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ग्यारह बहनों ने शिक्षा में गाड़े झंडे
ब्यूरो/अमर उजाला, गुड़गांव
Updated Sat, 07 Mar 2015 09:20 PM IST
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विश्व महिला दिवस पर विशेष
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गुड़गांव के भिवानी की फोगाट बहनें बबिता एवं गीता आपको याद हैं। उन्होंने तमाम मिथकों और धारणाओं को दरकिनार करते हुए कुश्ती में लोहा मनवाया है। ठीक वैसी ही हैं मेवात की 11 बहनें। जिन्हाेंने तमाम वर्जनाएं तोड़कर आला तालीम हासिल कर इलाके में अपनी अलग पहचान बनाई है।
हरियाणा के सबसे पिछड़े मेवात में लड़कियों की शिक्षा का बुरा हाल है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अभी चल रही हरियाणा बोर्ड की परीक्षा में सबसे कम छात्राएं मेवात से शामिल हुई हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार इस जिले की महिला साक्षरता दर 24.26 फीसदी है, जो प्रदेश में सबसे कम है। अधिवक्ता नूरूद्दीन नूर कहते हैं कि मुस्लिम बहुल इलाका होने के कारण बच्चियों की शिक्षा का विशेष इंतजाम नहीं होने से बहुत कम मां-बाप अपनी लड़कियों को आगे पढ़ाने को राजी होते हैं।
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शिक्षा को लेकर ऐसे माहौल में मेवात के चंदैनी गांव के रियाज खान ने एक मिसाल कायम की है। वह पंजाब वक्फ बोर्ड में रेवेन्यू कलेक्टर थे। चार साल पहले उनका इंतकाल हुआ है। इसके बावजूद परिवार की लड़कियों के आला तालीम देने की यह परंपरा अब उनकी दो बड़ी बेटियों नफीसा और शबनम ने संभाल रखी है। दोनों बहनें सरकारी स्कूल में टीचर हैं। रियाज की आठवीं पुत्री अना रियाज बताती हैं कि उनकी चार बहनाें ने मेवात में इसलिए टीचर बना जरूरी समझा कि वो परिवार के साथ समाज की लड़कियों को उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित कर सकें। वह बताती हैं कि प्राय: अभिभावक उनसे अपनी बच्चियाें को आला तालीम दिलाने के बारे में राय लेने आते हैं।
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मेवात में लड़कियों की उच्च शिक्षा कठिन
रियाज साहब की छह पुत्रियां एमए, बीएड जेबीटी, एक एमए जेबीटी, दो एमबीए हैं। एक स्नातक अंतिम वर्ष में है। अना बताती हैं कि मेवात जैसे इलाके में लड़कियों का उच्च शिक्षा प्राप्त करना किसी पर्वत पर चढ़ने से कम नहीं। सियानी लड़कियाें के घर से बाहर निकलने पर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो जाती हैं। इसके बावजूद उनके आजाद ख्याल मां-बाप ने कभी इसकी परवाह नहीं की। आला तालीम हासिल करने को वह मेवात के बाहर भी गईं। अना कहती हैं कि उनके दादा हाजी अर्जन खान भी शिक्षा को लेकर काफी खुले विचार के थे। इसलिए भी उन्हें परिवार की ओर से कभी कोई बाधा नहीं आई।
रविवार को विश्व महिला दिवस है। इस अवसर पर गुड़गांव में कई कार्यक्रम होंगे। बुद्धिजीवी से लेकर प्रशासन तक इस मौके पर बहुत सारी बातें कहेंगे। इस दिवस के समापन के साथ ही महिलाओं के उत्थान और सशक्तिकरण को लेकर लोगों की ऊर्जा फिर से शांत हो जाएगी। महज ऐसी औपचारिकताओं से महिलाओं को मजबूत नहीं बनाया जा सकता है। ना ही उन्हें उनका समाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हक दिलाया जा सकता है। महिलाओं को इसके लिए स्वयं आगे आना होगा।
