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सत्या नडेला के बेटे का निधन: जिस बीमारी से जैन नडेला की हुई मौत, दिल्ली में रोजाना मिल रहे 15-20 केस
Tue, 01 Mar 2022 11:25 PM IST
शाहरुख खान
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: शाहरुख खान
Updated Tue, 01 Mar 2022 11:25 PM IST
सार
सेरेब्रल पाल्सी नामक बीमारी के मरीज दिल्ली में भी लगातार सामने आ रहे हैं। अकेले दिल्ली सरकार के जीबी पंत सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल में रोजाना 15 से 20 मरीज पंजीकृत हो रहे हैं।
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फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
जिस बीमारी से जैन नडेला की मौत हुई है। दिल्ली के अस्पतालों में रोजाना ऐसे मामले सामने भी आ रहे हैं। माइक्रोसॉफ्ट कॉर्प के सीईओ सत्या नडेला के बेटे जैन नडेला की सेरेब्रल पाल्सी नामक बीमारी से मौत हुई।
इस बीमारी के मरीज दिल्ली में भी लगातार सामने आ रहे हैं। अकेले दिल्ली सरकार के जीबी पंत सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल में रोजाना 15 से 20 मरीज पंजीकृत हो रहे हैं। अस्पताल के वरिष्ठ डॉ. देवाशीष चौधरी ने बताया कि जन्म के समय शिशु के मस्तिष्क का विकास पूरी तरह से नहीं होने की वजह से यह बीमारी बनती है।
ऐसे शिशु सामान्य की तुलना में काफी मंद गति से आगे बढ़ते हैं। मस्तिष्क से निकलने वाले संकेत इनके शरीर के दूसरे हिस्सों तक थोड़ा देरी से भी पहुंचते हैं। हालांकि आनुवांशिक रोग के चलते यह बीमारी होने पर मरीज का जीवन अधिकतम 20 वर्ष तक ही बचता है।
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उन्होंने बताया कि अस्पताल में रोजाना 250 से 300 मरीजों की ओपीडी होती है जिनमें 15 से 20 मरीज सेरेब्रल पाल्सी बीमारी ग्रस्त ही पाए जाते हैं। यह बीमारी दुर्लभ जरूर है लेकिन मरीज आमतौर पर मिल ही जाते हैं। डॉ. चौधरी का कहना है कि इस स्थिति से बचाव के लिए गर्भावस्था के दौरान ही जागरुकता जरूरी है। उस दौरान बेहतर चिकित्सा, आनुवांशिक जांच और जागरुकता के जरिए इन बच्चों का जीवन बेहतर किया जा सकता है।
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इस बीमारी के मरीज दिल्ली में भी लगातार सामने आ रहे हैं। अकेले दिल्ली सरकार के जीबी पंत सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल में रोजाना 15 से 20 मरीज पंजीकृत हो रहे हैं। अस्पताल के वरिष्ठ डॉ. देवाशीष चौधरी ने बताया कि जन्म के समय शिशु के मस्तिष्क का विकास पूरी तरह से नहीं होने की वजह से यह बीमारी बनती है।
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ऐसे शिशु सामान्य की तुलना में काफी मंद गति से आगे बढ़ते हैं। मस्तिष्क से निकलने वाले संकेत इनके शरीर के दूसरे हिस्सों तक थोड़ा देरी से भी पहुंचते हैं। हालांकि आनुवांशिक रोग के चलते यह बीमारी होने पर मरीज का जीवन अधिकतम 20 वर्ष तक ही बचता है।
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उन्होंने बताया कि अस्पताल में रोजाना 250 से 300 मरीजों की ओपीडी होती है जिनमें 15 से 20 मरीज सेरेब्रल पाल्सी बीमारी ग्रस्त ही पाए जाते हैं। यह बीमारी दुर्लभ जरूर है लेकिन मरीज आमतौर पर मिल ही जाते हैं। डॉ. चौधरी का कहना है कि इस स्थिति से बचाव के लिए गर्भावस्था के दौरान ही जागरुकता जरूरी है। उस दौरान बेहतर चिकित्सा, आनुवांशिक जांच और जागरुकता के जरिए इन बच्चों का जीवन बेहतर किया जा सकता है।