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मुश्किल में सीजेपी की रत्ना सिंह: मजिस्ट्रेट पर टिप्पणी पड़ी भारी, रेखा सरकार ने दी अवमानना कार्रवाई की सहमति

Wed, 04 Nov 2026 05:50 PM IST
Digvijay Singh एएनआई, नई दिल्ली
एएनआई, नई दिल्ली Published by: Digvijay Singh Updated Wed, 04 Nov 2026 05:50 PM IST
सार

दिल्ली सरकार के अतिरिक्त स्थायी वकील अमोल सिन्हा ने 'कॉकरोच जनता पार्टी' की विधि प्रमुख रत्ना सिंह के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की अनुमति दी है। यह अनुमति दिल्ली की एक अदालत के न्यायिक अधिकारी के खिलाफ उनके सोशल मीडिया संदेशों को लेकर दी गई है।

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CJP’s Ratna Singh in trouble Remarks about a magistrate prove costly Rekha Sarkar grants consent for contempt
सीजेपी की रत्ना सिंह पर कार्रवाई का रास्ता साफ - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

दिल्ली सरकार के अतिरिक्त स्थायी वकील अमोल सिन्हा ने 'कॉकरोच जनता पार्टी' की विधि प्रमुख रत्ना सिंह के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की अनुमति दी है। यह अनुमति दिल्ली की एक अदालत के न्यायिक अधिकारी के खिलाफ उनके सोशल मीडिया संदेशों को लेकर दी गई है। वकील कौशिक चटर्जी के आवेदन पर यह कदम उठाया गया।

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सिन्हा ने दो नवंबर को लिखे एक पत्र में 'न्यायालय अवमानना अधिनियम' की धारा 15(2) के तहत कार्रवाई की सहमति दी। मामला सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म  एक्स पर रत्ना सिंह के संदेशों से जुड़ा है। इन संदेशों में उन्होंने साकेत कोर्ट के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अभिनव पांडे के आदेश पर असंतोष जताया था। यह आदेश दिल्ली पुलिस द्वारा उन्हें कथित हिरासत में लिए जाने से संबंधित था। सिन्हा ने कहा कि संदेश केवल न्यायिक आदेश की आलोचना तक सीमित नहीं थे। प्रथम दृष्टया यह संकेत मिला कि मजिस्ट्रेट किसी बाहरी सत्ता के निर्देशों पर काम कर रहे थे।
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सिन्हा ने कहा कि इन बयानों से न्यायिक अधिकारी के स्वतंत्र विवेक पर सवाल उठता है। यह आरोप न्यायिक प्रक्रिया की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को प्रभावित करते हैं। इससे अदालत की गरिमा कम हो सकती है और न्याय व्यवस्था में जनता का भरोसा डगमगा सकता है।
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सिन्हा का स्पष्टीकरण
सिन्हा ने दिल्ली पुलिस और 'विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट' प्रणाली पर दिए गए बयानों पर भी गौर किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अधिकारियों की कड़ी आलोचना को आपराधिक अवमानना नहीं माना जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी राय केवल प्रथम दृष्टया आरोपों तक सीमित है। इस पर दिल्ली उच्च न्यायालय स्वतंत्र रूप से विचार करेगा।


 
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