यह बात हरियाणा महिला आयोग की उपाध्यक्ष सुमन दहिया ने कही। उनका कहना है कि देश के सबसे आधुनिक और विकसित शहर गुड़गांव की महिलाओं को अभी भी अपने हक के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ेगा। 21वीं सदी में महिलाओं को अपने आत्मसम्मान और हक के लिए लड़ना होगा। खास कर ग्रामीण परिवेश की महिलाओं को। दहिया ने कहा कि ग्रामीण महिलाओं में आज भी शिक्षा की कमी है। आर्थिक तौर पर वह स्वावलंबी नहीं है। उन्हें आज भी हर काम के लिए पुरूषों पर निर्भर रहना पड़ता है।
सुमन दहिया ने कहा कि महिलाएं तभी मजबूत होंगी जब उन्हें निर्णय लेने का अधिकार हो। यह हक उन्हें तभी मिलेगा जब वह खुद को मजबूत बनाएंगी। इसके लिए उनका शिक्षित और आर्थिक तौर पर मजबूत होना बेहद जरूरी है। दकियानूसी मानसिकता छोड़नी होगी।
महिलाओं सशक्तिकरण को नलिनी ने किया जीवन समर्पित
डॉ. नलिनी भार्गव एक ऐसी महिला का नाम है जिन्होंने अपनी राह खुद बनाई है। वह वही कर रही हैं जो करना चाहती थीं। डॉ. भार्गव का मानना है कि कोई समाज तभी आदर्श हो सकता है जब वहां महिलाओं को भी पुरूषों के समान अधिकार मिले हों। वह शुरू से ही महिलाओं की स्थिति को लेकर चिंतित रही हैं। यही कारण है कि वह तकरीबन 17 वर्षों से समाज सेवा के काम में जुटी हुई हैं।
डॉ. नलिनी भार्गव ने शुरूआत में चक्करपुर गांव में महिलाओं को स्वरोजगार लायक बनाने के लिए सिलाई, कढ़ाई और बुनाई का केंद्र खोला था। यहां पर झुग्गियों में रहने वाली गरीब महिलाओं को नि:शुल्क प्रशिक्षण दिया जाता था। इस दौरान सैकड़ों महिलाओं को अपने पांव पर खड़ा होने में मदद मिली थी। डॉ. भार्गव ने वर्ष 2003 में शाकुंतलम नाम से अपना एक एनजीओ खोला इसके माध्यम से सेक्टर-23 स्थित शक्ति मंदिर और राजीव नगर में गरीब बच्चों के लिए स्कूल चलाती हैं। इसमें तकरीबन 170 विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। जिसमें छात्राओं की संख्या आधे से अधिक है।
सुरक्षा का मुद्दा काफी विकट
नलिनी भार्गव का मानना है कि गुड़गांव में महिलाओं की हालत कुछ अच्छी नहीं है। यहां महिलाओं के समक्ष अपनी सुरक्षा का मुद्दा काफी विकट है। आए दिन यहां महिलाओं के खिलाफ अपराध हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि एक समाज सेवी होने के नाते महिलाओं को हर प्रकार से मदद कर रही हैं। डॉ. भागर्व को नेचर पेंटिंग, तेंजोर पेंटिंग और लेखन का शौक है। इनकी एक पुस्तक जल्द ही बाजार में आने वाली है। इस पुस्तक का नाम हेमचंद्र विक्रमादित्य भारत के अंतिम हिंदू सम्राट है। नलिनी मूल रूप से इंदौर की रहने वाली हैं। इनका जन्म लखनऊ में हुआ। शादी इलाहाबाद में हुई। कर्मभूमि इन्होंने गुड़गांव को बनाया।
महिला सशक्तिकरण की मिसाल हैं बेबी हालदार
बेबी हालदार के जीवन संघर्ष की कहानी महिला सशक्तिकरण की नायाब मिसाल है। कभी लोगों के घरों में बर्तन मांजने वाली यह महिला आज चर्चित बांग्ला साहित्यकार है। वह गुड़गांव के साउथ सिटी फेज-1 में रहती हैं। वह अपने जीवन के संघर्षों के बारे में खुल कर बातें करती हैं। बिना किसी छिपाव के वह उन दिनों के संघर्ष को याद करते हइुए कहती हैं कि बिना संघर्ष किसी को कुछ हासिल नहीं होता है। अगर साहिल हो भी जाता है कि वह उसका मोल नहीं समझता। बेबी हालदाद जैसी संघर्षशील महिला सभी के लिए प्रेरणास्त्रोत है। वह गुमनामी से निकल कर एक नामी लेखिका बन गईं। इसके पीछे उनके लंबे संघर्ष की कहानी है। वह फरीदाबाद और गुड़गांव की गलियों में वह कभी बर्तन मांजने का काम ढूंढा करती थीं।
