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हिंदी में गोल्डमेडलिस्ट था शशि
New Delhi
Updated Sat, 17 Nov 2012 12:00 PM IST
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नई दिल्ली। हिंदी स्नातक में गोल्ड मेडल प्राप्त शशि शेखर की शैक्षणिक पृष्ठभूमि देखकर लगता नहीं है कि वह आत्महत्या जैसा कदम उठा सकता था। हिंदी भाषा में शशि ने तीनों साल सबसे अधिक अंक प्राप्त किए। हिंदी में स्नातक की डिग्री में 82 फीसदी अंक लेकर उसने टॉप किया था, जिसके कारण उसे गोल्ड मेडल से नवाजा गया था।
हिंदू कॉलेज के हॉस्टल के कमरा नं. 111 में शशि शेखर अकेले रहता था। 2011 हिंदी में टॉप करने के कारण शशि को एमए हिंदी के लिए स्कॉलरशिप मिली थी। कॉलेज के छात्रों के मुताबिक उसने जेएनयू में एमए की प्रवेश परीक्षा पास की थी लेकिन डीयू के हिंदू कॉलेज से ही हिंदी में स्नातकोत्तर की पढ़ाई करने का निर्णय लिया। पढ़ाई में तेज होने के साथ-साथ उसका लेखन भी काफी अच्छा था। हिंदी कविता लेखन में उसकी गहरी रुचि थी। पुलिस को कमरे से एक नोटबुक मिली है जिसमें बहुत सारी हिंदी की कविताएं लिखी हुई हैं।
क्या कहते हैं मनोचिकित्सक
ऐसे होनहार छात्र के आत्महत्या करने पर एम्स के पूर्व मनोचिकित्सक डॉ रामतीर्थ अग्रवाल कहते हैं कि अक्सर प्रतियोगिता के चक्कर में छात्र जूझते रहते हैं। जूझते-जूझते जब थक जाते हैं तो मौत को जिंदगी से बड़ा समझने लगते हैं। युवा पीढ़ी का महत्वाकांक्षी होना लाजिमी है लेकिन यह एक स्तर पर खतरनाक हो सकती है। ऐसी सूरत में वह आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं। ऐसा भी संभव है कि वह किसी मानसिक बीमारी से पीड़ित रहा हो। जिसके कारण वह ऊटपटांग निर्णय लेने से भी नहीं चूकते हैं।
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हिंदू कॉलेज के हॉस्टल के कमरा नं. 111 में शशि शेखर अकेले रहता था। 2011 हिंदी में टॉप करने के कारण शशि को एमए हिंदी के लिए स्कॉलरशिप मिली थी। कॉलेज के छात्रों के मुताबिक उसने जेएनयू में एमए की प्रवेश परीक्षा पास की थी लेकिन डीयू के हिंदू कॉलेज से ही हिंदी में स्नातकोत्तर की पढ़ाई करने का निर्णय लिया। पढ़ाई में तेज होने के साथ-साथ उसका लेखन भी काफी अच्छा था। हिंदी कविता लेखन में उसकी गहरी रुचि थी। पुलिस को कमरे से एक नोटबुक मिली है जिसमें बहुत सारी हिंदी की कविताएं लिखी हुई हैं।
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क्या कहते हैं मनोचिकित्सक
ऐसे होनहार छात्र के आत्महत्या करने पर एम्स के पूर्व मनोचिकित्सक डॉ रामतीर्थ अग्रवाल कहते हैं कि अक्सर प्रतियोगिता के चक्कर में छात्र जूझते रहते हैं। जूझते-जूझते जब थक जाते हैं तो मौत को जिंदगी से बड़ा समझने लगते हैं। युवा पीढ़ी का महत्वाकांक्षी होना लाजिमी है लेकिन यह एक स्तर पर खतरनाक हो सकती है। ऐसी सूरत में वह आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं। ऐसा भी संभव है कि वह किसी मानसिक बीमारी से पीड़ित रहा हो। जिसके कारण वह ऊटपटांग निर्णय लेने से भी नहीं चूकते हैं।
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