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Delhi News: दृष्टिबाधित अभ्यर्थी को आईएएस सीट नहीं मिली, अनियमितता पर हाईकोर्ट में चुनौती
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दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका पर केंद्र सरकार से मांगा जवाब
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। एक दृष्टिबाधित अभ्यर्थी ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया है कि 2013 में सिविल सेवा परीक्षा के उम्मीदवारों की दिव्यांगता का आकलन करने में अनियमितता के कारण उन्हें भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) की सीट नहीं मिल पाई। याचिकाकर्ता गनात्रा कोमल प्रवीण भाई का दावा है कि दो अन्य उम्मीदवारों को अनियमित रूप से दिव्यांगता प्रमाणपत्र दे दिया गया, जिससे दृष्टिबाधित अभ्यर्थियों के लिए आरक्षित सिविल सेवा की सीट उन दोनों को मिल गई और उनकी आरक्षित सीट छिन गई।
न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति शैल जैन की खंडपीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह यह स्पष्ट करे कि अपीलीय मेडिकल बोर्ड की राय आने के बाद रिव्यू मेडिकल बोर्ड गठित करने की प्रथा अपनाई जाती है या नहीं। अदालत ने केंद्र के वकील को सचिव स्तर से नीचे के अधिकारी का शपथ पत्र दाखिल करने को कहा।
प्रवीण भाई ने 2012 की सिविल सेवा परीक्षा में अखिल भारतीय रैंक 592 हासिल की थी। उन्हें आर्म्ड फोर्सेज हेडक्वार्टर्स (एएफएचक्यू) सिविल सर्विस आवंटित की गई, जबकि उनका कहना है कि उन्हें दृष्टिहीनता या कम दृष्टि वाले अभ्यर्थियों के लिए आरक्षित आईएएस सीट मिलनी चाहिए थी। विवाद दो उच्च रैंक वाले उम्मीदवारों शैलाजा शर्मा (रैंक 39, जिन्हें आईएएस मिला) और लिपिन राज एमपी (रैंक 224, जिन्हें भारतीय रेलवे पर्सनल सर्विस मिला) को लेकर है। याचिकाकर्ता के अनुसार, मेडिकल बोर्ड और अपीलीय मेडिकल बोर्ड ने दोनों को दिव्यांगता कोटे के लिए अयोग्य पाया था। इसके बाद गठित एक अतिरिक्त सुपर अपीलीय बोर्ड ने उन्हें दिव्यांगता आरक्षण का लाभ दे दिया।
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याचिकाकर्ता ने इस सुपर अपीलीय बोर्ड के गठन की वैधता पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि सिविल सेवा परीक्षा 2012 के नियमों में केवल मेडिकल बोर्ड और अपीलीय मेडिकल बोर्ड का प्रावधान था, किसी और रिव्यू बोर्ड का नहीं।
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। एक दृष्टिबाधित अभ्यर्थी ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया है कि 2013 में सिविल सेवा परीक्षा के उम्मीदवारों की दिव्यांगता का आकलन करने में अनियमितता के कारण उन्हें भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) की सीट नहीं मिल पाई। याचिकाकर्ता गनात्रा कोमल प्रवीण भाई का दावा है कि दो अन्य उम्मीदवारों को अनियमित रूप से दिव्यांगता प्रमाणपत्र दे दिया गया, जिससे दृष्टिबाधित अभ्यर्थियों के लिए आरक्षित सिविल सेवा की सीट उन दोनों को मिल गई और उनकी आरक्षित सीट छिन गई।
न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति शैल जैन की खंडपीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह यह स्पष्ट करे कि अपीलीय मेडिकल बोर्ड की राय आने के बाद रिव्यू मेडिकल बोर्ड गठित करने की प्रथा अपनाई जाती है या नहीं। अदालत ने केंद्र के वकील को सचिव स्तर से नीचे के अधिकारी का शपथ पत्र दाखिल करने को कहा।
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प्रवीण भाई ने 2012 की सिविल सेवा परीक्षा में अखिल भारतीय रैंक 592 हासिल की थी। उन्हें आर्म्ड फोर्सेज हेडक्वार्टर्स (एएफएचक्यू) सिविल सर्विस आवंटित की गई, जबकि उनका कहना है कि उन्हें दृष्टिहीनता या कम दृष्टि वाले अभ्यर्थियों के लिए आरक्षित आईएएस सीट मिलनी चाहिए थी। विवाद दो उच्च रैंक वाले उम्मीदवारों शैलाजा शर्मा (रैंक 39, जिन्हें आईएएस मिला) और लिपिन राज एमपी (रैंक 224, जिन्हें भारतीय रेलवे पर्सनल सर्विस मिला) को लेकर है। याचिकाकर्ता के अनुसार, मेडिकल बोर्ड और अपीलीय मेडिकल बोर्ड ने दोनों को दिव्यांगता कोटे के लिए अयोग्य पाया था। इसके बाद गठित एक अतिरिक्त सुपर अपीलीय बोर्ड ने उन्हें दिव्यांगता आरक्षण का लाभ दे दिया।
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याचिकाकर्ता ने इस सुपर अपीलीय बोर्ड के गठन की वैधता पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि सिविल सेवा परीक्षा 2012 के नियमों में केवल मेडिकल बोर्ड और अपीलीय मेडिकल बोर्ड का प्रावधान था, किसी और रिव्यू बोर्ड का नहीं।