बेबी हालदार की पहली किताब ‘आलो आंधारिश’ वर्ष 2013 में हिंदी भाषा में प्रकाशित हुई। उसके अब तक दो संस्करण छप चुके हैं। इसका बांग्ला संस्करण भी प्रकाशित हो चुका है। इसके अलावा विश्व की 16 भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है। उनमें बांग्ला की भी बहुत सी किताबें थीं। कभी-कभार वह किताबों को पलट कर देख लिया करती थीं। एक बार घर के मालिक ने उन्हें देख लिया। उन्होंने बेबी को पढ़ने की प्रेरणा दी। 40 साल पहले जम्मू-कश्मीर में पैदा हुई बेबी के पिता सेना में थे। मां के अचानक गायब होने के बाद पिता ने एक के बाद एक करके तीन शादियां की। सातवीं की पढ़ाई करते हुए ही उनकी सादी एक 34 वर्ष के व्यक्ति से हो गई। पति के परेशान करने पर वह अपने बच्चों को लेकर घर से निकल गईं। तब वह दिल्ली, गुड़गांव और फरीदाबाद में आकर लंबा संघर्ष किया।
रेनू सेवा भारती से जुड़ महिलाओं को बना रही हैं मजबूत
महिलाओं को भी समाज में पुरुषों के समान सम्मान और अधिकार मिले इसे लेकर तकरीबन दो दशकों से गुड़गांव की रेनू पाठक संघर्ष कर रही हैं। उनका मकसद समर्थ महिला समृद्ध भारत निर्माण है। उनका मानना है कि गुड़गांव भले ही आज आधुनिक बन गया है मगर यहां आज भी महिलाओं की स्थिति उतनी सुदृढ़ नहीं है जितनी होनी चाहिए। महिलाओं के हितों की रक्षा के लिए रेनू पाठक ने काफी संघर्ष किया है।
वह लगातार महिलाओं को मजबूत बना रही हैं। सेवा भारती से जुड़ी हुई हैं। वह अखिल भारतीय सेवा भारती की राष्ट्रीय सह सचिव हैं। पाठक ने बताया कि वह महिलाओं के लिए कंप्यूटर शिक्षा, सिलाई-कढ़ाई और ब्यूटीशियन प्रशिक्षण का केंद्र चला रही हैं। यहां से हुनर सीख महिलाएं और लड़कियां अपने पांव पर खड़ी हो रही हैं। किशोरी विकास प्रकल्प नाम से गुड़गांव में 25 सेंटर भी चला रही हैं। उन्होंने कहा कि गुड़गांव में महिलाओं के समक्ष चुनौतियां काफी हैं।
वीणा कविताओं के माध्यम से जगा रही हैं अलख
साहित्य की दुनिया में अपने संघर्षों से वीणा अग्रवाल ने अपना नाम रोशन किया है। उन्होंने अब तक तकरीबन 600 कविताएं लिख चुकी हैं। उनकी एक किताब रिश्तों की सुगंध नाम से प्रकाशित भी हो चुकी है। उन्होंने कहा कि पुरूषों के बीच अपनी जगह बनाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा है। वह कविताओं के माध्यम से समाज सुधार लाने का प्रयास कर रही हैं।
कन्या भ्रूण हत्या, नारी शोषण सहित अन्य सामाजिक बुराईयों पर कुठाराघात किया है। वीणा अग्रवाल बताती हैं कि उन्हें वर्ष 1995 से ही कविता खिलने का शौक पनपा था। उनकी एक कविता की एक पंक्ति ‘किसी से नहीं मां तुमसे गिला जो दुनिया में आने से पहले मिला’ लोगों के बीच चर्चित है। इसके माध्मय से वह कन्य भ्रूण हत्या पर प्रहार किया। वह बताती हैं कि अगर मां मजबूत इराइे वाली हो तो कन्या भ्रूण हत्या असंभव हो जाएगा।
गुडगांव में महिलाओं के बारे में आंकड़े...
कॉरपोरेट सेक्टर में 60 हजार से अधिक महिलाएं काम करती हैं
आईटी-बीपीओ सेक्टर में कामकाजी महिलाओं की संख्या 55 हजार है
उद्योगों में 70 हजार से अधिक महिलाएं काम करती हैं
सिर्फ एक ही महिला राजकीय महाविद्यालय है
महिलाओं की सुरक्षा के लिए गुड़गांव पुलिस ने पिंक ऑटो सेवा शुरू की है
महिला हेल्पलाइन नंबर पर आने वाली कॉल में 42 प्रतिशत का इजाफा
महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा में 71 प्रतिशत तक बढ़ोतरी
बलात्कार की घटनाओं में 35 प्रतिशत की वृद्धि