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दिल्ली: 12 वर्षों में गरीबी के मोर्चे पर बड़ा बदलाव, विश्व बैंक के आंकड़ों ने दिखाई भारत की नई तस्वीर

Wed, 04 Nov 2026 06:03 PM IST
Digvijay Singh अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली Published by: Digvijay Singh Updated Wed, 04 Nov 2026 06:03 PM IST
सार

भारत में बीते एक दशक के दौरान आर्थिक और सामाजिक स्तर पर हुए बदलावों की तस्वीर अब अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों में भी दिखाई देने लगी है। विश्व बैंक की अक्टूबर 2026 की गरीबी एवं समानता रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2011 से 2023 के बीच देश में गरीबी के स्तर में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।

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Major shift on poverty front over 12 years World Bank data reveals a new picture of India in Delhi
गरीबी के मोर्चे पर बड़ा बदलाव - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत में बीते एक दशक के दौरान आर्थिक और सामाजिक स्तर पर हुए बदलावों की तस्वीर अब अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों में भी दिखाई देने लगी है। विश्व बैंक की अक्टूबर 2026 की गरीबी एवं समानता रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2011 से 2023 के बीच देश में गरीबी के स्तर में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि इस अवधि में करोड़ों लोग गरीबी के दायरे से बाहर आए हैं। इस बदलाव के पीछे रोजगार के बढ़ते अवसर, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार और जरूरतमंद परिवारों तक सरकारी सहायता पहुंचाने वाली योजनाओं की अहम भूमिका बताई गई है।

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विश्व बैंक की अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा के पैमानों पर नज़र डालें तो पिछले 12 वर्षों में एक बड़ा सामाजिक बदलाव देखने को मिला है। अत्यधिक गरीबी (3.00 डॉलर प्रति दिन, क्रय शक्ति समानता) की श्रेणी में वर्ष 2011-12 में देश की 27.1 प्रतिशत आबादी आती थी, जो 2023-24 के ताज़ा घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण के आधार पर घटकर महज 2.6 प्रतिशत पर आ गई है। वहीं, निम्न-मध्यम आय वर्ग रेखा (4.20 डॉलर प्रति दिन) के पैमाने पर 2011 में 57.7 प्रतिशत भारतीय गरीबी रेखा के नीचे थे, जो 2023 में घटकर 16.1 प्रतिशत रह गए। सरल शब्दों में कहें तो इस अवधि के दौरान लगभग 49.6 करोड़ (496 मिलियन) लोगों ने दैनिक न्यूनतम आय के इस मुकाम को पार किया है।
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विश्व बैंक किसी सरकारी बयानबाज़ी के आधार पर नतीजे तय नहीं करता। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि गरीबी में यह ऐतिहासिक गिरावट किसी एक जादुई छड़ी का नतीजा नहीं है, बल्कि इसके पीछे तीन मुख्य आर्थिक और सामाजिक बदलाव काम कर रहे हैं। वर्ष 2017 से 2023 के बीच देश में रोजगार के करीब 13.4 करोड़ नए अवसर पैदा हुए, जिसमें ग्रामीण भारत की महिलाओं का विशेष योगदान रहा। इसके साथ ही, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी), प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत मुफ़्त अनाज, प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण और पीएम-किसान जैसी योजनाओं ने सीधे जरूरतमंद परिवारों तक सहायता पहुँचाकर उनके खर्च का बोझ कम किया है।
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हालांकि, गरीबी के आंकड़ों और उन्हें मापने के तरीकों को लेकर राजनीतिक बहस भी लगातार जारी रही है। विपक्षी दलों ने अलग-अलग मौकों पर सरकार और नीति आयोग की ओर से पेश किए गए गरीबी में कमी के आंकड़ों पर सवाल उठाए हैं। उनका तर्क रहा है कि गरीबी का आकलन केवल आय या अंतरराष्ट्रीय गरीबी सीमा के आधार पर नहीं किया जा सकता, बल्कि जीवन स्तर, रोजगार की गुणवत्ता और बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच को भी ध्यान में रखना जरूरी है।


इस बहस के बीच विश्व बैंक की रिपोर्ट ने गरीबी में आई गिरावट के पैमाने को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामने रखा है। हालांकि, गरीबी में कमी के बावजूद रोजगार की गुणवत्ता, युवाओं के लिए पर्याप्त अवसर और अलग-अलग राज्यों के बीच आर्थिक असमानता जैसी चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं। किसी भी देश के लिए गरीबी कम करना केवल आंकड़ों में सुधार तक सीमित नहीं होता। इसका वास्तविक असर तब दिखाई देता है, जब परिवारों की आमदनी बढ़े, बच्चों को बेहतर शिक्षा मिले, लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हों और रोजगार के स्थायी अवसर पैदा हों। भारत के हालिया आंकड़े इस दिशा में हुई प्रगति को रेखांकित करते हैं। अब आगे की चुनौती इस प्रगति को बनाए रखने और इसका लाभ समाज के उन वर्गों तक पहुंचाने की है, जो आज भी आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं।

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