विश्व गुर्दा दिवस पर दुर्लभ केस: बहनों से प्रत्यर्पित गुर्दे ने छोड़ा साथ, पति से मिला जीवन
गुरुवार को दिल्ली सहित पूरी दुनिया में विश्व गुर्दा दिवस मनाया जाएगा। ऐसे में राजधानी के अपोलो अस्पताल में गुर्दे से जुड़े दुर्लभ रोगों का उपचार करने वाले हाल ही में पद्मश्री प्राप्त डॉ. संदीप गुलेरिया ने एक ऐसी महिला का जीवन बचा लिया, जिसका 19 साल में तीसरी बार गुर्दा प्रत्यारोपण करना पड़ा। गौर करने वाली बात है कि तीनों ही बार डॉ. गुलेरिया ने ही महिला मरीज के प्रत्यारोपण किए हैं। यहां जानना जरूरी है कि पिछले वर्ष ही एम्स में जाकर डॉ. संदीप गुलेरिया ने वित्त मंत्री अरुण जेटली के गुर्दे का प्रत्यारोपण किया था। डॉ. संदीप गुलेरिया लंबे समय तक एम्स में भी सेवाएं दे चुके हैं।
बार-बार प्रत्यारोपण को लेकर डॉ. गुलेरिया ने बताया कि दो बार महिला की बहनों के गुर्दे प्रत्यारोपित किए गए थे लेकिन चिकित्सीय विज्ञान में मानव शरीर किसी और के अंगों को पूरी तरह से अपना नहीं पाता है। प्रत्यारोपण के मामले में ये सबसे बड़ी चुनौती है। चूंकि मरीज और उसकी दोनों बहनों के जीन एक जैसे थे। इसलिए दोनों के गुर्दे जब मरीज के शरीर ने खारिज कर दिए तो आखिर में पति के गुर्दे को प्रत्यारोपित किया। उन्होंने बताया कि पति के जीन अलग होने के कारण उम्मीद है कि महिला मरीज को अब गुर्दा आजीवन कार्य करे।
दरअसल दिल्ली निवासी 45 वर्षीय एतिका कालरा को वर्ष 1996 में चिकित्सीय जांच के दौरान पता चला कि उनके गुर्दे सिकुड़ रहे हैं। कुछ वर्ष तक इलाज के बाद भी जब फायदा नहीं हुआ तो एतिका कालरा ने डॉ. गुलेरिया से संपर्क किया। उसके बाद महिला मरीज को ग्लोमेरूलोनेफ्राइटिस नामक बीमारी के बारे में जानकारी मिली। जिसके कारण गुर्दे का खून छानने वाले अंग (ग्लोमेरूलाई) खराब हो जाता है।
इसके कारण ही उनके गुर्दे खराब हुए और पहला प्रत्यारोपण 2001 में किया। करीब 13 वर्ष तक गुर्दे ने मरीज के शरीर में रहकर पर्याप्त कार्य किया, लेकिन धीरे-धीरे वह शरीर का साथ छोड़ रहा था। इसके कारण साल 2014 में दूसरा प्रत्यारोपण किया। पहली बार में बड़ी बहन अंशु वालिया और दूसरी बार में बहन रितु पाहवा ने गुर्दा दान किया था। डॉ. संदीप गुलेरिया का कहना है कि तीनों बहनों के जीन समान हैं।
दूसरे प्रत्यारोपण के बाद मरीज के शरीर में दूसरी बहन का गुर्दा ज्यादा प्रभावी नहीं हो सका। इसी बीच महिला को गैंग्रीन भी हो गया था। इसके चलते आंतों का ऑपरेशन करना पड़ा। डॉ. गुलेरिया का कहना है कि कुछ ही समय पहले जब दूसरी बार में प्रत्यारोपित गुर्दे ने शरीर का साथ छोड़ दिया तो तीसरी बार प्रत्यारोपण किया। इस बार मरीज के पति तरुण कालरा ने गुर्दा दान किया। चूंकि तरुण का रक्त समूह मरीज से अलग था।
इसलिए डॉ. गुलेरिया ने बताया कि अलग रक्त समूह होने के कारण चिकित्सीय तकनीक का इस्तेमाल करते हुए ये प्रत्यारोपण किया है। उन्होंने बताया कि महिला फिलहाल स्वस्थ हैं। तीसरी बार गुर्दा प्रत्यारोपण के अलावा दूसरा विकल्प आजीवन डायलिसिस था। परिजनों को पूरे केस के बारे में जानकारी होने के बाद उन्होंने प्रत्यारोपण ही कराने का फैसला लिया था।