिजिटल से बात करते हुए उन्होंने अपने अनुभव साझा किए हैं।
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आशुतोष राणा
- फोटो : एक्स
विस्तार
फिल्मों और थिएटर में अपनी गहरी छाप छोड़ चुके अभिनेता आशुतोष राणा इन दिनों नाटक ‘हमारे राम’ और फिल्म ‘हीर एक्सप्रेस’ को लेकर चर्चा में हैं। अपने शानदार अभिनय के लिए पहचाने जाने वाले राणा ने अमर उजाला से बातचीत में अपने हालिया अनुभवों, ड्रीम रोल्स और नए कलाकारों के साथ काम करने के नजरिए पर खुलकर बात की। पढ़िए बातचीत के कुछ प्रमुख अंश:
आपका नाटक ‘हमारे राम’ देशभर में काफी सराहा जा रहा है। इसकी सफलता को आप कैसे देखते हैं?
भगवान की कृपा से सिर्फ 14 महीनों में हमने पूरे देश में 260 शोज कर लिए हैं और 16 राज्यों तक पहुंच चुके हैं। थिएटर के इतिहास में इतनी जल्दी इतने शोज मिलना बहुत बड़ी उपलब्धि है।
रामायण इतनी विशाल है कि उस पर दस फिल्में भी बनें तो कम हैं, दस धारावाहिक भी आएं तो भी कम हैं। हम पहली बार दुबई गए और वहां भी शो हाउसफुल रहे। ऑडियंस का जो प्यार मिला है, उससे लगता है जैसे किसी बड़ी फिल्म को जब अपार सफलता मिलती है, वैसा ही अपनापन हमारे नाटक को भी मिला है।
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ये खबर भी पढ़ें: Priyanka Chopra: शाहिद कपूर के साथ प्रियंका की फिल्म ने पूरे किए 16 साल, एक्ट्रेस ने शेयर की पुरानी तस्वीरें
आपकी नई फिल्म ‘हीर एक्सप्रेस’ भी रिलीज के लिए तैयार है। इसका अनुभव और निर्देशक उमेश शुक्ला के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?
मेरे लिए हर फिल्म एक नया मौका होती है, खुद को तोड़कर फिर से नया बनाने का। उमेश शुक्ला ऐसे निर्देशक हैं जो कलाकार को स्वतंत्रता भी देते हैं और जरूरत पड़ने पर गाइड भी करते हैं।
गुलशन ग्रोवर जैसे बेहतरीन अभिनेता के साथ काम करना शानदार अनुभव था। और नए कलाकार प्रीत और दिविता के साथ काम करके भी बहुत मजा आया।
उमेश शुक्ला थिएटर, लेखन और निर्देशन - तीनों को गहराई से समझते हैं। उनकी फिल्में 'ओह माय गॉड' और '102 नॉट आउट' इसका उदाहरण हैं। जब आप ऐसे निर्देशक के साथ काम करते हैं जो हर पहलू को जानते हों, तो अभिनेता बिना चिंता के खुद को पूरी तरह उनके हवाले कर सकता है।
आपने कई यादगार भूमिकाएं निभाई हैं। कौन-से ड्रीम रोल्स हैं जिन्हें अभी निभाने की चाहत है?
रावण का किरदार तो मैंने कर लिया। अब मेरा मन है कि मैं कृष्ण का रोल निभाऊं। कृष्ण सिर्फ भगवान ही नहीं, बल्कि गहरे विचारों वाले और जीवन को दिशा देने वाले इंसान भी हैं। उनके ऊपर कई किताबें लिखी गई हैं और उन पर काम करना मेरे लिए बहुत दिलचस्प होगा।
इसी तरह मैं चाणक्य का किरदार करना चाहता हूं। उनका उनका ज्ञान और उनकी नीतियाँ आज भी उतनी ही काम की हैं। कर्ण का रोल भी मेरे दिल के बहुत करीब है ... वो महाभारत का सबसे दुखद लेकिन महान योद्धा है। और अगर मौका मिला तो परशुराम भी करना चाहूंगा, जिनमें शक्ति और तपस्या दोनों का अद्भुत संगम है।
ये सब किरदार भारतीय संस्कृति और इतिहास के ऐसे प्रतीक हैं जो समाज को दिशा देते हैं। इन भूमिकाओं को निभाना मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी। मैं तो यही प्रार्थना करता हूं कि ये ख्वाहिशें मेरी जरूरत बनकर पूरी हों। और इस सफर की शुरुआत रावण से हो चुकी है।
इस फिल्म में आपने नए कलाकारों के साथ भी काम किया। आज की पीढ़ी के अभिनेताओं को आप किस नजर से देखते हैं?
हमसे पहले की पीढ़ी के पास बहुत सीमित विकल्प थे। हमारे दौर में थिएटर, सिनेमा और टीवी तीनों मौजूद थे। लेकिन आज की पीढ़ी के पास इससे भी ज्यादा विकल्प हैं - रंगमंच, फिल्म, टीवी, ओटीटी और सोशल मीडिया।
इंस्टाग्राम, यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म कलाकारों को अपनी कला दिखाने का मौका देते हैं। जब विकल्प बढ़ते हैं तो असुरक्षा कम होती है और आत्मविश्वास बढ़ता है। यही वजह है कि आज के युवा कलाकार इतने कॉन्फिडेंट नजर आते हैं।
आजकल कई बार कास्टिंग में सोशल मीडिया फॉलोअर्स को देखा जाता है। इससे असली टैलेंट कहीं पीछे तो नहीं छूट जाता?
