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इस तरह होगी निर्भया के दोषियों की फांसी
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नई दिल्ली। निर्भया के दोषियों की फांसी को लेकर सबकी निगाहें तिहाड़ जेल पर टिक गई हैं। तिहाड़ में पहली बार किसी मामले के चार दोषियों को एक साथ फांसी दी जाएगी। तिहाड़ जेल नंबर तीन में बने फांसी घर में शुक्रवार तड़के तीन बजे से ही हलचल शुरू हो जाएगी। दोषियों को जगाने से लेकर उन्हें तैयार कर फांसी घर तक ले जाने का काम जेलकर्मी करेंगे। वहीं दोषियों को फांसी पर लटकाने का काम जल्लाद करेगा।
जेल के आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक जिस दिन दोषी को फांसी दी जाती है उसे तय समय से ढाई घंटे पहले जगा दिया जाता है। नहाने के बाद उसे नए कपड़े पहने के लिए दिए जाते हैं। उसके बाद दोषी को सेल से बाहर आहते में लाया जाता है। जहां पहले से ही जेल अधीक्षक, उप अधीक्षक, मेडिकल ऑफिसर, जिला उपायुक्त (राजस्व) व 12 सुरक्षाकर्मी व एक सफाईकर्मी मौजूद होता है। यहां पर उससे किसी के नाम कोई खत लिखने या फिर आखिरी इच्छा के बारे में दोबारा पूछा जाता है। दोषी के पास 15 मिनट का समय होता है।
उसके बाद दोषी के हाथों को पीछे बांध दिया जाता है और यहां से 100 कदम दूर फांसी घर तक ले जाया जाता है। फांसी घर पहुंचने के बाद सीढ़ियों के रास्ते दोषी को फांसी के तख्ते पर ले जाया जाता है। जहां जल्लाद पहले से मौजूद होता है। जो दोषी को फांसी के तख्ते के पास ले जाता है। दोषी के चेहरे को काले कपड़े से ढक दिया जाता है और फिर उसके गले में फांसी का फंदा डाला जाता है। साथ ही दोषी के पैरों को रस्सी से बांधा जाता है। सारी प्रक्रिया पूरी होने के बाद जल्लाद इशारे में ही इस बात की जानकारी जेल अधीक्षक को देता है। जेल अधीक्षक घड़ी देखने के साथ तय समय होते ही रुमाल हिलाकर इशारा करता है। आदेश होते ही जल्लाद लीवर को खींच देता है। एक ही झटके में दोषी फंदे पर झूल जाता है। इसके करीब दो घंटे बाद मेडिकल ऑफिसर फांसी घर जाकर यह सुनिश्चित करता है कि फांसी पर झूले व्यक्ति की मौत हुई है या नहीं। मृत होने के बाद वह सर्टिफिकेट जारी करता है। उसके बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा जाता है। जेल अधिकारियों के मुताबिक पूरी प्रक्रिया में तीन घंटे का समय लगता है।
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जेल के आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक जिस दिन दोषी को फांसी दी जाती है उसे तय समय से ढाई घंटे पहले जगा दिया जाता है। नहाने के बाद उसे नए कपड़े पहने के लिए दिए जाते हैं। उसके बाद दोषी को सेल से बाहर आहते में लाया जाता है। जहां पहले से ही जेल अधीक्षक, उप अधीक्षक, मेडिकल ऑफिसर, जिला उपायुक्त (राजस्व) व 12 सुरक्षाकर्मी व एक सफाईकर्मी मौजूद होता है। यहां पर उससे किसी के नाम कोई खत लिखने या फिर आखिरी इच्छा के बारे में दोबारा पूछा जाता है। दोषी के पास 15 मिनट का समय होता है।
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उसके बाद दोषी के हाथों को पीछे बांध दिया जाता है और यहां से 100 कदम दूर फांसी घर तक ले जाया जाता है। फांसी घर पहुंचने के बाद सीढ़ियों के रास्ते दोषी को फांसी के तख्ते पर ले जाया जाता है। जहां जल्लाद पहले से मौजूद होता है। जो दोषी को फांसी के तख्ते के पास ले जाता है। दोषी के चेहरे को काले कपड़े से ढक दिया जाता है और फिर उसके गले में फांसी का फंदा डाला जाता है। साथ ही दोषी के पैरों को रस्सी से बांधा जाता है। सारी प्रक्रिया पूरी होने के बाद जल्लाद इशारे में ही इस बात की जानकारी जेल अधीक्षक को देता है। जेल अधीक्षक घड़ी देखने के साथ तय समय होते ही रुमाल हिलाकर इशारा करता है। आदेश होते ही जल्लाद लीवर को खींच देता है। एक ही झटके में दोषी फंदे पर झूल जाता है। इसके करीब दो घंटे बाद मेडिकल ऑफिसर फांसी घर जाकर यह सुनिश्चित करता है कि फांसी पर झूले व्यक्ति की मौत हुई है या नहीं। मृत होने के बाद वह सर्टिफिकेट जारी करता है। उसके बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा जाता है। जेल अधिकारियों के मुताबिक पूरी प्रक्रिया में तीन घंटे का समय लगता है।
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