देखिए, असली कलाकार को हमेशा सही अवसर की जरूरत होती है। कई बार बहुत टैलेंटेड लोगों को मौका नहीं मिल पाता और कभी कम टैलेंट वाले को बड़ा मौका मिल जाता है। लेकिन टिकता वही है जिसके पास हुनर और मेहनत दोनों हों।
सोशल मीडिया सिर्फ आपकी मौजूदगी की घोषणा करता है। आगे वही कलाकार लंबे समय तक चलेगा जिसकी प्रतिभा और कौशल एक साथ काम करें। असली बात यही है कि जब भी मौका मिले, आप उसे कितनी निष्ठा और ईमानदारी से निभाते हैं।
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आपका नाटक ‘हमारे राम’ देशभर में काफी सराहा जा रहा है। इसकी सफलता को आप कैसे देखते हैं?
भगवान की कृपा से सिर्फ 14 महीनों में हमने पूरे देश में 260 शोज कर लिए हैं और 16 राज्यों तक पहुंच चुके हैं। थिएटर के इतिहास में इतनी जल्दी इतने शोज मिलना बहुत बड़ी उपलब्धि है।
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रामायण इतनी विशाल है कि उस पर दस फिल्में भी बनें तो कम हैं, दस धारावाहिक भी आएं तो भी कम हैं। हम पहली बार दुबई गए और वहां भी शो हाउसफुल रहे। ऑडियंस का जो प्यार मिला है, उससे लगता है जैसे किसी बड़ी फिल्म को जब अपार सफलता मिलती है, वैसा ही अपनापन हमारे नाटक को भी मिला है।
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आपकी नई फिल्म ‘हीर एक्सप्रेस’ भी रिलीज के लिए तैयार है। इसका अनुभव और निर्देशक उमेश शुक्ला के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?
मेरे लिए हर फिल्म एक नया मौका होती है, खुद को तोड़कर फिर से नया बनाने का। उमेश शुक्ला ऐसे निर्देशक हैं जो कलाकार को स्वतंत्रता भी देते हैं और जरूरत पड़ने पर गाइड भी करते हैं।
गुलशन ग्रोवर जैसे बेहतरीन अभिनेता के साथ काम करना शानदार अनुभव था। और नए कलाकार प्रीत और दिविता के साथ काम करके भी बहुत मजा आया।
उमेश शुक्ला थिएटर, लेखन और निर्देशन - तीनों को गहराई से समझते हैं। उनकी फिल्में 'ओह माय गॉड' और '102 नॉट आउट' इसका उदाहरण हैं। जब आप ऐसे निर्देशक के साथ काम करते हैं जो हर पहलू को जानते हों, तो अभिनेता बिना चिंता के खुद को पूरी तरह उनके हवाले कर सकता है।
आपने कई यादगार भूमिकाएं निभाई हैं। कौन-से ड्रीम रोल्स हैं जिन्हें अभी निभाने की चाहत है?
रावण का किरदार तो मैंने कर लिया। अब मेरा मन है कि मैं कृष्ण का रोल निभाऊं। कृष्ण सिर्फ भगवान ही नहीं, बल्कि गहरे विचारों वाले और जीवन को दिशा देने वाले इंसान भी हैं। उनके ऊपर कई किताबें लिखी गई हैं और उन पर काम करना मेरे लिए बहुत दिलचस्प होगा।
इसी तरह मैं चाणक्य का किरदार करना चाहता हूं। उनका उनका ज्ञान और उनकी नीतियाँ आज भी उतनी ही काम की हैं। कर्ण का रोल भी मेरे दिल के बहुत करीब है ... वो महाभारत का सबसे दुखद लेकिन महान योद्धा है। और अगर मौका मिला तो परशुराम भी करना चाहूंगा, जिनमें शक्ति और तपस्या दोनों का अद्भुत संगम है।
ये सब किरदार भारतीय संस्कृति और इतिहास के ऐसे प्रतीक हैं जो समाज को दिशा देते हैं। इन भूमिकाओं को निभाना मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी। मैं तो यही प्रार्थना करता हूं कि ये ख्वाहिशें मेरी जरूरत बनकर पूरी हों। और इस सफर की शुरुआत रावण से हो चुकी है।
इस फिल्म में आपने नए कलाकारों के साथ भी काम किया। आज की पीढ़ी के अभिनेताओं को आप किस नजर से देखते हैं?
हमसे पहले की पीढ़ी के पास बहुत सीमित विकल्प थे। हमारे दौर में थिएटर, सिनेमा और टीवी तीनों मौजूद थे। लेकिन आज की पीढ़ी के पास इससे भी ज्यादा विकल्प हैं - रंगमंच, फिल्म, टीवी, ओटीटी और सोशल मीडिया।
इंस्टाग्राम, यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म कलाकारों को अपनी कला दिखाने का मौका देते हैं। जब विकल्प बढ़ते हैं तो असुरक्षा कम होती है और आत्मविश्वास बढ़ता है। यही वजह है कि आज के युवा कलाकार इतने कॉन्फिडेंट नजर आते हैं।
आजकल कई बार कास्टिंग में सोशल मीडिया फॉलोअर्स को देखा जाता है। इससे असली टैलेंट कहीं पीछे तो नहीं छूट जाता?
देखिए, असली कलाकार को हमेशा सही अवसर की जरूरत होती है। कई बार बहुत टैलेंटेड लोगों को मौका नहीं मिल पाता और कभी कम टैलेंट वाले को बड़ा मौका मिल जाता है। लेकिन टिकता वही है जिसके पास हुनर और मेहनत दोनों हों।
सोशल मीडिया सिर्फ आपकी मौजूदगी की घोषणा करता है। आगे वही कलाकार लंबे समय तक चलेगा जिसकी प्रतिभा और कौशल एक साथ काम करें। असली बात यही है कि जब भी मौका मिले, आप उसे कितनी निष्ठा और ईमानदारी से निभाते हैं।
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